Book Title: Samayik Sutra
Author(s): Amarmuni
Publisher: Sanmati Gyan Pith Agra

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Page 326
________________ ३०६ यावत् नियम धर्म - ध्यान की उपासना है, युगल पापकारी कर्म मन, वच और तन द्वारा, कररण तीन योग से निभाता सामायिक सूत्र करके प्रतिक्रमण, निन्दा तथा गर्हणा में, स्वय नही करता हू और न कराता हूँ ! १० प्रणिपात सूत्र [ रोला की ध्वनि ] पापात्मा को वोसिरा के विशुद्ध बनाता हूँ ! नमस्कार हो आदि धर्म की कर्ता श्री स्वयबुद्ध हैं, भूतल के पुरुष - सिंह है, पुरुषो मे पुरुषो मे है श्रेष्ठ गन्धहस्ती से स्वामी, लोकोत्तम हैं, लोकनाथ है, जगहित - कामी ! लोक - प्रदीपक है, प्रति उज्ज्वल लोक-प्रकाशक अभयदान के दाता अन्तर चक्षु - विकाशक । मार्ग, शरण, सद्बोधि, धर्म, जीवन के दाता, सत्य धर्म के उपदेशक, अधिनायक त्राता । धर्म-प्रवर्तक, धर्म - चक्रवर्ती द्वीप - त्राण - गति-शरण-प्रतिष्ठामय श्रेष्ठ तथा ग्रनिरुद्ध ज्ञान दर्शन के धारी, छद्मरहित, प्रज्ञान भ्रान्ति की सत्ता टारी । राग-द्वेप के जेता और जिताने वाले, भवसागर से तीर्णं तथैव तिराने वाले । स्वय बुद्ध हो, बोध भव्य जीवो को दीना, Phco वीतराग ग्रर्हन् भगवन् को, तीर्थ कर जिन को । पुरुषो में उत्तम, अरविन्द महत्तम । ! जग-जेता, शिवनेता !

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