Book Title: Nandanvan Kalpataru 2015 08 SrNo 34
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti
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पद्मावती
क्रकोमलपद्मा लोचनपद्मा पदपङ्कजरेखितपद्मा, हृदये पद्मा । सौरभजितपद्मा निहतविपद्मा-रं जयिनी विलसत्पद्मा सद्मनि पद्मा ॥ परमप्रतिपद्मा वृतसंपद्मा-यातमसा मुक्ता पद्मा, सनसूतपद्मा । नतजिनपदपद्मा सनिधिपद्मा निजयाऽभिधया श्रीपदालङ्कृतपद्मा ॥१६॥
वृणुते वरकरणं विभ्रमसरणं सद्वृत्ता वणैर्विशदा, संस्कृतनिनदा । ततनवनवभावा गुणसदावा विमलंकमलदलकलचरणा सदलङ्करणा ॥ सङ्गीतकगीतिः सुघटितरीतिः, कण्ठगताऽतनुशं ददते, विरतिं दधते । रसजितमृद्वीका मधुरध्वनिका सुन्दरी जयति वषोडशिका ॥१७॥
(१८) इत्थं मया जलधिवर्गमिता(१६)महत्यः, सत्यः स्तुताः प्रवरवृत्तभवैः सदुक्तैः । वर्षे सहस्रयुगले शरचन्द्रयुक्ते (२०१५), माघेऽसितेऽन्तिमदिनेऽत्र धुरन्धरेण ॥१८॥
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