Book Title: Shatak Prakaranam
Author(s): Veer Samaj
Publisher: Veer Samaj
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उदीरेह । उवसन्तकसाओ सब्बद्धासु पचव उदीरेइ । 'संसारगयम्मि भयणिजत्ति- उवसन्तकसाओ संसारम्मि भयणिजो ति लचं बोहिलाभ भयणिज्जो विणासह वि ण विणासेड वि॥३४॥
छप्पश्च उदीरिन्तो बन्धइ सो छविहं नणुकसाओ। अट्टविहमणुहवन्तो सुकमाणा डहइ कम्मं ॥ ३५ ॥ व्याख्या-'छप्पञ्च' त्ति 'तणुकसाओ' सुहुमरागो, सो उनिहं बन्धर, छब्धिहं पञ्चविहं या उदीर, आवलिकावसेसे पञ्चविहं उदीरेति, मेसकाले छविह। अविहमणुभवन्तो सम्बद्धासु अदुविहं चैव वेपद 'मुक्कझाणा डहनि कम्म' त्ति मोहणिज्जकम्मं 'डहइ' विणामेइ 'मुक्कझाणग्गहणं किं णिमित्तं इति चेत् ? भन्नइ, मेदीए धम्मसुकझाणाई सविगप्पाई अविरुवाद' त्ति तद्बोधनार्य तु सुकज्झाणग्गहणं ॥ ३५॥
अढविहं वेयन्ता छबिहमुईरन्ति सत्त बन्धन्ति । अनियट्टी य नियट्टी अप्पमत्तजई य ते निन्नि ॥ ३६॥ व्याया--' अट्ठविहं वेयन्ता 'त्ति अट्ठषिहपि कम्मं वेएन्ति, माउगवेयणियवजाणि छकम्माई उदीरन्ति, आउगवजाणि सत्त यन्धन्ति. अणियट्टी य णियट्टी अप्पमत्तई य ते तिनि । अप्पमत्तो अट्ठविहंपि बन्धातच किंण मणियं इति चेत् ? भन्ना, अप्पमत्तो आउगबन्धाढवणं ण करेइ, पमत्तेण आदणं बन्धा त्ति तस्सूयणत्थं न भणियं ॥ ३६ ॥
अवसेसट्ठविहकरा वेयन्ति उदीरगावि अट्टहं । सत्तविहगा वि बेइन्नि अटुगमुईरणे भज्जा ॥ ३७॥ व्याख्या-'अवसेस 'त्ति भणियसेसा जे अट्ठविहबन्धका मिच्छार जाव पमत्तसंजो ते सव्ये अट्ठविहं वेदन्ति, अट्ठविहं चेव उदीरेन्ति । कम्हा ? आउगवन्धकाले मावलिकासेर्स उगं ण भवर त्ति का | 'सत्तविहगावि वेइन्ति भट्ठगं'ति ते बेव मिच्छादिविणो पमतन्ता सत्तविहबम्धकाले ते सव्वे मढविहं णियमा वेपन्ति । 'उहरणे भजति उदीरणं पहुंच सत्तविहं वा उदीरेन्ति, अविहं वा जाव अप्पप्पणो माउगस्स भावलिकायसेसे ताव अङ्कविहं उदीरम्ति । मावलिकापबि?

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