Book Title: Sramana 1994 01
Author(s): Ashok Kumar Singh
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 99
________________ 97 जैन कर्मसिद्धान्त : एक विश्लेषण 'कर्मसिद्धान्त का विकास क्रम जैन कर्मसिद्धान्त का विकास किस क्रम में हुआ, इस प्रश्न का समाधान उतना सरल नहीं जितना कि हम समझते हैं । सामान्य विश्वास तो यह है कि जैन धर्म की तरह यह भी आदि है, किन्तु विद्वत्-वर्ग इसे स्वीकार नहीं करता है। यदि जैन कार्मसिद्धान्त के विकास का समाधान देना हो तो, वह जैन आगम एवं कर्मसिद्धान्त सिद्धान्त सम्बन्धी ग्रन्थों के कालक्रम आधार पर ही दिया जा सकता है, उसके अतिरिक्त अन्य विकल्प नहीं है । जैन मसाहित्य में आचारांग प्राचीनतम है। उस ग्रन्थ में जैन कर्मसिद्धान्त का चाहे विकसित उपलब्ध न हो, किन्तु उसकी मूलभूत अवधारणाएँ अवश्य उपस्थित है। कर्म से उपाधि बन्धन होता है, कर्म रज है, कर्म का आसव होता है, साधक को कर्मशरीर को धुन डालना हिए आदि विचार उसमें परिलक्षित होते हैं। इससे यह फलित होता है कि आचारांग के काल में कर्म को स्पष्ट रूप से बन्धन का कारण माना जाता था और कर्म के भौतिक पक्ष की स्वीकृति के साथ यह भी माना जाता था कि कर्म की निर्जरा की जा सकती है। साथ ही आचारांग में शुभाशुभ कर्मों का शुभाशुभ विपाक होता है, यह अवधारणा भी उपस्थित है। उसके कानुसार बन्धन का मूल कारण ममत्व है । बन्धन से मुक्ति का उपाय ममत्व का विसर्जन और समत्व का सर्जन है"। सूत्रकृतांग का प्रथम श्रुतस्कन्ध भी आचारांग से किंचित ही परवर्ती माना जाता है। सूत्रकृतांग के काल में यह प्रश्न बहुचर्चित था, कि कर्म का फल संविभाग सम्भव है या नहीं ? इसमें स्पष्ट रूप से यह प्रतिपादित किया गया है कि व्यक्ति अपने स्वकृत कर्मों का ही विपाक अनुभव करता है । बन्धन के सम्बन्ध में सूत्रकृतांग स्पष्ट रूप से कहता है कि कुछ व्यक्ति कर्म और अकर्म को वीर्य (पुरुषार्थ) कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि कर्म के सन्दर्भ में यह विचार लोगों के मन में उत्पन्न हो गया था, कि यदि कर्म ही बन्धन है तो फिर अकर्म अर्थात् निष्क्रियता ही बन्धन से बचने का उपाय होगा, किन्तु सूत्रकृतांग के अनुसार अकर्म का अर्थ मष्तिष्यता नहीं है। इसमें प्रतिपादित है कि प्रमाद कर्म है और अप्रमाद अकर्म है। वस्तुतः किसी क्रिया की बन्धकता उसके क्रिया-रूप होने पर नहीं, अपितु उसके पीछे रही प्रमत्तता या प्रमत्तता पर निर्भर है। यहां प्रमाद का अर्थ है आत्मचेतना (Self-awareness) का प्रभाव । जिस आत्मा का विवेक जागृत नहीं हैं और जो कषाययुक्त हैं, वही परिसुप्त या प्रमत्त और जिसका विवेक जागृत है और जो वासना - मुक्त है वही अप्रमत्त है । सूत्रकृतांग में ही क्रियाओं के दो रूपों की चर्चा भी मिलती है 1. साम्परायिक और 2. ईर्यापथिक 7 1 Jain Education International द्वेष, क्रोध आदि कषायों से युक्त क्रियायें साम्परायिक कही जाती है, जबकि इनसे रहित कियायें ईर्यापथिक कही जाती हैं। साम्परायिक क्रियायें बन्धक होती है, जबकि ईर्यापथिक धनकारक, नहीं होती। इससे इस निष्कर्ष पर पहुचते हैं कि सूत्रकृतांग में कौन सा कर्म धन का कारण होगा और कौन सा कर्म बन्धन का कारण नहीं होगा, इसकी एक कसौटी प्रस्तुत कर दी गई है। आचारांग में प्रतिपादित ममत्व की अपेक्षा इसमें प्रमत्तता और कषाय को न का प्रमुख कारण माना गया है। For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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