Book Title: Anusandhan 2011 12 SrNo 57
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 7
________________ डिसेम्बर २०११ श्रीवीतरागस्तवनं आदिनाथनमस्कारश्च ॥ - सं. विजयशीलचन्द्रसूरि पाटणना श्रीहेमचन्द्राचार्य ज्ञानभण्डारमा १ पानांनी, डा. १९१, क्र. ७३९९ नी एक प्रत छे, तेमां आलेखायेली बे लघु रचनाओ अत्रे प्रस्तुत छे. अनुमानतः प्रत १७मा शतकनी होवानुं जणाय छे. प्रथम रचना 'वीतरागस्तवन' नामे छे. संस्कृत १३ पद्यो प्रमाण आ रचनामां वीतराग जिनदेवनी प्रसाद-मधुर अने भावपूर्ण स्तवना थई छे. कर्ताए पोतानुं नाम स्पष्ट नथी जणाव्यु, पण १३मा पद्यमां आवतां 'चारित्रं सुन्दरं' ए पदो कर्ता- नाम सूचवी जतां जणाय छे. आ रचनाने छेडे एक प्रश्नोत्तरात्मक मजानुं पद्य छे, ते पण ते ज कर्ता- होय तेवं मानी शकाय. 'सुभाषित' गणी शकाय तेवू ए पद्य वांचतां ज आनन्द आपे तेवू छे. बीजी रचना छे 'आदिनाथ नमस्कार'. अपभ्रंशनी छांटवाळी गुर्जर भाषामां अने छप्पय छन्दमां रचायेली आ नमस्कारमां शत्रुञ्जय तीर्थपति श्रीआदिनाथनी वन्दना करवापूर्वक कर्ताए पोताना भवभ्रमण- बयान आप्युं छे, अने छेवटे तेनाथी थाकेला चंचल मनने निश्चल बनावीने तमारा शरणे रहेवानीराखवानी याचना करी छे. आमां पांचमा छप्पयमां शत्रुञ्जयना शिखरे चडीने तमारी पूजा करीश, अने रायणना वृक्ष तले तमारां पाय-पगलांनी पण पूजा करीश, ते उल्लेख ध्यान खेंचे तेवो छे. आ रचनाना कर्तानो सीधो उल्लेख अहीं जोवा मळतो नथी. कदाच छेल्ली पंक्तिगत 'आणंदिइं' ए कर्ता- सूचक पद होई शके. ----- श्रीवीतरागस्तवनं (१) मुंकारस्फाररूपं परमपदगतं छिन्नमोहप्ररोहं मायाहङ्कारमुक्तं त्रिगुणविरहितं त्यक्तनिःशेषसङ्गम् ।

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