Book Title: Shatak Prakaranam
Author(s): Veer Samaj
Publisher: Veer Samaj
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शतक
॥१५॥
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दिनमाण करोति जिणपूयाए मं.क्तमग्गठियाणं च विग्धकरी अहवा साहूणं भक्त्तपाणडवगरण सहमेस वा पडिसेहेद, सब्बसत्ताणपि दाणलामभोगपरिभोगधिग्धं करेछ, परस्स विरियमवहरह, परं गलाबन्धणणिरोहाईहि णिचेट्ठ करेह, कण्णणासजीहछेपणाईहिं इन्द्रियबलणिग्धायकरणेहिं पाणवहाईहिं य अजेद अन्तराइयं । 'ण लहर जेणिनियं लाभ' दाणलाभभोगपरिभोगबिग्घजणयं बलविरियणिग्वायकरणं च अन्तराइयं कम्म बन्धर, जेण इच्छियं लाई न लभइ ॥ २६ ॥ सामनविसे पच्चया भणिया । इयाणि जेसु ठाणेसु बंधर सि एयं भन्न
ट्टाणा चउरो तिनि य उदयस्म होन्नि ठाणाणि । पंच य उदीरणाए संजोगं अउ परं बाच्छ्रं ॥
ठाणगे सत्तट्टविहं बन्धन्ति निसु य सत्तविहं । छविहमेगो निभेगबन्धगाबन्धगो एगो ॥ २७ ॥
व्याया- 'उसु ठाणगेषु सत्तविहं बन्धन्ति 'ति अट्टकम्माणि णाणावरणाइणि, छम ठाणके सत्तविहं अविहं या बन्धन्ति मिच्छादिट्ठी सासणअसंजय सम्मदिट्ठी संजयासंजयपमत्त संजय मपमत्त संजया में एपसु छसु टाणेसु वट्टमाणा आउगबन्धकालं मोतृणं मेसं सव्वकालं मत्तविहं बन्धन्ति आउगबन्धकाले ते चैव अटठविहं बन्धंति सव्वे आउ बन्धन्ति त्ति काउं । 'तिसु य सत्तविहं 'ति सम्मामिच्छद्दिस्टी, अपुब्धकरणो, अणिपट्टी य, आउगबजाओ सत्तकम्मपगडीओ बन्धन्ति । सम्मामिच्छद्दिट्ठी तेण भावेण ण मरह ति आउगं ण धम्ति, अपुव्धकरणो अणियट्टी य अच्चन्तविसुद्ध ति काउं । 'छन्विहमेगो' ति एगो सुटुमरागो आउगमोहवज्जाओ छ कम्मपगडीओ वन्धर, वायरकसायाभावातो मोहणीयं न बन्धइति । आउगस्स वृत्तं । 'तिनेगविहं (बंधगा) नि तिन्नि उवसन्त खीण सजोगि केवल य एगविहं बन्धर वेग्रणियं, मेसाणं कसाओदयाभावात् बन्धो णत्थि, सजोगिणां प्ति कांउं वेयणीयस्स बन्धो भवर । 'अबन्धगो एगो प्ति अजोगि केवलिस्स जोगाभावाओं बन्धो णत्थि ॥ २७ ॥ इदाणीं उदओ बुच्चर
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चूर्णिः
॥१५॥

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