Book Title: Anand Pravachan Part 11
Author(s): Anand Rushi, Shreechand Surana
Publisher: Ratna Jain Pustakalaya

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Page 349
________________ १२५ भामाद प्रवचन । प्रान ११ मूर्ख : बन्दर के समान नकलची मूर्ख आदमी प्रायः दूसरों की नकल किया करता है । उसमें पशु के समान स्वयं की अक्ल तो बहुत ही कम होती है, इसलिए वह बन्दर के समान नकल करने लगता है । परन्तु वह यह नहीं समझता कि नकल करने से किसी न किसी दिन कलई खुल सकती है। नकल करने से मूर्ख में किसी काम को व्यवस्थित एवं भली-भांति करने की सूझ-बूझ नहीं आती, वह जैसे अपने सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति को करते देखता है, ठीक उसी को नकल करने लगता है। उसे यह नहीं मालूम होता कि इस प्रकार नकल करने से उसके समय, शक्ति और धन का कितना अपव्यय होता है । परन्तु कई मूर्ख लोग अपनी हैसियत न होते हुए भी विवाह-शादियों, उत्सवों और अन्य प्रसंगों पर समाज में झूठी वाहवाही और क्षणिक प्रतिष्ठा पाने के लिए दूसरों की देखा-देखी हजारों रुपयों का धुआ उड़ा देते हैं । फिर जब वे कर्जदार हो जाते हैं, तब पछताते हैं । परन्तु अब पछताने से क्या होता है ? एक उदाहरण के द्वारा इसे समझने में आसानी होगी आद्य शंकराचार्य का एक शिष्य था। वह बड़ा मूर्ख था। हर बात में वह शंकराचार्य की नकल किया करता था। शंकर जब कहते-'शिवोऽहम' तो वह भी कहता-'शिवोऽहम् । शंकराचार्य ने उसकी मूर्खता दूर करने का निश्चय किया। एक दिन वे उस मूर्ख शिष्य को अपने साथ एक लुहार की दुकान पर ले गये । लुहार से उन्होंने पिघला हुआ लोहा लिया और जब स्वयं पी गये तब उस मूर्ख शिष्य से उन्होंने कहा-“ले तू भी इसे पी।" शिष्य झेंप गया बोला—“यह तो मुझ से नहीं हो सकता।" शंकराचार्य ने कहा-"तब तू हर बात में मेरी नकल क्यों करता है ? नकल करना अच्छा नहीं है, यह तो मूर्खता का चिह्न है । नकल करने से अक्ल गुम हो जाती है, बौद्धिक विकास रुक जाता है।" अब मूर्ख शिष्य समझा, उसने शंकराचार्य से क्षमा मांगी और भविष्य में न कल न करने की प्रतिज्ञा ली। ___शंकराचार्य के मूर्ख शिष्य ने तो नकल करना छोड़ दिया, परन्तु आज के पठित और शिक्षित लोग परीक्षा के समय नकल करते-कराते हैं, वे पता नहीं कब नकल करना छोड़ेंगे ? वरना नकल करने वाला मूर्ख की कोटि में ही गिना जायेगा; फिर चाहे वे निरीक्षक, अध्यापक आदि को धमकी देकर नकल करें या और तरीकों से करें, 'मूर्ख शिरोमणि' का पद तो मिल ही जायेगा। मूर्ख मंदमति होने से पशुतुल्य मुखं में सबसे बड़ा दुर्गुण यह होता है कि वह आगे-पीछे का कोई विचार नहीं करता, वह सिर्फ वर्तमान को ही देख पाता है । साथ ही वह ह मि-लाभ, अच्छेबुरे परिणाम की परवाह किये बिना ही बेधड़क काम किये जाता है। पशु में भी बुद्धि मंद होती है, मूर्ख में भी। इसी मंदबुद्धि के कारण ही मूर्ख बिना सोचे-समझे उलटे Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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