Book Title: Anand Pravachan Part 11
Author(s): Anand Rushi, Shreechand Surana
Publisher: Ratna Jain Pustakalaya

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Page 347
________________ ३२६ आनन्द प्रवचन : भाग ११ की ओर लौट पड़ा। रास्ते में चलते-चलते धूप चढ़ गई । यद्यपि वह तेजी से चल रहा था, परन्तु उसका गाँव अभी काफी दूर था । फिर भयंकर गर्मी की मौसम तथा भूखप्यास सता रही थी। रास्ते में एक गाँव आया, तो उसने सोचा-यहाँ से कुछ खरीद कर खा-पी लूँ फिर आगे बढूं।" ___ कृषक-पुत्र की शादी बहुत छोटी उम्र में हो गई थी। शादी के बाद वह कभी ससुराल में आया नहीं था । उसकी पत्नी अभी तक अपने मैके ही थी। यह गाँव उसकी ससुराल का गाँव था। लेकिन उसे पता नहीं था कि यहीं मेरी ससुराल है । वह खाने की वस्तु खरीदने के इधर-उधर घूमा पर कहीं कोई दूकान न होने से भोजन न मिल सका । आखिर लोगों से पूछता-पूछता अनायास ही अपनी ससुराल के आँगन में जा खड़ा हुआ। उसके बड़े साले ने उसे पहचान लिया। कृषक-पुत्र ने उससे पूछा''क्या यहाँ कुछ खाने की वस्तु मिल सकेगी ?" साले ने उसके चेहरे से उसकी परेशानी भाँप ली। शान्ति से उत्तर दिया-हाँ, आइये, यहाँ भोजन की व्यवस्था हो जायेगी।" ___ साले ने बहनोई को आदरपूर्वक उचित स्थान पर बिठाया। लोटा भर कर पानी लाया। हाथ-मुह धुलाये । फिर पीने के लिये पानी और गुड़ की डली ले आया। कृषक-पुत्र ने गुड़ की डली मुंह में डालकर पानी पिया। कुछ शान्ति हुई तो विचार दौड़ने लगे-शायद ये मुझे बड़ा ग्राहक समझकर विशिष्ट भोजन तैयार करें। मेरे पास तो सिर्फ ढब्बु पैसा है । अतः उसने स्पष्टीकरण करना उचित समझकर कहा"देखिये साहब ! मेरे पास ढब्बु पैसे से अधिक देने को कुछ भी नहीं है। आप उसके अनुसार ही भोजन तैयार करवाइयेगा।" साले ने उसकी अज्ञता का मजा लेते हुए कहा-"हाँ साहब ! उसके अनुसार ही तैयारी होगी, घबराइये मत ।" दामाद आखिर दामाद ही होता है । वह जब अपने यहाँ भले ही भूल से आये तो भी उसके अनुसार स्वागत-सत्कार होना चाहिये । अतः साले ने घर में सबको इस बात की सूचना कर दी कि विशिष्ट भोजन तैयार किया जाये। विशिष्ट भोजन तैयार करने में देर तो लगती ही है । कृषक-पुत्र को मीठीमीठी महक आ रही थी। इसलिये कुछ शंका हुई कि कुछ विशिष्ट भोजन तैयार हो रहा है । अतः उसने फिर चेतावनी देते हुए कहा- "देखिये साहब ! सोच-समझकर भोजन तैयार करवाएं । मेरे पास ढब्बु पैसे से अधिक कुछ भी नहीं है।" साला मन ही मन मुस्कराया और बोला-"कोई बात नहीं। आप भोजन तो करिये । पैसे की बात बाद में सोची जायेगी। अभी आप अपने पास ही रखें अपना ढब्बु पैसा।" । भोजन का थाल सामने आया । विविध सामग्री देखकर कृषक-पुत्र फिर भड़क कर बोला-"आपने यह सब क्यों बनवाया ? मेरे पास तो सिर्फ ढब्बु पैसा है।" साले ने मुश्किल से हंसी रोककर कहा- 'आप भोजन करिये। पैसे की चिन्ता न Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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