Book Title: Anusandhan 2002 03 SrNo 19
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad
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श्रीनमिजिनस्तवन श्री ऋषभानन गुणनीलो ।
श्रीनभिप्रभुजीने सेवतां होये सुखनो पूरण गेहरे जिणंद । चरणकमलनी सेवनां करतां वधइं गुणनेह रे जि० ॥ श्री० ||१||
वप्राराणीनो नंदलो जेहने सेवइ चोसठि इंद्र रे । जि० ॥ त्रिगडे बेठां सोहि प्रतिबुझवई सुरनरवृंद रे || जि० ॥ श्री० ॥२॥
March-2002
तुमे सारथी शिवपुरतणां समकित परम आधार रे जि० । ते समकित मुझ दीजई आतम हित सुखकार रे जि० ॥ श्री० ॥३॥
त्रिण तत्त्व मुझ दीजीइं करो करुणा हिवई सुखदाय रे जि० । दायक नायक उपमा तुमारी तुम भगते सुख थाय रे जि० ॥ श्री० ॥४॥
१. 'तुमारी' नथी.
श्रीजिनचंद्र मया करो दोलति दाई सुखकंद रे जि० । हीरसागर सुख संपदा ए तो प्रणमें परमाणंद रे जि० | श्री० ॥५॥
इति श्री नमिनाथ स्तवनम् ॥
श्रीनेमिनाथस्तवन
नरपती रे सीख दीओ अमने हवै ए देशी ॥
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श्री नेमजी रथ फेरी पाछा किम वल्यारे साहिबा, नाणी प्रीत लगार । वयण मानो सयण वारु । नेमजी गोखे बेठी पीयुने वीनवे रे सा० किम छोडो राजुल नार ।
व० | श्री० ||१||
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