Book Title: Agam 43 Mool 04 Uttaradhyayan Sutra
Author(s): Mehta Mohanlal Damodar
Publisher: Mehta Mohanlal Damodar

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Page 312
________________ उ. अ. ३६: ३०६ सुक्कझाणं झियाएज्जा अनियाणे अकिंचणे । वोसह काए विहरेज्जा जाब कालस्स पज्जओ || १९|| निज्जूहिऊण आहार काल घरमे उबडिए चइऊण माणुसं बोंदि पहू दुख्खे विमुच्चई ॥ २०॥ निम्ममो निरहंकारो वीयरागो अणासत्रो । संपत्तो केवलं नाणं सासए परि निव्वुडे तिबेमि ॥ २१ ॥ ॥ इति श्री अणगारमग्गं नाम झयणं सम्मतं ॥ ३५ ॥ ४ अध्ययन ३६. जीव - अजीव विचार. जीवाजीव विभत्ति सुणेह मे एगमणाइओ । जं जाणिऊण भिख्खू सम्मं जयइ संजमे ॥ १ ॥ जीवाचेत्र अजीवाय एम लोए वियाहिए । अजीवो दसमागासे अलोए से वियाहि ॥ २ ॥ शुक्ल ध्यान धरीने अने धन तथा शरीरना यमत्वने त्यागीने, मृत्यु समय आवतां सुघी साधुए प्रतिबंध रहित विचरखं. (१९). मरणकळे आहार त्यागीने अने मनुष्य देह छोडीने ते औदारिक शरीर धारण करेछे अने दुःखथी मुक्त थाय छे. (२०), लोभ, ममता, अहंकार, रागद्वेष अने आश्रव रहित वनीने ते केवलज्ञान पामीने सिद्धगतिने प्राप्त करेछे. (२१). सुधर्मास्वामी जंबु स्वामीने आ प्रमाने कहे छे. ॥ अध्ययन पांत्रीसमं संपूर्ण. ॥ अध्ययन ३६. हवे जीव-अजीवना विभाग कहूं हूं ते एकाग्र मनथी सांभो. संयमने विषे यत्न करनार साधुए ए विभाग जाणवा जोइए. [2]. ६ जीव अने अजीवनो आ लोक बनेलो छे; परंतु अजीवनो देश आकाश तेने श्री तीर्थंकरे अलोक कह्यो छे.[२]. १ दीपिका टीकामां जीवने उपयोगवान अने अजीवने पुद्गल तरीके ओळखावेल छे. Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org

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