Book Title: Jinabhashita 2008 12
Author(s): Ratanchand Jain
Publisher: Sarvoday Jain Vidyapith Agra

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Page 21
________________ मन्दिर और मूर्ति पूजा का विज्ञान मन्दिर कोई ऐसी चीज नहीं है, जो बाहर से किन्हीं कल्पना करनेवाले लोगों ने खड़ी कर ली हो । वह मनुष्य की चेतना से ही निकली है। परमात्मा के गहन बोध के अतिरिक्त मन्दिर नहीं बनाया जा सकता। यह हो सकता है कि परमात्मा का गहन बोध खो जाये, तो भी मन्दिर बचा रहेगा । जैसे घर में एक अतिथि गृह बनाया, भले ही अब अतिथि न आते हों, तो भी अतिथि गृह खड़ा रहेगा। परमात्मा का बोध अनेक लोगों के अनुभव से जुड़ी एक प्रक्रिया है। मन्दिर परमात्मा का रिसेप्टिव (Receiptive ) केन्द्र है, जैसे रेडियो के उपकरण के बिना रेडियो तरंगों को पकड़ना कठिन होता है, ठीक ऐसे ही मन्दिर रिसेप्टिव उपकरण है । जैसे रेडियो तरंगे तो हर जगह मौजूद हैं, लेकिन विशेष संयोजन करके रेडियो को ट्यून करके एक विशेष आवृत्ति की रेडियो तरंगे ट्यूनिंग सिस्टम के द्वारा आग्राहक हो जाती हैं। इसी तरह मन्दिर को आग्राहक की भाँति उपयोग किया जाता है, जहाँ दिव्य-भाव को, दिव्य - अस्तित्व को ग्रहण कर पायें। मन्दिर के शिखर पर कलशारोहण उस दिव्य भाव को प्राप्त करने के लिए एंटीना की भाँति होते हैं। Jain Education International पं० निहालचन्द्र जैन, बीना, म.प्र. या तीर्थंकर की मूर्ति को ध्यान से देखें, वह भी वर्तुल ही निर्मित करने का एक अनोखा तरीका है। दोनों पैर जुड़े हैं और दोनों हाथ पैरों के ऊपर रखे हैं, तो पूरा शरीर वर्तुल का काम करने लगता है। स्वयं हम विचारशून्य होने लगते हैं। शरीर की विद्युत फिर कहीं बाहर नहीं निकलती । सर्किट का निर्माण होते ही ध्यान की प्रक्रिया में जाना शुरू हो जाता है। हमारे भीतर विचारों का आक्रमण, ऊर्जा के वर्तुल न बनने के कारण होता है । वर्तुल बना, कि ऊर्जा शान्त होने लगती है । मन्दिर के गुम्बज या भीतर के गर्भगृह में उपस्थित हवा में इस ध्वनि - वर्तुल के कारण अधिकतम ऊर्जा के साथ कम्पन शुरू हो जाता है। दूसरी बात यह ध्यान देने की है कि हमारे जितने प्राचीन मन्दिर बने उनके गर्भगृह में कोई खिड़की नहीं है। एक ही दरवाजा, वह भी छोटा। बाहर से लगता है कि ये बड़े " अनहाइजीनिक" हैं, परन्तु इन मन्दिरों स्वस्थ लोग ही आते हैं और इन मन्दिरों के भीतर कोई बीमारी नहीं आने दी जाती है। उनके भीतर ओम् या मन्त्रों की ध्वनि का जो आघात है, वह अपूर्वरूप से वहाँ के वातावरण को शुद्ध करता । वे विशेष ध्वनियाँ शुद्धता लाती हैं। सही में अब ध्वनि का पूरा शास्त्र खो गया है । जिन्होंने ध्वनि या शब्द को ब्रह्म कहा है, उन्होंने शब्द से ब्रह्म के समान गहरी अनुभूति का प्रयोग किया होगा। सारा भारतीय संगीत, राग-रागिनियाँ, यह शब्द ब्रह्म की प्रतीत का फैलाव है। ये संगीत राग-रागिनी, मन्दिरों से ही सृजित हुई हैं। सारे नृत्य पहली बार मन्दिरों से पैदा हुए हैं। नृत्य और संगीत भक्ति का एक अभिन्न अंग है। मन्दिर का गुम्बज आकाश की आकृति का होता है । यदि खुले आकाश में जब हम ॐ का उच्चारण करेंगे, तो वह विराट् आकाश में खो जायेगा। वह ॐ की ध्वनि हम पर लौटकर नहीं आयेगी, वह अनंत में खो जायेगी। हमारी ॐ की ध्वनि हम तक लौटकर आ जाए, इसलिए मन्दिर का गुम्बज निर्मित किया गया। अर्ध - गोलाकार है वह । ध्वनि के लौटकर आने से मूल ध्वनि के साथ वह एक वर्तुल (सर्किल) का निर्माण है । मन्दिर का गुम्बज ॐ की मूलध्वनि को लौटाकर एक इको (गूँज) पैदा करता है और उससे वर्तुल का निर्माण होता है। इस वर्तुल का आनन्द ही अद्भुत है। लौटती ध्वनि के साथ एक दिव्यता का प्रवेश हमारे अन्दर होने लगता । मन्दिर में बोले गये मंत्र जब शान्त, एकान्त स्थिति में बैठकर उच्चरित किये जाते हैं, तो जैसे ही वर्तुल निर्मित होने लगते हैं, हमारे विचार बन्द होने लगते हैं। पद्मासन या सिद्धासन में बैठी महावीर का आज के मन्दिर साधारण मकान बनकर रह गये हैं, जहाँ रोशनी और हवा है, सारे आरामदायी उपकरण लगा दिये गये हैं, परन्तु ऐसे मन्दिरों से पाँच हजार साल का लम्बा अनुभव विदा हो गया है, जहाँ साधक के स्वास्थ्य पर कोई बुरा प्रभाव या परिणाम नहीं हुआ करता था। ध्वनि से गहरा संबन्ध है मन्दिर की वास्तुकला जैन आचार्यों द्वारा प्राकृत या संस्कृत में जो आगम दिसम्बर 2008 जिनभाषित 19 For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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