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1 भोजन
2 पासक
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श्रुतसागर | श्रुतसागर
SHRUTSAGAR (MONTHLY)
Jun-2018, Volume : 05, Issue : 01, Annual Subscription Rs. 150/- Price Per copy Rs. 15/EDITOR: Hiren Kishorbhai Doshi
BOOK-POST / PRINTED MATTER
3 धान्य
नरभव दुर्लभता दृष्टांत चित्र
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द
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ISSN 2454-3705
4 जुगार
5 रत्न
आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर
6 स्वप्न
*
1
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प. पू. गुरूमहाराजश्रीने मुंबई महानगरी में श्री गोवलियाटेंक जैन श्वेतांबर मू. पू. संघ, श्री लेजन्ट जैन श्वेतांबर मू.
पू. संघ(वालकेश्वर), श्री मुठलिया जैन श्वेतांबर मू. पू. संघ, श्री कमलकुंज जैन श्वेतांबर मू. पू. संघ (चिवडागली) तथा श्री वर्धमान हाईट्स जैन संघ, भायखला में पावन पदार्पण किये और प्रवचन दिया
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की
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आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर का मुखपत्र)
श्रुतसागर
શ્રુતસાગર
* संपादक
हिरेन किशोरभाई दोशी
SHRUTSAGAR (Monthly)
वर्ष-५, अंक-१, कुल अंक-४९, जून-२०१८
Year-5, Issue-1, Total Issue-49, June-2018
वार्षिक सदस्यता शुल्क - रु.१५०/- Yearly Subscription - Rs.150/
अंक शुल्क - रु. १५/-Price per copy Rs. 15/आशीर्वाद
राष्ट्रसंत प. पू. आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा.
* सह संपादक
महावीर
आराधना
रामप्रकाश झा
एवं
ज्ञानमंदिर परिवार
१५ जून, २०१८, वि. सं. २०७४, जेष्ठ शुक्ल-२
अमृतं
तु विद्या
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केन्द्र,
ISSN 2454-3705
कोवा
35
* संपादन सहयोगी भाविन के. पण्ड्या
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प्रकाशक
आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर
(जैन व प्राच्यविद्या शोध-संस्थान एवं ग्रन्थालय)
श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा, गांधीनगर-३८२००७
फोन नं. (079) 23276204, 205, 252 फैक्स : (079) 23276249, वॉट्स एप 7575001081 Website : www.kobatirth.org Email :
[email protected]
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अनुक्रम
1. संपादकीय 2. आध्यात्मिक पदो 3. Awakening 4. सतरहभेदी पूजा स्तवन 5. दश दृष्टांत सज्झाय 6. श्वेताम्बर संप्रदायना ८४ गच्छ
रामप्रकाश झा आचार्य श्री बुद्धिसागरसूरिजी Acharya Padmasagarsuri आर्य श्री मेहुलप्रभसागरजी मीनाक्षी आर. शिंदे मुनि जिनविजय
29
ग्यांन पदारथ पायकै, जहां तहां गांठ म खोल॥ नही पाटण नही पारखू, नही ग्राहक नही मोल ॥1
हस्तप्रत नं. २७९२ भावार्थः- जहाँ अच्छा नगर, योग्य परीक्षक, उत्तम ग्राहक व उचित मूल्य न होता हो, वहाँ अमूल्य धन के समान अपनी ज्ञान की गठरी को नहीं खोलनी चाहिए।
* प्राप्तिस्थान आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर तीन बंगला, टोलकनगर, होटल हेरीटेज़ की गली में
डॉ. प्रणव नाणावटी क्लीनीक के पास, पालडी अहमदाबाद - ३८०००७, फोन नं. (०७९) २६५८२३५५
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संपादकीय
रामप्रकाश झा श्रुतसागर का यह नवीन अंक आपके करकमलों में समर्पित करते हुए हमें अपार प्रसन्नता का अनुभव हो रहा है।
प्रस्तुत अंक में गुरुवाणी शीर्षक के अन्तर्गत योगनिष्ठ आचार्यदेव श्रीमद् बुद्धिसागरसूरीश्वरजी म. सा. की कृति “आध्यात्मिक पदो” की गाथा ३० से ३५ तक प्रकाशित की जा रही हैं। इस कृति की गाथाओं के माध्यम से आध्यात्मिक उपदेश देते हुए अहिंसा, सत्यपालन, आहारादि से संबंधित साधारण जीवों को प्रतिबोध कराने का प्रयत्न किया गया है। द्वितीय लेख राष्ट्रसंत आचार्य भगवंत श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. के प्रवचनों की पुस्तक Awakening' से क्रमबद्ध श्रेणी के अंतर्गत संकलित किया गया है, जिसके अन्तर्गत जीवनोपयोगी प्रसंगों का विवेचन प्रस्तुत किया गया
___ अप्रकाशित कृति के अंतर्गत ज्ञानमंदिर की कार्यकर्ती सुश्री मीनाक्षी शिन्दे के द्वारा संपादित कृति “दस दृष्टांत सज्झाय” प्रकाशित किया जा रहा है। इस कृति के अन्तर्गत मानव भव के दुर्लभ दस दृष्टान्तों का वर्णन किया गया है। द्वितीय अप्रकाशित कृति के रूप में आर्य श्री मेहुलप्रभसागरजी द्वारा सम्पादित “सतरहभेदी पूजा” प्रकाशित की जा रही है, जिसके अन्तर्गत प्राचीन आचार्य मुनि श्री जिनगुणप्रभसूरिजी ने जिनपूजा का महत्त्व व उसकी विशेषता बतलाते हुए सतरहभेदी पूजा का वर्णन किया है। यह कृति अद्यावधि प्रायः अप्रकाशित है।
पुनःप्रकाशन श्रेणी के अन्तर्गत इस अंक में "श्वेताम्बर सम्प्रदाय के ८४ गच्छ” प्रकाशित किया जा रहा है, जिसमें मुनि जिनविजयजी ने श्वेताम्बर सम्प्रदाय के ८४ गच्छों का तथा उनमें कालान्तर में आए हुए उतार-चढाव का विस्तार से वर्णन किया
है।
आशा है, इस अंक में संकलित सामग्रियों के द्वारा हमारे वाचक अधिकाधिक लाभान्वित होंगे व अपने महत्त्वपूर्ण सुझावों से हमें अवगत कराने की कृपा करेंगे, जिससे अगले अंक को और भी परिष्कृत किया जा सके।
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||3011
॥31॥
आध्यात्मिक पदो
आचार्य श्री बुद्धिसागरसूरिजी
(हरिगीत छंद) अद्वैत आत्मसमाधिमां वेदो समाइ सहु रह्या, भाषा परा पश्यंती मध्यम वैखरी ए ते वह्या; वेदो अनन्ता उपजता ने विणसता क्षण क्षण वळी, एवी अमारी वेदनी छे मान्यता निश्चय खरी. भाषा अने मन वर्गणानां दलिक वेदो जाणवां, प्रत्यक्ष ज्ञानी देखतो अनुभव बळे मन आणवां; आ सर्व दुनीआ वेद छे हो ज्ञेय ज्ञाता भेदथी, एवी अमारी वेदनी छे मान्यता निश्चय खरी. अक्षर अनक्षर वेद छे देखो गुरू गमने लही, स्याद्वादथी समज्या विना एकान्तथी जाशो वही; कजीया करो नहि वेदना नामे कदाग्रह आदरी, एवी अमारी वेदनी छे मान्यता निश्चय खरी. स्वाति अने हरिभद्रनां वचनो ज वेदो गुण भर्यां, सर्वज्ञ हेमाचार्यनां वचनो ज वेदो दिल धर्यां; सम्यक्त्व ने चारित्र छे वेदो हृदय श्रद्धा वळी, एवी अमारी वेदनी छे मान्यता निश्चय खरी. प्राचीन सघळु सत्य नहि ने जूठ पण नहि जाणवू, माध्यस्थ्यरूपीवेदथी साचुं हृदयमां आणवू; वेदो प्रगटता संप्रति ज्ञानी हृदयमां अवतरी, एवी अमारी वेदनी छे मान्यता निश्चय खरी. आत्मा कबूले अनुभवे ते वेद छे जन जन प्रति, शुभ वाच्य वाचक वेद छे श्रुत ज्ञान पूर्वक शुभमति; गीतार्थनो अनुभव लहो जाशो न मिथ्यात्वे छळी, एवी अमारी वेदनी छे मान्यता निश्चय खरी.
॥35॥ (क्रमशः)
॥32॥
||33||
॥34॥
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Awakening
Acharya Padmasagarsuri The third method of worshipping Inana is to get books published; to read them; to encourage others to read them; and to convey to others our knowledge through discussions, discourses or to write books to be read by others.
The purpose of celebrating Jnanapanchami is to worship knowledge in these three ways.
We have explained briefly the significance of three festivals, Akshaya Tritiya, Deepavali and Jnanapanchami. Now we shall discuss, in some detail, the significance of the fourth festival, Kartik purnima.
Kartik purnima has acquired significance on account of three reasons. On that day the Shravakas and Shravikas (the Jain devotees) go in a group on a pilgrimage to Shatrunjaya, an important pilgrim centre. Anyone would be greatly delighted and elated to see the crowds of pilgrims thronging the foot of Siddhachala early in the morning, at four ‘o'clock. Children, adults and old people keep rushing towards the place displaying their devotion and piety.
What is the meaning of the pilgrimage to Siddhachal? It is actually a pilgrimage to Siddhashila. By going there the pilgrims get great joy. Their emotions become ennobled. Many destroyed their karmas and attained salvation by this means. Pilgrims are thrilled, when they touch the pudgals (the matter). The current of piety runs through the hearts of the pilgrims.
The second reason is the religious wandering of ascetics. Their travelling is free from attachments. They do not develop attachment for any place. Here is a famous statement.
“बहता पानी निर्मला, बँधा सो गन्दा होय । साधू तो रमता भला, दाग न लागे कोय॥"
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आचार्य श्री जिनगुणप्रभसूरि विरचित सतरह भेदी पूजा स्तवन
संपादक - आर्य मेहुलप्रभसागर कृति परिचय प्रसिद्ध श्लोक में जिनपूजा का महत्व बतलाया गया है -
उपसर्गा: क्षयं यान्ति, छिद्यन्ते विघ्नवल्लय:।
मन: प्रसन्नतामेति, पूज्यमाने जिनश्वरे ॥१॥ परमात्मा की पूजा से सभी उपसर्गों का क्षय हो जाता है, विघ्नरूपी लताएँ छिन्न हो जाती हैं, मन विषादरहित अपूर्व प्रसन्नता को प्राप्त करता है।
जिनपूजा की महिमा आगमों, टीकाओं आदि अनेक स्थानों पर गणधरों, गीतार्थों सहित सभी ने गाई है।
आगमकाल से लेकर अब तक के उपलब्ध शास्त्राधारों में जिनपूजा संबंधी विविध उल्लेखों में जिनपूजा के अनेक भेद-प्रभेद वर्णित हैं। विविध अपेक्षाओं से जिनपूजाएँ एक, दो, तीन, चार, पाँच, छ:, आठ, चौदह, सतरह, इक्कीस, एक सौ
आठ और एक हजार आठ आदि अनेक प्रकार की उल्लिखित हैं। जिनमें वर्तमान परिपाटी में प्रतिदिन अष्टप्रकारी पूजा का विधान अतिप्रचलित है। शेष प्रकार के विधान कुछ प्रचलित हैं तो कुछ अप्रचलित भी हैं। ___अद्यावधि प्राय: अप्रकाशित और ४२५ वर्ष से अधिक प्राचीन पूज्याचार्य श्री जिनगुणप्रभसूरिजी महाराज द्वारा रचित प्रस्तुत सतरह भेदी पूजा स्तवन में जिनपूजा के सतरह भेदों को बताकर श्रावक को सम्यक्त्व निर्मल करने हेतु प्रतिदिन करणीय बताया गया है।
राजप्रश्नीय सूत्र एवं ज्ञाताधर्मकथांग सूत्र में सूर्याभदेव और द्रौपदी के द्वारा अपनी ऋद्धि के साथ विविध द्रव्यों से जिनपूजा करने का उल्लेख है, जिसे सर्वोपचारी पूजा कहते हैं। इसी सर्वोपचारी पूजा का विकसित रूप सतरह भेदी पूजा है। उपदेश तरंगिणी, संबोध प्रकरण, जिनलाभसूरिकृत आत्मप्रबोध आदि में सतरह भेदी पूजा का वर्णन है, परंतु उसके क्रम और प्रकार में अंतर पाया जाता है।
प्रस्तुत स्तवन में सतरह भेद इस प्रकार बताये गये हैं- १. स्नपन पूजा, २. विलेपन पूजा, ३. वस्त्रयुगल पूजा, ४. वास पूजा, ५. पुष्पारोहण, ६. मालारोहण,
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खरतरगच्छ
खरतरगच्छ
खरतरगच्छ
श्रुतसागर
जून-२०१८ ७. वर्णकारोहण, ८. चूर्णारोहण, ९. इंद्रध्वजा, १०. आभरणारोहण, ११. पुष्पघर, १२. पुष्पप्रकट, १३. अष्टमंगल, १४. धूपोत्क्षेप, १५. जिनगुण गीत गान, १६. नृत्यनाटक और १७. वाजिंत्र पूजा। कृति की रचना में अपभ्रंश बहुल शब्दों का प्रयोग किया गया है।
इस प्रकार की सतरह भेदी पूजा का प्रचलन सत्रहवीं शताब्दी में विशेष रूप से हुआ प्रतीत होता है। उस काल में अनेक विद्वानों ने इस पूजा की रचना की है, उपलब्ध सूची इस प्रकार है| १७ भेदी पूजा साधुकीर्तिजी
वि.सं.१६१८ १७ भेदी पूजा नयरंगजी
खरतरगच्छ वि.सं.१६१८
अप्रकाशित १७ भेदी पूजा स्तवन श्रीसारजी
वि.सं.१६४२ १७ भेदी पूजा स्तवन वीरविजयजी खरतरगच्छ वि.सं.१६५३
अप्रकाशित १७ भेदी पूजा स्तवन जिनगुणप्रभसूरिजी
१७वीं शताब्दी १७ भेदी पूजा
सकलचंद्रजी तपागच्छ १७वीं शताब्दी १७ भेदी पूजा स्तवन पार्श्वचंद्रसूरिजी बृहन्नागपुरीय १७वीं शताब्दी
तपागच्छ १७ भेदी पूजा स्तवन | समरचंद्रजी पायचंदगच्छ १७वीं शताब्दी १७ भेदी पूजा जिनसमुद्रसूरिजी खरतरगच्छ वि.सं.१७१८
अप्रकाशित १७ भेदी पूजा स्तवन । धर्मवर्धन गणि
१८वीं शताब्दी १७ भेदी पूजा सज्झाय उपा.यशोविजयजी । तपागच्छ १८वीं शताब्दी
गणि | १७ भेदी पूजा रास - ज्ञानसागरजी अचलगच्छ । वि.सं.१७९७
इनके अतिरिक्त अमरविबुध, रत्नचंद्र, मेघराज, मालदेव, जीतचंद, जीवराज, गुणसागरसूरि, विजयानंदसूरिजी, आचार्य जिनमणिप्रभसूरि एवं अज्ञातकर्तृक पाँच रचनाएँ भी सतरह भेदी पूजा की प्राप्त होती हैं।
प्रस्तुत कृति खरतरगच्छ साहित्य कोश में क्रमांक १७४५ पर अंकित है। कर्ता परिचय
'खरतरगच्छ के बृहद् इतिहास' के अनुसार खरतरगच्छ की बेगड शाखा के आचार्य श्री जिनमेरुसूरिजी के पट्ट पर आचार्य श्री जिनगुणप्रभसूरिजी बिराजे।
खरतरगच्छ
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June-2018
SHRUTSAGAR आपका जन्म वि.सं. १५६५ के मार्गशीर्ष सुदि चतुर्थी को हुआ था।
जूठिल कुलशृंगार मंत्री भोदेव के पुत्र देदा के पुत्र नगराज-नागलदे माता के आप पुत्र थे। जन्मपत्नी के अनुसार आपको दीर्घायु, भाग्यवान व राजप्रतिबोधक जानकर, अपने पूर्वज कुलधर की इच्छानुसार एवं त्रिपुरादेवी के संकेतानुसार सं. १५७५ में बड़े समारोहपूर्वक दीक्षा देकर मुनि भोजकुमार नाम रखा गया। ___ सं. १५८२ फाल्गुन सुदि ४ गुरुवार के दिन जोधपुर में पट्टाभिषेक करने का निर्णय आचार्य जयसिंहसूरि, उपाध्याय भावशेखर, उपा. क्षमासुन्दर, उपा. ज्ञानसुन्दर आदि की उपस्थिति में किया गया। पट्टाभिषेक के अवसर पर श्री गंगेव राव सहित अनेक नगरों के संघों को साग्रह आमंत्रण दिया गया। नंदी महोत्सवपूर्वक बड़गच्छनायक श्री पुण्यप्रभसूरि द्वारा सूरिमंत्र दिलाकर आचार्य श्री जिनगुणप्रभसूरि नाम की स्थापना की गई।
सं. १५८७ आषाढ़ वदि १३ गुरुवार को विजय वेला में जैसलमेर पधारे। रावल देदास के पट्टधारी श्री जेतसीह ने आचार्यश्री को मोतियों से बधाया एवं चातुर्मासपर्यन्त अमारि प्रवर्तित की। रावलजी आपको अपना गुरु मानते थे।
आपने रावल मालदेव कृत विशाल समारोह में वि.सं. १६१२ के भाद्रपद सुदि नवमी गुरुवार के दिन आचार्य श्री जिनमाणिक्यसूरिजी के शिष्य सत्रह वर्षीय मुनि सुमतिधीरजी महाराज को आचार्य पदारोहण विधान के साथ आचार्य श्री जिनचन्द्रसूरि नाम से प्रसिद्ध किया।
शासन की महती प्रभावना कर, ७२ वर्ष पर्यन्त संघ का नेतृत्व कर सं० १६५५ वैशाख वदि ८ को तिविहार और ग्यारस को संघ साक्षी से डाभ के संथारे पर १५ दिन संलेखना पूर्णकर, ९० वर्ष ५ मास ५ दिन का आयुष्य पूर्णकर वैशाख सुदि ९ सोमवार को जैसलमेर में स्वर्ग सिधारे । आपके स्मारक स्तूप की प्रतिष्ठा सं० १६६३ में हुई जिस पर २१ पंक्तियों का अभिलेख उत्कीर्णित है।
आपके द्वारा रचित चित्रसंभूत संधी, नवकारगीत आदि शताधिक रचनाएँ प्राप्त होती हैं। विभिन्न साहित्यिक साक्ष्यों से इनके ६ शिष्यों- गुणसागर, कमलसुन्दर, मतिसागर, पं. भक्तिमंदिर, ज्ञानमंदिर, जिनेश्वरसूरि आदि का उल्लेख मिलता है। प्रति परिचय ___ बीकानेर चातुर्मास वि.सं.२०७४ के दौरान अभय जैन ग्रंथालय में संरक्षित प्राचीन प्रतियों के अवलोकन का अवसर मिला। जिनमें प्रस्तुत कृति की आदर्श प्रति गुटका संख्या १०१७ की पृष्ठ संख्या २४८अ से २५२अ पर लिखी हुई है। इस प्रति में प्रत्येक पृष्ठ पर तेरह पंक्तियाँ और प्रत्येक पंक्ति में १६ अक्षर लिखे गये
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श्रुतसागर
जून-२०१८ हैं। मध्य में रक्तवर्णीय वापिका स्वरूप स्थान सुशोभित है। गुटका की पुष्पिका इस प्रकार है- 'संवत् १६५४ वर्षे कार्तिक वदि १३ दिने शुक्रवारे श्री मुलत्राण नगरे। पं० रतनसीहेनालेखि पुस्तिकेयं ॥ उकेसवंसे बुथडा गोत्रे । सा० धनराज तत्पुत्ररत्न चि० तिलोकसी पठनार्थं ॥ शुभं भवतु ॥' ___अनुवाद- वि.सं. १६५४ में कार्तिक वदि १३ के दिन यह पुस्तिका मुलतान (हाल पाकिस्तान) नगर में रतनसिंह ने ओसवाल वंश में बोथरा गोत्रीय श्री धनराज व उनके पुत्र श्री तिलोकसी के लिये लिखी है।' ____ अभय जैन ग्रंथालय की प्रति को आदर्शप्रति मानकर प्रस्तुत संपादन किया गया है। पाठांतर व पाठशुद्धि हेतु आचार्य श्रीकैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर कोबा की हस्तप्रति संख्या ६२४२१ का उपयोग किया गया है। प्रति सहर्ष उपलब्ध करवाने के लिए कोबा ज्ञानमंदिर के संचालकों व अभय जैन ग्रंथालय के प्रमुख श्री विजयचंदजी नाहटा और श्री रिषभजी नाहटा का सादर आभार।
सतरह भेदी पूजा स्तवन आदिजिण पमुह चउवीस तित्थंकरा, वंदीयइ प्रहसमइ भत्तिभर निब्भरा। भणिसुं हुं सतर वर भेद पूजा तणी(तणा), जासु अधिकार छइ आगमे अतिघणा ॥१॥ इंद्र चउसट्ठि नइ अवर वर देवता, पूज अरिहंतनी करइ नितु सेवता। न्हवण विलेवण वत्थजुग वासनी, पुप्फ नइ माल वलि वर्ण वर चूर्णनी ॥२॥ इंद्रधज आभरण फूलघरे वासी ए, अष्ट' मंगल लिखी धूप गुण भास ए। नाटक वाजिन पूज सतरइ सही, गुरुय गणधार श्रीसूत्र माहे सही ॥३॥
॥वस्तु ॥ आदि भवियण आदि भवियण भगति धरि चित्ति। निर्मल तनु धोवति धरीय, करीय वयण मुखकोस सुंदर। कलस भरी कंचण तणउ, सुरिहि नीर श्रीजैन मंदिरू। आवी निसही नमिणी२ करी, जिनपडिमा अविलोय३ । जतन सुं जयणा करी अंग पखालीइ सोयी'५
॥ढाल॥ अंग पाखाली(पखाली) मनह रंगि अंगलूहणउ६ कीजइ। पहिली पूजा एम करी नरभव फल लीजै।
॥४॥
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बावन्न चंदन्न“ नव कपूर केसर कसूतूरी" । निर्म्मल नीरहि घसीय हेमपिगाणी पूरी करइ विलेपन वार वार नव अंगि उदार । करण(चरण) जानु कर खंध सीस उर उदर विचार | तिलक करीजइ भालियलि वलि कंठ सुठाण १२ । इणिपरि बीजी पूज एह जिणसासणि जाण२३ जिनवरनइ जिम देवराय दीष्या४ नइ अवसरि । दिव्यवस्त्र५ बहु भावसुं पिहरावइ" सुंदरि । तिम जिनप्रतिमा तणीय पूज करतां मन भावइ । सुरंग सुगंधा" वस्त्रुजुगलि" प्रभु नइ पहिरावइ ।। ढाल जम्मावसी नी ॥
हिव चउथी पूजा करणहार, नव चंदन केसरि घसि विचार । अधिवासीय मृगमद्द नव कपूर, तिणि वासि वसइ वर वासु भूर प्रभु अंगइ करीयइ वासखेव, सुणि पंचम पूजा प्रकार हेव । जिम सुरपति सुरतरु कुसुम माल, पंच वर्णइ परिमल घण रसाल नव सोवन चंपक महमहंति, वर केतकि केवडउ सुविहसंति । तिम मरुयउ मोगर दमण पान, सेवंत्रीय जूहीय नवल वान अरविंद गुलाल सुकुंद जाइ, नव पाडल वेउल सुम सुहाइ । इम छूटे फूले करीय पूज, हिव माला कंठइ छठीय पूज
९
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आठमी पूज अरिहंतनी, सीतल सुरभि घनसार रे । चूरण वास वली चूरीइ, पूरीय पुन्य भंडार रे
नवमीय पूज इम निरखीय े, सोवन कलस धज दंड रे । महामहोच्छव मंडिउ, दीजइ दान अखंड रे
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June-2018
॥५॥
॥६॥
11611
11211
11811
॥१०॥
॥ ढाल ॥
सातमी पूज सामी तणी, हिव करइ समकित धार रे 1 वर्ण पंचइ करी वर्णवी, अंगि अंगी रची सार रे जोवउ जोवउ श्री जिनसासणइ, पूज तणी परि एह रे ।
भगति भावइ करी कीजतां, लाभइ लाभइ भव तणउ छेह रे जोवउ ०॥१३॥
॥११॥
॥१२॥
जोवउ ०||१४||
जोवउ ०।।१५।।
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जून-२०१८
॥१६॥
कांने ०॥१७॥
कांने ०॥१८॥
कांने ०॥१९॥
कांने ०॥२०॥
श्रुतसागर
॥ ढाल॥ दसमी पूज दयालनी सखि, उलटि अंग न माइ२२ रे । रतन जडित सिरि रूयडउ सखि, मुगट भर्यउ मनि भाइरे कांने कुंडल झलहलइ सखि, दीपइ जिम दिनकार रे। सुर नर ना मन मोहती सखि, जिनप्रतिमा सिणगार रे कंठ निगोदर कंठलउ सखि, माणिक मोती हार रे। बाहे अंगद बहरखा सखि, करता अति झबकार रे३४ फूलघरउ५ इग्यारमी सखी, रचीय तोरण माल रे। मंडप मंडी फूलनां सखि, चंद्रोदय चउसाल रे फूलपगर भर भूमिका सखि, बारमी पूजा ठाण रे। समवसरणि जिनवर तणइ सखि, देव करइ जिम जाण रे
॥ढाल ॥ विस्तर पूजा कहीयइ तेरमीजी, सोवन थाल विसाल। निर्मल चाउल रूपा तणेजी, लिखीयइ मंगल माल भवियण भावइ जिनवर पूजीयजी, वंछित फल दातार। गोत्र तिथंकर श्रेणिक बांधीउजी२६, ठाणा अंगि विचार दर्पण नइ भद्रासण भलउजी, मछजुगल आकार। वर्द्धमान सिरिवछ सोहताजी, पूनकलस सहकार२९ सुक्खकारणसन मन' साथीउजी, नंद्यावर्त्ति २ विचार। धूप उखेवण पूजा चवदमीजी, कृष्णागर घनसार जिनगुण गावइ पूजा पनरमीजी, सर संगीत सुजाण । मधुर सरइ करि जनम रंजवइजी, फलीयइं भाव प्रमाण
॥ढाल उल्लाला॥ समवसरण जिम सुरवर, देवप्रभावइ अपछर । अनुप मंडीयइ अवसर, नाटक नाचइ मणहर रिमझिम रिमझिम झंझर, घम घम घंम घंत घुग्घर । खलकइ सोवन चूडी, नाचइ हरषइ रूडी तिम जिनमंदिर सावइ, भगति भणी मन भावइ।
॥२१॥
भवि०॥२२॥
भवि०॥२३॥
भवि०॥२४॥
भवि०॥२५॥
॥२६॥
॥२७॥
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SHRUTSAGAR
June-2018 मद्दलताल कंसाला, वीणा वंस विसाला
॥२८॥ इणिपरि वाजित्र वायइ, अंगइ हरष नमाइ। सतर ए पूजा ए सारी, भविण(भवियण) नइ सुखकारी
॥२९॥ करीय शक्रस्तव भावइं, जिनवंदन इम सावइ । निर्मल समकितधारी, इणपरि हवय भवपारी
॥३०॥ ॥दहा ॥ जिनसासन जिनवर तणी, पूजा प्रगट प्रमाण । द्रव्य भाव भेदइ करी, जाणउ चतुर सुजाण
॥३१॥ आगम माहे अतिघणी, पूजा विवध प्रकार। समकितधारी सुर तणइ, वली विसेष विचार
॥३२॥ रायपसेणी जांणीयइ, जीवाभिगम विचार । न्याता अंगइ निरखीइ, सतर भेद सुविचार
॥३३॥ तिणि परि श्रावक सवि करइ, समकित निर्मल थाइ। तवनबंधि ते मइ कही, सगुरु तणइ सुपसाइ
॥कलश॥ इम जैनशासन धरीय वासन, दुरिय नासन दुहहरो। जिनबिंब पूजी करीय वंदन, सकल नंदन सुहकरो। श्रीचंद्रगच्छइ साख खरतरगच्छ वेगड सुंदरो। श्रीजैनगुणप्रभसूरि सुहगुरु सीस जंपै जयकरो"
॥३५॥ ॥इति सतरभेदी पूजा स्तवनं ॥
पाठांतर १. फूलघर, २. अट्ठ, ३ नाटिका, ४. गरुय, ५. कही, ६. चित्त, ७. निरमल, ८. तन, ९. तणा ए, १०. सुरहि, ११. मंदिर, १२. नमणि, १३. अवलोइ, १४. परखालै, १५. सोइ, १६. अंगलूहण, १७. यह पङ्क्ति आदर्शप्रति में नहीं है, १८. बावन चंदन, १९. कस्तूरि, २०. हेमपिंगाणी, २१. करै करै, २२. सुठाणि, २३. जाणि, २४. दीक्षा, २५. देववस्त्र, २६. पहिरावै, २७. सुगंध सुरंगा, २८. वस्त्रयुगलि, २९. सुम, ३०. मन हरषीयै, ३१. मंडीयै, ३२. दीजै दीजै, ३३. मायै, ३४. यह गाथा कोबा की प्रति में नहीं है, ३५. फूलघड्यो, ३६. बांधीयोजी, ३७. सिरि, ३८. पूर्णकलस, ३९. सुविसाल, ४०. सुक्खकारण, ४१. उत्तम, ४२. नंदावर्त्त, ४३. यह पद नहीं है, ४४.स्वरै, ४५. जनमन, ४६. घुम घुम घुम घुम, ४७. रंगै नाचै ए, ४८. सुसाख, ४९. सदगुरु, ५०. सुहकरो॥
||३४||
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सोमविमलसूरि रचित दश दृष्टांत सज्झाय
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मीनाक्षी आर. शिंदे
दुर्लभतानी ज्यारे वात आवे त्यारे मानवजन्म तरफ स्वाभाविक ध्यान आकृष्ट थाय छे। केमके शास्त्र-ग्रंथोमां मनुष्यभवदुर्लभतानी वातो ठेर ठेर अने भारपूर्वक टांकवामां आवी छे अने ते गुरुभगवंतोना प्रवचनादिना माध्यमे अवार-नवार श्रवणगोचर थती रहे छे. तेमां पण वात ज्यारे दृष्टांत साथे समझाववामां आवे छे त्यारे अघरी वात पण आबालवृद्ध सर्वेने सरलताथी समझाई जाय छे. नरभवनी दुर्लभता दर्शाववा माटे अहीं १०-१० दृष्टांतो आपवामां आव्या छे. तेथी ज आ कृति 'दश दृष्टांत सज्झाय' तरीके उल्लेखित छे.
जैन गुर्जर कविओ (भा.२ पृ. ७) मां आ कृतिना नाममां ‘सज्झाय’ शब्दनी जग्याए 'गीतो' शब्द वापरवामां आवेल छे जे वधु संगत जणाय छे. श्रीयशोविजय जैन ग्रंथमाळा व्यवस्थापक मंडळ भावनगर द्वारा वि. १९७३मां प्रकाशित ऐतिहासिक सज्झायमाळा (भा-१ पृ.४) अन्तर्गत सोमविमलसूरिना परिचयमां आ कृतिना नाममां 'गीता' शब्द वापरेल छे. जैन परंपरानो इतिहास (भा. ३ पृ. ६८९) मां पण 'गीता' शब्द जोवा मळे छे. आचार्य श्रीकैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, कोबा स्थित आ ज कृतिनी एक प्रत नं.१०३५३मां 'दस दृष्टांत गीतानि संपूर्णानि एवं जोवा मळे छे. अमारा द्वारा संपादन माटे आधार तरीके लीधेल प्रतमां 'सज्झाय' शब्द उल्लेखित होवाथी अमे ते राखेल छे.
संपादन पद्धति-संपादन पद्धतिमां अमें एक प्रतने आदर्श राखी प्रधानताए तेनो पाठ संपादनमां राखेल छे, अन्य प्रतना पाठांतरोने फुटनोटमां मूक्या छे. आदर्श प्रतमां पण अशुद्ध पाठने फुटनोटमां राखी तेनी जग्याए अन्य प्रतमांथी मळता शुद्ध पाठोनें स्थान आपेल छे. संपादनमां वापरेल त्रणेय प्रतोमां आदर्श प्रतने A तथा अन्य बे प्रतोने B अने C नो संकेत आपेल छे. प्रतोनी विशेष माहिती प्रत परिचयमां आपी छे. कृति परिचय :
दश ढाळ अने ७५ गाथाओमां निबद्ध आ कृतिना प्रारंभे कर्ता द्वारा निर्मळ मति हेतु कृति रचनामां भगवती सरस्वतीनी प्रार्थना करवामां आवी छे. कृतिमां आवती त्रिपदी ढालो, भाव, प्रासबद्ध शब्द- वाक्य संरचना कृतिने विशिष्टता तो बक्षे ज छे
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श्रुतसागर
जून-२०१८ साथे-साथे कर्तानी काव्य-कुशलतानो परिचय पण आपे छे. कृतिमां प्रथम ढालना गाथांकना स्थानो अने छंदरचना वच्चेना समन्वयमां प्रश्न थतां अन्य बे प्रतो जोतां त्रणेय प्रतोमा भिन्नता नजर आवी. तेमांथी प्रत नं. ५११८८ना गाथांक स्थानो छंद साथे वधु सुसंगत थतां जणायां (तेमां पण गाथांक १ थी ४ सुधी ज आपेल छे, पछी गाथांकनो उल्लेख नथी, ४ सुधी अपायेल गाथांकोना आधारे आगळनी गाथाओना छंदन अनुमान थई शके छे) जेनो अमे प्रस्तुत प्रतमां उपयोग कर्यो छे. जेथी १८ गाथानी जग्याए ते मेटर १२ गाथामां समाई जाय छे. आ ढालमां एकांतरे षट्पदी तेमज चतुष्पदी गाथाओ आपवामां आवेल छे. शेष ढालोना गाथांकस्थान यथावत् राखेल छे.
प्रस्तुत कृतिमां एक-एक दृष्टांतनी एक-एक ढाल आपतां दश दृष्टांतोनी दश ढालो आपेल छे. १०-१० दृष्टांतो साथे गेय पद्योमा प्रस्तुत थतुं तत्त्वज्ञान वाचकने सुरुचिकर बने तेवू जणाय छे. मानव अवतार पाम्या पछी सर्वप्रथम तेनी महत्तानु भान थर्बु अने ते सार्थक करवा उद्यत बनवू घणु ज अगत्यनु होय छे. ते माटे एक प्रबळ माध्यम आ कृति कही शकाय. १६मी सदीना अंते अने १७मी सदीना प्रारंभ काळनी वच्चे थयेल आ कर्तानी रचना आम तो समझाय तेवी छे छतां १० दृष्टांतोनो संक्षिप्त परिचय अत्रे रजु करवामां आवे छे.
दश दृष्टांत संक्षिप्त परिचय १. चुल्लक दृष्टांत
चुल्लक अर्थात् भोजनगृह. ब्रह्मदत्त चक्रीए प्रसन्न थईने एक ब्राह्मणने छ खंडना बधा घरमा क्रमशः भोजन करवानी अनुमति आपी. चक्रवर्तीना घरथी प्रारंभ करी छ खंडना तमाम घरो पूर्ण करी पुनः चक्रीना घरनुं स्वादिष्ट भोजन आ जन्ममां प्राप्त करवू ते ब्राह्मण माटे जेम दुर्लभ छे तेवी ज रीते मनुष्य जन्म पण पुनः मळवो दुर्लभ
२. पासक दृष्टांत
देव द्वारा प्रसन्न थईने आपेल पासाओ वाळा चाणक्यने पराजित करवो जेम दुष्कर छे, तेवी ज रीते मानव जन्म पुनः मळवो दुर्लभ छे. ३. धान्य दृष्टांत
समस्त भरतक्षेत्रना धान्यनी गगनस्पर्शी राशिमा मिश्रितरूपथी नाखेल एक प्रस्थ (शेर) प्रमाण सरसवने काढवा एक कंपायमान देहवाळी, कमजोर आंखोवाळी वृद्धा माटे जेम अघरुं छे, तेवी ज रीते मनुष्य अवतार दुर्लभ छे.
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June-2018 ४. धुत दृष्टांत
१०८ स्तंभ, ए प्रत्येकना १०८ खूणा वाळा सभाभवनना प्रत्येक खूणाने द्युतमां जीती जq जेम कठिन छे, तेवी ज रीते पुनः मनुष्यजन्म मळवो कठिन छे. ५. रत्न दृष्टांत
सुरक्षित मूकेला रत्नोनुं ध्यान राखवान कार्य पुत्रोने सोंपी कृपण धनिक पिता ग्रामान्तर जतां पुत्रोए तेनो देश-देशांतरोमां व्यापार करी दीधो. हवे पाछा आवेला पिता माटे ते रत्नो एकत्र करवा मुश्केल छे, तेवी ज रीते मनुष्यजन्म मळवो मुश्केल छे. ६. स्वप्न दृष्टांत
मूलराज अने सन्यासीने मुखमां चंद्र प्रवेशनुं स्वप्न आवाथी सन्यासी द्वारा ज्यां त्यां फलपृच्छा करवाथी मळेला उत्तर अनुसार फलस्वरूपमां सारं खावा- मळ्यु. मूलराजने सारा स्वप्नपाठकने पूछवाथी फलस्वरूप राज्य मळ्यु. मूलराजने मळेल राज्यथी सन्यासीने पण राज्यनी इच्छा थई अने ते पुनः एज जग्याए तेवा स्वप्ननी इच्छाथी दररोज सुवा लाग्यो. परंतु पुनः एवं स्वप्न आवq जेम असंभव छे, तेवी ज रीते मानवभव मळवो मुश्केल छे. ७. चक्र दृष्टांत
एक स्तंभ पर सीधा अने उलटा क्रममां फरता चार-चार चक्र, एना उपर राधानामक फरती पुतली, एनी डाबी आंखने स्तंभनी नीचे राखेली तेलनी कढाईमां जोईने बाणथी बींधवी जेम मुश्केल छे, तेवी ज रीते मनुष्यजन्म पुनः मळवो अत्यंत दुर्लभ छे. ८. कूर्म दृष्टांत
सरोवरने ढांकीने रहेल सेवाळमां छिद्र पडवाथी काचबाने शरदपूर्णिमाना चंद्रना दर्शन थई जाय छे, परंतु तळिए रहेल परिवारने बोलाववा जतां सुधीमां ए छिद्र बंध थई जाय छे. ए काचबाना परिवारने पुनः चंद्रदर्शन थq जेम दुर्लभ छे, तेम मनुष्यभव मळवो दुर्लभ छे. ९. युग दृष्टांत ____ असंख्य योजन विस्तृत स्वयंभुरमणसमुद्रना पूर्वभागमां कोई देव द्वारा बळदगाडीनी धोसरी राखवामां आवे अने पश्चिममा एना छिद्रमां आववा वाळी समेल (खीली) राखवामां आवे तो ए एना छिद्रमा लागी जवी जेटलु कठिन छे तेम मानवभव पण दुर्लभ छे.
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जून-२०१८ १०. परमाणु दृष्टांत
कोइक देव द्वारा माणिक्यस्तंभने वज्रप्रहारथी तोडीने बारीक भूको बनावीने एक नळी(भुंगळी)मां नाखीने मेरुपर्वतनी टोच पर रहीने जोरथी चारे बाजु फुकी देवामां आवे अने पछी ए कणोने एकत्र करी पुनः स्तंभ बनाववो जेम दुष्कर छे एम प्रमादमां गुमावेलो मनुष्य अवतार पण दुर्लभ छे. कर्ता परिचय:
सोमविमलसूरिनो जन्म वि.१५७० मां खंभात पासेना कंसारी गाममां पोरवाड मंत्री समधरना वंशना शाह रूपवंतनी पत्नी अमरादेवीनी कुक्षीथी थयो. नाम जसवंत राखवामां आव्यु. तेमणे ४ वर्षनी उमरे वि.१५७४ ना वैशाख शुक्ल ३ ने शनिवारे रोहिणी नक्षत्रमा अमदावादमां हेमविमलसूरिना हाथे मुनि सौभाग्यहर्षना शिष्यरूपे संघपति भूलाचना पुत्र जसुए करेला उत्सवमां दीक्षा लीधी अने नाम मुनि सोमविमल राखवामां आव्यु. सौभाग्यहर्षसूरिए मुनि सोमविमलने वि.१५९०ना फागण वद ५ ना रोज खंभातमां 'गणिपद' आप्यु. जेमां प्राग्वाट ज्ञातीय शाह कीकुए घणो द्रव्य खर्च को. वि. १५९४ना फागण वद ५ना रोज सिरोहीमां पंन्यासपद, वि. १५९५मां वीजापुरमा उपाध्यायपद' तथा वि.१५९७ना आ० सु० ५ने गुरुवारे अमदावादमां गुरूजीना हाथे ‘सूरिपद' तथा संघे वि.१६०५ना माह सुदि ५ना रोज खंभातमां 'गच्छनायकपद' आप्यु. तेमनुं वि. १६३६-३७ना भादरवा वदि पांचमना दिवसे स्वर्गगमन थयु.
तेमणे अजारी तीर्थमां सरस्वतीनी आराधना करी वरदान मेळव्यु. कान्हमदेशना वणछरा गाममां पं० आनंदप्रमोदने उपाध्यायपद' अने आमोदमां 'विद्यारत्न' विद्याविजय गणिने ‘पंन्यासपद' आप्यु. __ तेमना उपदेशथी विजापुरना दोशी तेजाए ‘सिद्धाचलनो छ'री पालित यात्रासंघ काढ्यो, जेमां ३३ साधु भगवंतो हता. जेमां ४ लाख द्रव्य खरच्यु हतुं.
तेमणे वि. १५९९मां पाटणमां, वि. १६००मां दीवमां, धोळकामां, खंभातमां, वि. १६०१मां आमोदमां, वि. १६०२मां अमदावादमां, वि. १६०३मां अमदावादमां, गोलनगरमां, ईडरमां वि. १६०८ना राजपुरना चोमासा बाद वि. १६०९मां रहबीदपुरमां, वि. १६१९मां खंभातमां, वि. १६२०मां नंदूरबारमां, अने वि. १६२३मां अमदावादमां एम जुदा जुदा स्थळोमां अभिग्रहो लीधा हता, तेमज ते दरेक पूरा थया हता. तेमणे वि. १६११मां पाटणमां अंजनशलाका प्रतिष्ठा करावी. ते “शतार्थीबिरुद”ना धारक हता.
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June-2018 कर्तानी अन्य कृतिओ
तेमणे वि. १५९१मां “गौतमपृच्छा-टबो”, वि. १६०२मां कुमारगिरिमां “श्रेणिक रास', वि. १६०३मां “नवतत्त्वलोक”, वि. १६०५मां “कल्पसूत्र टबो, संघचरित्र, नवकार चौपाई', वि.१६१५मां खंभातमां “धम्मिलकुमार रास', वि. १६२२ना श्रावण सुद ७ शुक्रवारे “विराटनगर"मां “चंपकश्रेष्ठि रास', वि. १६२७मां “दशवैकालिक टबो, विपाकसूत्र-टबो”, वि. १६३३मां अमदावादना राजपरामां “क्षुल्लककुमार रास" वि.१६४५मां “पट्टावली सज्झाय”, वि. १६५८मां “दश दृष्टांत गीता', कुमारगिरिमंडन शांतिनाथ स्तवन, दुहा ३८, पवलादिन प्रमाण अने लगनमान दुहा २५, स्तवन, गीतो वगेरे नी रचना करी. कर्तानी प्रभावकता
ते अष्टावधानी, इच्छालिपिवाचक, वर्धमानविद्या-सूरिमंत्र साधक, चौर्यादिभयनिवारक, संदेश द्वारा वंदनथी विविध रोगोना हरनारा इत्यादि प्रभाववाळा हता.
तेमने आ० आनंदसोम, आ० हंससोम (आ० हेमसोम), उ० देवसोमगणि, पं० विद्यारत्नगणि, पं० विद्याविजय गणि, पं० हर्षदत्त, पं० लक्ष्मीभद्र वगेरे २०० साधु शिष्योनो परिवार हतो.
कर्ता विषे वीस्तृत विवरण सोमविमलसूरि रास तेमज जैन परंपरानो इतिहास जेवा संदर्भ ग्रंथोमांथी प्राप्त थाय छे. अमें पण ऊपरोक्त माहिती ते संदर्भोना आधारे आपी छे. प्रत परिचय:
प्रस्तुत कृतिथी संबंधित त्रण प्रतो आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, कोबामां उपलब्ध छे. (A)१००१२७, (B)१०३५३ तथा (C) ५११८८. __प्रत नं.१००१२७ने आधार प्रति मानीने आ कृतिनुं संपादन करवामां आव्यु छे. लिपिविन्यास, लेखनकला तथा कागळ आदिना आधारे आ प्रत विक्रमनी १८मी सदी उत्तरार्द्धनी होय तेम लागे छे. आ प्रतमां कुल ५ पत्रो छे, तेमां प्रत्येक पत्रमा १३ पंक्तिओ अने प्रत्येक पंक्तिमां लगभग ३१ थी ३२ अक्षरो छे. प्रतमां गेरु लाल रंगथी अंकित विशेष पाठ छे. अक्षर मोटा अने सुवाच्य छे. आवश्यकतानुसार अमें पाठांतर माटे प्रत (B) १०३५३ तथा (C) ५११८८नो उपयोग करेल छे. प्रत (C) ५११८८ मां मात्र प्रथम ढाल ज आपेल छे. तेना केटलाक पाठो शुद्ध होवाथी तेटला पूरतो (प्रथम ढाल पूरतो) तेनो पण उपयोग करेल छे. त्रणेय प्रतना पाठांतरो फुटनोटमां
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॥२
॥
॥३॥
श्रुतसागर
जून-२०१८ दर्शावी जे पाठ शुद्ध जणायो छे तेने संपादनमां स्थान आप्यु छे. प्रतोथी पण स्पष्ट न थता एवा अमारा द्वारा दर्शावायेल शुद्धपाठ कोष्ठक ( ) मां मूकेल छे. प्रथम ढालना गाथांकस्थानो माटे प्रत (C) ५११८८नो उपयोग करेल छे.
॥१० दृष्टांत सज्झाय॥ भगवति सरसति मति दिउ' नरमली, बोलस्यु नरभव दश बोले वली, बोलसिउ नरभव तणा, दृष्टांत सार दस सोहामणा, सांभलु भवीअण भाव धरता, रंग आणी अति घणा
॥१॥ चुल्लग पासग धान्य जूअनइ, रयण समण कहइ वली। चक्र चर्म युग परमांण पूरा, एतलइ ए दश मली जंबूदीप भरत वषांणीइ, देस पंचाल माहे जाणीइ, जाणीइ तिहां कंपिल्य' पुर वर, सधर चक्रधर बारमु, ब्रह्मदत्त नामइ तेण गामइ, लीलाइ सुरपति समु बंभण एक तसु मिलण वांछइ, बालमित्र भूपति तणु। पगत्रांणनी धज करी अ मिलीउ, दीठइ आणंद अति घणु
॥४॥ तूठओ चक्रधर जंपइ ईणइ परिइं, मागि तूंसु रिज नजं(निज) जोई जोइ घरे। जे घरे जोईइ मित्र ताहरइ, माहरइ ते सहू अछड़। घरि जई पूछउ नारि माहरी, कहइ ते मागउं पछइ बंभण पूछइ जईनइ घरे, नारिनइ मूरिख पणइ। तूठडु चक्रधर सयल आपइ, किसु जोईइ आपणइ नारी' अ निज मनि जोईइ इम भणइ, गाम पुर घोडे खप नही आपणइ। आपणइ जोईइ भलु भोजन, सजन' सहित सोहामणुं।
दीनार उपरि एक मागु, कवण आपेस्यइ घj 1a भगवति सरसति मति दिउ bसरसति मुझ मति दिउ अति, सरसति भगवती मति दीउ 2aधन, bधान्य, ध्यान 3 किपल, bकंपिल्य cकंपिल्ल 4तूंस ज नीजं जोई, bतुसु रिज न जोई, तूंसु रिज नजं जोई 5aभूपति, bcचक्रधर, 6acनारी, bसारी 7aपरि, bcपुर 8 acसुजन, bसजन
॥
५
॥
॥६
॥
॥७॥
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॥८
॥
॥९॥
॥१०॥
॥१२॥
SHRUTSAGAR
June-2018 जेतलइ भूपति आण वरतइ, तेतलइ' घर घर प्रतिइं जईअनइ भूपति कन्हलि मागइ, भोलाविउ रामा मतिइ भाखई भूपति नरपति तुंहनइ', करवा समरथ सिउं कहिउं मुहनइं'। मो कन्हलि ए तिइ किसिउं मागिउं, अरे मूरिख बांभणा घरणि ताहरी अछइ भोली, न जाणइ गुण अवगुणा ते कहइ वलतुं सुणु स्वामी, एतलुं दिउ मूंहनइं। सयल लोक समुख्य भूपति, कहइ दीधउ तुहनइ पहिलउ ए भोजन चक्रधर घरे करइ, अनुक्रमि जिमतु सघले ते फिरइ। ते फरइ जिमतु घरे सघले, अंतेउर महि तातणे'। किम लहइ वारु वली वहिलु, भूपति घरि वरसे घणे
॥११॥ इम लही नरभव जेणि हारीओ, वली वलतु किम लहइ श्रीसोमविमलसूरिंद पहिलं, एह ऊठउ इम कहइ
॥ इति प्रथम भोजन दृष्टांत -१॥
॥ढाल त्रिपदी॥ पाडली पुरवर नयर वखाणउ चंद्रगुपति' नामइ तिहा जाणुं सपरांणु राणु अछइ ए ॥१॥ तस घरि चाणिक नामिइ महितु अभयकुमार मंत्री बुधि' (बुद्धि) धरतु भरतु घर भूपति तणुं ए
॥२॥ 1 Ac तेतला, bतेतलइ 2 aहाकइ, bभाखइ, cभाखि 3 aतेहनइ, bतुंहनइ, cतुहनी 4aमोहनइ, bcमुहनइ 5 कन्हली, bमुं कनि, cमुझ कनि 6aमूरिख, bcमूरख 7acतातणे, bभिमहितातणा 8aवहिलु, bcवलतु 9 चंद्रगुपतिभूपति 10 aमुहतु, bमहितु 11 aबुधि, bमति
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जून-२०१८
॥३॥
॥४॥
॥५॥
श्रुतसागर
देवदत्त पासा अभिराम' दीनारे पूरिउ एक ठांम गाम लोक साथिइ रमइ ए जु हारेउ तु सघला लेज्यो जुजीपुं तु एक मुझ देज्यो जोज्यो लोभइ भोलव्या ए रमवा आविइ लोक लक्ष को न करइ तिहा कहिनु पक्ष दक्ष भला हारी वल्या ए देव प्रभावइ जीपइ कोई पणि नरभव हारीओ इम होइ सोई सहि गुरु इणि परि भणई ए
॥ इति पाशक दृष्टांत-२॥
॥ ढाल ॥ निज मनि कुतिग उपनइ, देवदानव कोइ। विद्याधर किंनर वली, जगि धांन जे होइ जोउ जोउ नरभव दोहिलु भमतां संसारि धान्य दृष्टांत हीइ धरी, बुझओ नरनारि ते सवि मेली एकठां, जरजूरण नारि। हाथि आपी कहइ जूजूआ, करि तुं सुविचार डोकरडी करडी प्रतिइ, सुणता चडइ टाढि । आढउ सरिसव माहीथी, तु अलगा काढि
॥६॥
॥१॥
॥द्रुपद।। ॥२॥
॥जोउ०२॥३॥
॥जोउ०२॥४॥
1 अभिगम 2aलख्य, bलक्ष 3 को कहिनउ तिहो न करइ 4वलइ 5 कहइ 6 चढी ताढि
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॥१॥
बा०॥४॥
SHRUTSAGAR
23 देव तणा महिमा थिकु, कण जूजूआ होइ। सोमविमलसूरि इम भणइ, नरभव हारिओ न होइ ॥जोउ०२॥५॥
॥ इति धान्य दृष्टांत तृतीय-३॥
॥ढाल॥ प्रथवी' मुगट नगर वर जाणुं', राजा तिहां जितशत्रु' निज प्रताप तेजइ करी लीणु, जीता सघला सत्रुजी बापडला जीवडला, कां न करइ जिनधर्म । मंडप थंभ जूअ दिठंतइ, दोहिलु ए नर जन्म जी
॥२॥ तस घरि सुबुधि नामि वर महितु', पुत्र एक सपरांणु। पिता तणुं राज लेवा वांछइ, कहइ सुबुधि नरपति'' जाणु जी बाप०॥३॥ राय सुबुधि बुधि एहवी मांडइ, जु जू रमता जीपइ। मंडपि थंभि अठोत्तरसु छइ'', होसि तेतली दीपइ' जी वार एतली सुत'' तुं जीपइ, तु ए राज तहारुओ। वार एतली वचि जुहारइ, तु ए राज्य अम्हारुं जी देव आराधि तेह जइ जीपइ, पणि नरभव लही जीणइ हारीओ सोमविमलसूरि ईम जंपइ', दोहिलु एह जमारु जी
बा०॥६॥ 1 पृथवी 2 मुकुट 3 नामि 4a जतसत्र, bजितशत्रु 5a जनधर्म, bजिनधर्म 6 aसबधि, bसुबुधि 7 aमहंतु, bमहितु 8a धन, bराज 9aकहु, bकहइ 10 aसबधि, bसुबुधि 11 नृप 12 a अठोत्तर संचइ, b अठोत्तरसु छ। 13 जीपइ 14aसत, bसुत 15 बोलइ
बा०॥५॥
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श्रुतसागर
श्रीनगर रतनपुर जाणीइ, सुरपुर समु वखाणीई । आणीइ अवर उपम कहु तस तणी ए
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रतनसागर विवहारी अ', रतन तणु व्यापारी अ । सारीइ रतन रासि मेलइ घणी ए
रतन एक नवि खरचइ ए, घणां घणेरा संचइ ए । वरचइ ए रतन े घणउ ते राखिवा ए
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॥ इति जूअ (द्युत) दृष्टांत चतुर्थ - ४ ॥ ॥ ढाल बाहुली॥
एकवार कुण कामइ ए, गयु एकणि गामइं ए। ठामइ ए ते रतन मेल्ही, सवि आपणां
पुत्र रतन सवि' वावरइ ए, देसाउरि' लेई चलावई' ए । वस्तरइ देस वदेसइ जूजूआ ए
रतनसागर आव्या घरे, रतन गयां कहुसी परे । सुंदरे कहइ ए तुम्ह पुत्रि वावर्या ए
रतन सवे ते किम मलइ, सुरसानिधि आस्या फलइ । नवि मिलइ मणूअ जनम लही हारीओ ए ईम दोहिलु भव पांमीइ, धरम करु सवि धामीइ । स्वामीइ सोमविमलसूरि इम भणइ ए
॥ पांचमु रत्न दृष्टांत -५॥
॥ ढाल ॥
1 व्यवहारीया 2 जितन
दिवसइ सूतु कापडी, सुहणइ एहवुं दीठ । पूनिम पूरु चांदलु, निज मुखमाहि पईठ
3 aसव्य, bसवि 4 परदेसी
5 संचरि
6 सामीअ हेमविमसीस
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जून - २०१८
॥सही ए०॥१॥
॥ सही ए ० ॥२॥
॥ सही ए० ॥३॥
॥ सही ए० ॥४॥
॥ स० ॥ ५॥
॥स०॥६॥
॥सही ए०॥७॥
॥ सही ए०॥८॥
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भविअण भाव भलु धरी, पालु जिनधर्म सार । सुपन तणी परि दोहिलु, मानव भव' अवतार जाग्यु ए पूछइ कापडी, सुहिणा तणु अ विचार । गुलधी' सहित रोटिलु, पांमसि आखु सार आहार लेवाए ते गयु, पांम्यु तेह आहार । दिवस केतले ते सुणिउ, मूलदे सुपन विचार सुपन लहयानइ कारणिइ, मांडइ अधिक उपाय। पणि ते सुहिणुं' किम लहइ, ते किम थाइराय देवजोगइ' ए ते लहइ, न लहइ हारिउ नरजन्म । सोमविमलसूरि इम भणई' इम जाणी करि धर्म
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5 कहइ 6 aसमति, bसुमति 7 aरतिवती, bऋतुवती
॥ इति सुपन दृष्टांत- ६ ॥
।। ढाल वीवाहलानी ॥
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इंद्रपुर नयर सोहामणुं, तिहां इंद्रदत्त राय रूलीआमणुं ए राणी अ तसु बावीसु ए, बेटा बावीस पूरइ जगीसु ए पुत्री अ सुमति' मंत्री तणी ए, राय परणी अ रुपि रंभा भणी ए । कसइ एक बोलइ परहरी ए, एक दिन देखीनइ आदरी ए तिणि दिनि हंती ऋतुवती' ए, रहिउ आधांन हुई पुत्रवती ए। ते दिन तिहांथी लेखविउ ए, निअ वहीइं महितइ ते ठविउ ए तिणि दिनि दासी अ चिहुं तणा ए, पुत्र च्यार हुआ सोहामणा ए । वाधइ पंच महिता घरइ ए, नवि जाणइ भूपति तिणइ परि ए सुरेंद्रदत्त नाम सहु कहइ ए, रायनंदन कोई नवि लहइ ए । पंडित पढावा राखीउ ए, दिनि थोडे ते सवि सीखीआ ए 1 मणूअ जनमि 2 थीगुल
3 सुणु 4 देवतियोगि
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।।द्रुपद।।२।।
भवी०॥३॥
भवी०॥४॥
भवी० ॥५॥
भवी०॥६॥
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॥२॥
॥३॥
॥४॥
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॥७॥
॥८॥
॥१०॥
श्रुतसागर
जून-२०१८ बावीस बेटा रायना ए, ते नवि भणीआ मूरख एक मना ए।। ईणइ अवसरि मुथरापुरी ए, राजा जित्रसत्र (जितशत्रु) गज रथ बहतरी ए ॥६॥ नरवृत पुत्री तेहनइ ए, नृप चिंतइ वर जोईइ एहनइ ए। पूछइ ए पुत्री कवण तुझ, वर जोई अ कीजइ कहि मुझ स्वामि सुरेंद्रदत्त मइ वरिउ ए, कला लक्षण कोडिइ परवारिओ ए। तेह राधावेध साधसि ए, जग माहे तस जस वाघसिइ ए सयंवर मंडप तिहां करइ ए, राय राणा सघला नहुतरइ ए। जितशत्रु समस्त परिवारसिउ ए, सहु आवइ निअ मनि हरखसिउ ए ॥९॥ चक्र दोइ खंभ उपरि धरइ ए, अवलानइ सवला ते फरइ ए। चक्र वचिइं छइ पूतली ए, जोवू हेर्छ तेलमाहे वली ए तस दृष्टि बाणइ वेधीइ ए, राधावेध ईणी परि साधीइ ए। इंद्रदत्त हरख घरइ घणओ ए, मुझ परिवार बहुल बेटा तणु ए नरवृत्त कन्या जे वरइ ए, मुझ राजनु भार ते उद्धरइ ए। पुत्र बावीसनइ नहीं कला ए, इंद्रदत्तइ मेहल्या मोकला ए ॥१२॥ सुमतिसुता सुत आणीओ ए, राय भाखड्यु कुण वाणीओ ए। सुमति कहइ तुम्ह राजबीज, नवि हुइ तु हुं करु अधीज लक्षणवंत गुण आगलु ए, राधावेध ते साधइ निरमलु' ए। नरवृत कन्या तिणइ वरी ए, सहु जयवर करइ मंगल करी ए राधावेध तेणी परिइं ए, नरभव छइ दोहिलु पुण्य करी ए। सोमविमलसूरी कहइ ए, पुण्य कीधइ वली वली ते लहइ ए
॥११॥
॥१३॥
॥१४॥
॥१५॥
1 aजत्रशत्रु, bजितशत्रु
2 सुमति
3थंभ 4 देवउ 5 मूक्या 6 सुणु 7aनरमलु, bनिरमलु
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॥ इति चक्र दृष्टांत- ७ ॥
।। ढाल उलालानी ॥
द्रह' कोई दीप मझारे, जोअण लाख विस्तारे । उंडउ सहस ते जोअण, वाटलु अति मन मोहन
तीहां वसिइ जीवना लाख, काछिब एक बहु साख । द्रह माहि घणु अ सेवाल, एक दिनि थयु विसराल
आसू पूनिम चंद, देखी हुओ अ आणंद । काछिब सुकटंब तेडइ, वहिला हो वार न' जेडइ काछिब सकटंब आवीउ जेतइ, मलिओ अ सेवाल एते तइ । आव्या घणइ अ उमाहइ, नवि ते चंदलु चाह
नवि ते टलइ अ सेवाल, न देखइ चंद्र विशाल । नरभव ईणइए तोलइ, सोमविमलसूरि ईम बोलइ
॥ इति कच्छप दृष्टांत - ८ ॥
॥ आदि आदि जिणेसरू ए ढाल ॥
1 ग्रह 2 वेला बालन 3 aरतनभव, bनरभव
4 दरिउ
धुंसरु पूरव समुद्र पासइ, पश्यमइ समिल ज रही। वरसने सहसे एकठा, जु मिलइ सुरमहिमा सही
नरभव' लही जेणि, हारिओ' वली तेह लहइ नही । श्रीसोमविमलसूरिंद बोलइ, पुण्य कीजइ गहगही
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॥२॥
पूरव पूरव दसि ते धुंसरु ए, समिल समिल ते पश्यम पासितु ।
दोइ मिलइं किम एकठां ए, नवि मिलइ मिलइ वरस छ मासि तु पूरव२ द०॥१॥
॥३॥
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॥५॥
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पूरव० ॥३॥
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॥१॥
॥२॥
श्रुतसागर
जून-२०१८ ॥ इति युग दृष्टांत नवम-९॥
॥ ढाल लुहडाअजितानी॥ सुर किंनर कोई निअ मनि कुतिग कांमि, थंभ चूरण करीनइ पुहचइ सुरगिरि' ठामि । नलि चूरण पूरी दशो दशइ उडाडइ, ते सवि परमाणु क्षेत्र अनेकइ पाडइ वली थंभ करइ कोइ परमाणू लेई तेह, एहइ वली होइ हारिउ नरभव जेह। ते जो नवि लहीइ धर्म विना संसारि, ईम जांणी सूधओ धर्म करु नरनारि ईणइ परि दश बोले दोहिलु नरभव जांणी, सील समकित पालु अजूआलु निज प्रांणी। श्री हेमविमलसूरि गुरु वचने मन आंणी, श्रीसोमविमलसूरि बोलइ एहवी वाणी
॥इति दस दृष्टांत सज्झाय संपूर्णः॥न 1aसुरगरि, bसुरगिरि 2 जंपइ
श्रुतसागर के इस अंक के माध्यम से प. पू. गुरुभगवन्तों तथा अप्रकाशित कृतियों के ऊपर संशोधन, सम्पादन करनेवाले सभी विद्वानों से निवेदन है कि आप जिस अप्रकाशित कृति का संशोधन, सम्पादन कर रहे हैं अथवा किसी महत्त्वपूर्ण कृति का नवसर्जन कर रहे हैं, तो कृपया उसकी सूचना हमें भिजवाएँ, जिसे हम अपने अंक के माध्यम से अन्य विद्वानों तक पहुँचाने का प्रयत्न करेंगे, जिससे समाज को यह ज्ञात हो सके कि किस कृति का सम्पादनकार्य कौन से विद्वान कर रहे हैं? इस तरह अन्य विद्वानों के श्रम व समय की बचत होगी और उसका उपयोग वे अन्य महत्त्वपूर्ण कृतियों के सम्पादन में कर सकेंगे.
निवेदक सम्पादक (श्रुतसागर)
॥३॥
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June-2018
श्वेताम्बर संप्रदायना ८४ गच्छ
मुनि जिनविजय श्वेतांबर संप्रदायना त्यागी वर्गना जूना ८४ गच्छ कहेवाय छे. आजे तो ए गच्छोमांना घणा खरा गच्छ लुप्त थइ गया छे अने तपागच्छ, खरतरगच्छ, पायचंद गच्छ, अंचलगच्छ, लुंकागच्छ, कमलागच्छ एवा ५-६ आधुनिक गच्छोनां नाम ज जोवा सांभळवामां आवे छे. पण बसो त्रणसो वर्ष पहेलां ए जूना गच्छोमांना घणा खरा हयात हता, अने दरेक गच्छना यतिओ अने श्रावको विद्यमान हता. नवा गच्छोमां तपागच्छ अने खरतरगच्छ ए बे गच्छो घणा मोटा अने प्रभावशाली हता. ए गच्छोनी पाछी अवांतर शाखाओ पण हती जेमा तपागच्छनी १८ अने खरतरगच्छनी ११ तो प्रसिद्ध कहेवाती. आ बन्ने गच्छोना यतिओनी संख्या हजारोथी अने श्रावकोनी संख्या लाखोथी गणाती. अकबर बादशाहना वखतमा तपागच्छना प्रतापी आचार्य जगद्गुरू श्रीहीरविजयसूरिनी-एकलानी ज आज्ञामां प्रवर्तनारा प्रायः बे हजार यतिओ हता, अने तपागच्छना ज बीजा बीजा आचार्योना शिष्यो वळी तेटलाज जुदा हशे. ए ज वखतना खरतर गच्छना आचार्य श्रीजिनचंद्रसूरिना आज्ञानुयायी यतिओनी संख्या पण तेटली ज मोटी हती. क्रमे क्रमे आ गच्छोना यतिवर्गनी संख्या घटती गई अने आजे तो मात्र नामनी ज संख्या बाकी रही छे. ज्यारे आवा महान् गच्छोनी आ स्थिति थइ छे त्यारे बीजा नाना गच्छोनी तो हयाती पण क्यांथी होय. हवे तो ए बधा गच्छो ऐतिहासिक स्मरणनी वस्तु रही गइ छे अने तेथी एमनां नामो मेळववां अने प्रसिद्ध करवां ए संशोधन- कार्य थई गयु छे. आ नीचे ८४ गच्छोनां नामोनी बे यादीओ आपवामां आवे छे. आ यादीओ बे जुदां पानामांथी उतारी लीधी छे. बने पानां लगभग १५० वर्ष जेटलां जूनां छे. एक पार्नु सं. १८३१ मां लखेलं, पूनाना ग्रंथ संग्रहमां छे. बीजं पार्नु सं. १९३९ मां लखेलुं होय तेम लागे छे. कारण के ए पानानी बीजी बाजुए, १८३९ ना मागसर वदी ११ ना दिवसे कोइए सिद्धाचळजीनी यात्रा करती वखते ए गिरिराज ऊपर केटलां दहेरां अने तेमां केटली जिनप्रतिमाओ विराजमान छे तेनी नोंध करेली छे. (आ नोंध अधुरी छे पण उपयोगी छे तेथी ए पण आगळ उपर जूदी आपवामां आवशे,) आ बन्ने यादीओमांनां नामोमां कांइक फेरफार अने शुद्धाशुद्धी जणाय छे तेथी बंने सरखी लाईनमां अहीं आपी छे.
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जून-२०१८
॥ ८४ गच्छ नाम लिख्यते॥
१ प्रथम ओसवाल गच्छ २ जीराउला गच्छ ३ वड गच्छ ४ पूनमीया ५ गंगेसरा गच्छ ६ कोरंडीया गच्छ ७ आनपुरा गच्छ ८ भरुअच्छा गच्छ ९ उढवीया गच्छ १० ग्याउआ गच्छ ११ डेकाउआ गच्छ १२ भीनमाला गच्छ १३ मुहडासीया गच्छ १४ दासख्या गच्छ १५ गच्छपाल गच्छ १६ घोषावाल गच्छ १७ मगओया गच्छ १८ ब्रह्मणीया गच्छ १९ जालोरा गच्छ २० बोकडीया गच्छ २१ मुझाहडा गच्छ २२ चितोडा गच्छ २३ साचोरा गच्छ
१ऊसवाल गच्छ. २ जीरावला गच्छ ३ वड गच्छ ४ चीत्रावाळ गच्छ ५ वेगसरा गच्छ ६ कोरंटीआ गच्छ ७ भरूअचा गच्छ ८ आतस गच्छ ९ उढविआ गच्छ १० गुदवीआ गच्छ ११ दकोडिया गच्छ १२ भीनमालीआ गच्छ १३ मुडासीआ गच्छ १४ दासविआ गच्छ १५ गच्छपाला गच्छ १६ घोषवाल गच्छ १७ मंगोडीआ गच्छ १८ ब्राह्मणीआ गच्छ १९ जालोरा गच्छ २० बोकडीआ गच्छ २१ मुडाहडा गच्छ २२ चीत्रोडा गच्छ २३ साचोरा गच्छ
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June-2018
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२४ कुचडीया गच्छ २५ सिद्धंतीया गच्छ २६ रामसेणीया गच्छ २७ आगमीया गच्छ २८ मलधार गच्छ २९ भावराजीया गच्छ ३० पलीवाल गच्छ ३१ कोरंडवाला गच्छ ३२ नागदिका गच्छ ३३ धर्मघोषा गच्छ ३४ नागोरा गच्छ ३५ उस्तितवाल गच्छ ३६ नांणावाल गच्छ ३७ सांडेरवाल गच्छ ३८ मंडोवरा गच्छ ३९ सुराणा गच्छ ४० षंभाइतिया गच्छ ४१ वडोदरिया गच्छ ४२ सोपारिया गच्छ ४३ मांडलीया गच्छ ४४ कोत्थोपुरा गच्छ ४५ जांगला गच्छ ४६ छापरीया गच्छ ४७ बोरसडा गच्छ ४८ दोवंदण गच्छ
२४ क्रुचडीआ गच्छ २५ रामसेणीआ २६ सिधतीआ २७ आगमीआ २८ मालधारी गच्छ २९ भावराजीआ ३० कोरंडवाल ३१ नागेंदरा ३२ धर्मघोष गच्छ ३३ नागोरी गच्छ ३४ उचीतवाल ३५ नाणावाल ३६ खंडेरवाल ३७ मंडोरा गच्छ ३८ नागराल गच्छ ३९ सुराणा गच्छ ४० खंभायती गच्छ ४१ वडोदरीया ४२ सोपारा गच्छ ४३ मंडलीआ ४४ कोठीपरा गच्छ ४५ जांगडा गच्छ ४६ बावरावाल ४७ बोरसडा गच्छ ४८ दोवंदणीआ
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जून-२०१८
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४९ चित्रावाला गच्छ ५० वेगडा गच्छ ५१ वाइड गच्छ ५२ विजाहरा गच्छ ५३ कुतपुरा गच्छ ५४ काच्छेलीया गच्छ ५५ रूदोलीया गच्छ ५६ महुकरा गच्छ ५७ कपूरसीया गच्छ ५८ पुनतल गच्छ ५९ रेवइया गच्छ ६० धूंधूका गच्छ ६१ थंभणीया गच्छ ६२ पंचवलहया गच्छ ६३ पालणपुरा गच्छ ६४ गंधारा गच्छ ६५ गुवेलीया गच्छ ६६ साधपूर्णिमा गच्छ ६७ नगरकोटीया गच्छ ६८ हिसारिया गच्छ ६९ भटनेरीया गच्छ ७० जीतहरा गच्छ ७१ जगायन गच्छ ७२ भीमसेणीया गच्छ ७३ तागडीया गच्छ
४९ चित्रावाल ग० ५० वेगडा ग० ५१ वायडा गच्छ ५२ विद्याहरा ५३ कुतगपरा ५४ कजोलीआ ५५ रूपालीआ ५६ देवकरा ५७ कहुईआ ५८ पूर्णतिलक ग० ५९ रेवईआ ६० कंधुआ गच्छ ६१ थंभणा गच्छ ६२ पंचवहीलीआ ६३ पालणपुरा ६४ गंधारपरा ६५.....पुरा ६६ साढपुनमीया ६७ मगरकोटी ग० ६८ सारकोटी ग० ६९ भटनेरा ग० ७० सोरठीआ ग० ७१ भीमसेना ग० ७२ आगडीआ ग० ७३ कंबोजा ग०
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८१.......
SHRUTSAGAR ७४ कंबोजी गच्छ
७४ वागेरा ग० ७५ सेबतां गच्छ
७५ वहीडा ग० ७६ वाघेरा गच्छ
७६ सिद्धपुरा ग० ७७ वाहेडीया गच्छ
७७ सेवंतरीआ ग० ७८ सीधपुरा गच्छ
७८ घोघारा ग० ७९ घोघरा गच्छ
७९ नीगमीआ ग० ८० नेगमया गच्छ
८० संजतीआ ८१ संजना गच्छ ८२ बरडेवा गच्छ
८२ बारेजा ग० ८३ मुरंडवाडा गच्छ
८३ सुरंडवाल ग० ८४ नागउला गच्छ
८४ नागोला ग० इति । सं. १८३१ वर्षे म० द्वि० वै० ३० दिने [आ पानानी अंते १२ मतनां नाम आप्यां छे जे नीचे प्रमाणे छे:] १ आंचलीयामत
१ आंचलीआमत २ पायचंदीयामत
२ पायचंदीयामत ३ वीजामत
३ बीजामत ४ आगमीयामत
४ आगमीयामत ५ काजामत
५ काजामत ६ तपामत
६ तपामत ७ लुंकामत
७ लुंकामत ८ पाटणीयामत
८ पाटणीयामत ९ साकरमत
९ साकरमत १० कोथलामत
१० कोथलामत ११ कडुआमती
११ कडुआमती १२ आत्ममती
१२ आत्ममती
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34
जून-२०१८
इति बारेमत नाम जाणवाः सः १८३१ व० म द्वी० वै० दिनेः महिनो द्वितीय वैशाख इति बारे मतनां नाम. [ आ नामोमांथी ९-१० जेवां नामो कांइक विलक्षण लागे छे. एनो शो अर्थ छे ते समजवामां आव्यो नथी]
गच्छोनां आ नामो जोतां जणाय छे के घणा भागे १३ मा १४ मा सैकामां जे गच्छो प्रसिद्ध हता तेमनां आ नामो छे. कारण के ते पछीना सैकामां जे तपागच्छ, खरतरगच्छ, वगेरे आधुनिक गच्छो वधारे प्रसिद्धिमां आव्या तेमनो निर्देश आ नामावलीमां नथी. जेम आ नवा गच्छो आगळ आवता गया तेम जूना गच्छो पाछळ पडता गया, अने धीमे धीमे लुप्त थता गया. आ नामावली उपरथी ए पण जणाशे के जूना गच्छोनां नामो घणा भागे ते ते गामोनां नामो उपरथी पड्यां छे. जेम श्रावकोनी जातोनां नाम तेमना मूळ उत्पत्तिना स्थानो ऊपरथी प्रसिद्धिमां आव्यां तेम आ यतिओना समुदायोनां नाम पण तेमनां मूळ उत्पत्ति स्थानोनां नामे ज प्रसिद्धिमां आव्यां हतां. आ तो मध्यकालीन गच्छोनां नामो छे पण प्राचीन कालीन गच्छो के जेमनां नामो कल्पसूत्रनी स्थिरावलीमां आपेलां छे तेमांना पण केटलाक आ रीते स्थळ विशेषना नामे ज प्रसिद्धिमां आव्या हता.
आ नामो ऊपरथी जैन यतिओनो निवास हिंदुस्थानना कया कया भागोमां ते वखते थयो हतो तेनो खयाल सारी पेठे आवी शके छे.
कल्पसूत्रनी स्थविरावलीमां जे कुल, गण के गच्छना नामो आवेलां छे ते संबंधी विगतवार वर्णन आ पछीना कोई अंकमां आपवामां आवशे. तेम ज आ यादीमां आपेलां नामो सिवाय बीजां पण गच्छनामो बीजी यादीओमां मळे छे ते पण यथावसरे आपवामां आवशे.
आ बधी सामग्री जैन धर्म अने तेना संप्रदायोनो संपूर्ण इतिहास लखवा माटे अति उपयोगी अने महत्त्वनी छे; तेथी वांचकोए आ विषयमां खास रस लेवानी जरूर छे.
(जैन साहित्य संशोधक, खंड - ३ अंक - १ से साभार)
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प. पू. गुरूमहाराजश्रीने मुंबई महानगरी में श्री गोवलियाटेक जैन श्वेतांबर मू. पू. संघ, श्री लेजन्ट जैन श्वेतांबर मू.
पू. संघ(वालकेश्वर), श्री मुठलिया जैन श्वेतांबर मू. पू. संघ, श्री कमलकुंज जैन श्वेतांबर मू. पू. संघ (चिवडागली) तथा श्री वर्धमान हाईट्स जैन संघ, भायखला में पावन पदार्पण किये और प्रवचन दिया
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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Registered Under RNI Registration No. GUJMUL/2014/66126 SHRUTSAGAR (MONTHLY). Published on 15th of every month and Permitted to Post at Gift City SO, and on 20th date of every month under Postal Regd. No. G-GNR-334 issued by SSP GNR valid up to 31/12/2018. 7 राधावेध चक्र 9 धुसरी नरभव दुर्लभता दृष्टांत चित्र 8कच्छप 10 मणिमय स्तंभ BOOK-POST / PRINTED MATTER प्रकाशक श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, कोबा जि.गांधीनगर 382007 फोन नं. (079)23276204,205,252 फेक्स (079)23276249 Website : www.kobatirth.org email:
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