Book Title: Dvadashkulakam
Author(s): Jinvallabhsuri, Jinpalgani
Publisher: Jindattsuri Gyanbhandar

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Page 8
________________ A सादर- व्यापारकिरवाया, सः अमे मोमि, क्या हख रस्से मांगा इम्बोस्य वचरसगुन्यः, बहुजन सत्यापन पतावनों। वियोव नमानसमन्निः जन्म बन के चामवन् निर्मित साम।२॥ ना मानुनस्कन्वरमाध्ययनले । दे समय को भावना सम्मानिया सेमतिकारहि य मगवतो पदमाणमामियो चबानादी उदं मधून ग्रलो पाद विकोई सागरियो व मंगळ पं ने ममए dि, टामीनः ममः, ममदिन कालः, सम्मश्यकाम्दो पस बिसेसमालोस मोहल्लस वाममोरचुदामें गमय पदुक बन्योनो असितायो इत्युनगयो उत्तरफागुणी शो नहीपक्ने नियम बमानस्सानिनः पञ्चायचो दमः श्रवमयदेमूरिमिः पशव भ्याम्प्रति जामी, जयादि... सेनानिनिय निनिम्म्ये विष्णेवा ॥३६॥ शंकाम्पमापि, वर्षमानम्मेव ऋषनादीनामपि वर्तमानावसपिभीमरतापश्या, एकमेवर वीथे, वर्षमाम्सद मजनजदीकीयस्वसामान्य नियनिसावमए मातानि, मुस्मात्या विवस्तयेति । सन्वेव समादिविनयति अंबूदी सरकम्यामिविया मवेव सवारवाना सर्वेरवान्य, व यान्येवर पतेसमस्यामवमर्पिण्या अन्येव च व्यत्ययेनोत्सर्पिण्याम्पीति माचार्य "पंच कामाला सम्वेसि बिण निययेण" इन, नियमविघायकं वाच मन्येव न न्यूनादीनि न्यूनत्वस्वासमानत्वात् ,नच्युयाय पान दीक्षा, न च तीर्यको दीयामप्रतिपनन केवलं, न र उदयावे मुक्ति, इसको न्यूनत्वामावे नियमः, बाक्लेि निलये अधि, मायावलोक्यमानत्वास, यत्र वीरस्म यछे कल्याणके विशेषरूपे विद्यमानेऽपि पचकल्याणकप्रतिपादनं तदनिदेशसमसामपाशनानिदेशयोति । यथ श्रीपञ्चमाहे-जति मंते ! सके देविंद देशमा अब महिकीम अब एक विम्बिया मते ! रेषिदेवराया के महीडीप? हेव ति" अत्र वं वइवधि, अनेर यति ऋम्सपानवव्या

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