Book Title: Shatak Prakaranam
Author(s): Veer Samaj
Publisher: Veer Samaj

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Page 13
________________ किण्हनीलकाओलेसाम चोहसजीवट्टापाणि लम्भन्ति, तेउपमहाक लेसाम सनिपचिदियऊत्तगो अत्तगो य लम्भा, कर. णअपजत्तगो गहिओ, द्धिअपजत्तगस्स हेठिल्ला निन्नि लेसा भवन्ति । भवं ति, भाषामवाण वि दोण्ह वि चोइस वि। 'समत्ते' त्ति, सम्महिठी रूगवेयगउवसम्माससम्मामिच्छमिच्छदिरटी य, नन्ध वेयगउसमसायसम्मदिदठीसु दो दो जीवटठाणाणि मनिपज्जत्तभपज्जत्तगाणि, अपज्जत्तगो ति करणमपज्जत्तगो, सम्मामिच्छद्दिठी सनिपज्जत्तगो एव, सासणसम्महिठी बायरएगिन्दियकन्दियते इन्दियचउरिन्दि यअसनिपचिन्दियलदिए पज्जत्तम करणपाजतगेमु भिपजत्तपज्जत्तगेमु य, मिच्छदिद्विरस चोदवि । समिति, रुनि श्री य, निकिन्दिप मोतूण संसा बारसवि अस. निणो, सनिपचिन्दिपम दो जीबरठाणाणि । आहारंग त्ति, आहारमा मणाहारगा य, तत्थ माहारगंमु चोदसवि, मणाहारगेम सत्तवि अपज्जत्तगा मनिपज्जत्तगी यलम्भा, केलिसमुन्घाए तिचउत्थप बमसमदम् अणाहारगो लम्मद ॥ ५ ॥ जीवहाणाणि ममाणहाणेमु मग्गियाणि, स्याण सेस उवओगणिरूषणत्यं भन्ना एकारसम तिय तिय दोसु चउकं च बारसंगम्मि जीवसमास एवं उवभोगविही मुणयबा ।। ६॥ ___ व्याख्या-'पकारसंसु तिय 'त्ति । पकार संसु जीवाणसु, पगिन्दिया कत्तारि, बन्दियतेन्दियपत्रगामपज्जत्तगा, चउरिन्दियभरूभिरूधिमजतगा य ५८ ५कारस. १८सु पकारससु पसंयं यं तिनि तिनि उपभोगा भवन्ति,तं जहामाअाणं सुयभनाणं भचपखुदसणं नि । 'दासु नउ, ति, दाम जीवाणेमचउरिन्दियपतंगमु अरुचिपळसगेमु य पत्तयं पसेयं चत्तारि उक्ओगा भवन्ति, जहा पुस्तुताणि लिनि चपखुदंसणं च, ते पिकन्ति त्ति काउं, 'बारसंगम्मि'ति, सनिपजत्तगम्मि पुम्दुसा पारस वि उवमोगा भवन्ति । कंबलणाम सहितंक? ति चेत् ? उच्यते-दव्यमसहितत्वात् समिति बुषा । पत्थ अपजत्तगगहण भिपजसगो गहिभो, करणभपजतो पतगगह गहिमो । जीवसमासे एवं उपभोगविही मुणेयम्धे नि, कण्ठचम ॥ ६ ॥ उवोगा जीवममाम्म भणिया, याणि जोगा भनि

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