Book Title: Bhav Sangrah
Author(s): Vamdev Acharya, Ramechandra Bijnaur
Publisher: Bharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad

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Page 172
________________ १६३ दण्डाकारं कपाटात्म्यं प्रतरात्म्यं ततोजगत्। पूरणं कुरुते साक्षाच्चतुभिः समयद्रुतं ॥७३६॥ चार समयों में वह शीघ्र दण्डाकार, कपाटाकार, प्रतराकार तथा लोक पूरण करता है । युगलं एवमात्मप्रदेशानां प्रसारणविधानतः। प्रायुः समानि कर्माणि कृत्वा शेषाणि तत्क्षगे ॥७४०॥ ततो निवर्तते तल्लोकपूरणतःकमात्। चतुभिः समयैरेव निर्विकल्पस्वभावतः ॥७४१॥ इस प्रकार प्रात्मप्रदेशों के प्रसारण के भेदों से तत्क्षण शेष कर्मों को आयुकर्म के समान करके अनन्तर क्रम से उसी प्रकार लोक पूरण से चार समयों में ही निर्विकल्प स्वभाव से लौटता है। समुद्धातस्य तस्याद्यऽष्टमे वा समये मुनिः। , औदारिकाङ्गयोगः स्याद्विषट्सप्तकेषु तु ॥७४२॥ अथवा समुद्घात के आठ समयों में दो, छह तथा सातवें में औदारिक अङ्ग का योग होता है । मिश्रौदारिकयोगी च तृतीया धेषु तु त्रिषु। समयेष्वेककर्माङ्गधरोऽनाहारकच सः ॥७४३॥ १ ७४२-४३-४४ एतच्छलोक त्रयं. ख-पुस्तके नास्ति । २ तृतीय चतुर्थ पचमेषु त्रिषु समयेषु कार्मणकाययोगो।

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