Book Title: Kupaksha Kaushik Sahasra Kiran Aparnam Pravachan Pariksha
Author(s): Dharmsagar, Narendrasagarsuri, Munindrasagar, Mahabhadrasagar
Publisher: Shasankantakoddharsuri Jain Gyanmandir

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Page 12
________________ [८] रोकाव्या, (५) पाटण रोकायेला ते माथाभारी उपाध्याय धनराजे 'जेसलमेरी कामळीओ' आपीने ८४ गच्छना यतिओने पोताना पक्षपाती बनावी दीधा होवा छतां पण पू. महो० श्री धर्मसागरजी महाराजे जेसलमेरथी पाटण आवी जाहेरसभामां खरतरना आ.श्री जिनचंद्रसूरि तथा उ.श्री धनराजनी साथे वि. सं. १६१७मां जाहेर वाद करीने तेओने पराभवित कर्या अने 'पू. अभयदेवसूरिजी म., खरतरना नथी ज' ते साबित करवा पूर्वक तपगच्छनो विजयध्वज फरकावेल, (६) सं. १६१८मां पू. लब्धिसागर गणि आदि १५ने प्रतिबोधी दीक्षा आपी, (७) प्रतिस्पर्धी जूथनो जोरशोरथी विरोधी प्रचार होवा छतां पू. महो० श्री धर्मसागरजीगणिनां शासनप्रभावक कार्योथी रंजित बनेला मेडताना जैनसंघे पज्यश्रीना सामैयामां ३००नेजा, ५०० बळदगाडा, १०८ बेडावाळीओ, पंचजन्य वाजिंत्रनाद पूर्वक भव्यातिभव्य नगरप्रवेश करावेल, (८) अमदावादमां गलाशेठ ५०० शेठीआओनी साथे दररोज व्याख्यान सांभळवा आवता अने पीरोजीनी प्रभावना थती हती !! आम पू. महोपाध्यायश्रीनी अने तेमना परिवारनी अर्थात् सागरसमुदायनी दिन प्रतिदिन वृद्धि पामती एवी दिगन्तव्यापिनी कीर्त्तिने जोइने ते प्रतिस्पर्धीवर्गे पोतानी प्रवृत्ति आटोपी लेवाने बदले पू. गच्छाधिपतिश्री विजयहीरसूरिजी म. ना, पू.आ.श्री विजयसेनसूरिजी म.ना तेमज पू.आ.श्री विजयदेवसूरिजीम. ना सत्तासमय सुधी पू. महोपाध्यायश्रीने तेमज पू. सागरगीतार्थोने वगोववा अने पू. गच्छनायकोनी पण 'प्रमाणिक ग्रंथो' तरीकेनी महोरछाप लागेला ग्रंथोने अप्रमाणिक गणाववा माटेनी जोरदार झुंबेश चालु राखी होवानुं तत्कालीन इतिहास पण साक्षी पूरी रहेल छे ज। प्रतिस्पर्धी उपाध्यायवर्गना जामेला आवा प्रचंड परिबळमां पण पू.आ.श्री विजयहीरसूरिजीम.नी पाटे आवेला पू. गच्छाधिपति आ.श्री विजयसेनसूरिजी महाराजे पण पू. महो० श्री धर्मसागरजीम.श्रीनी विद्यमानतामांज तेओश्रीना रचेला आ 'प्रवचनपरीक्षा' ग्रंथर्नु ज आलंबन लइने विक्रमसंवत् १६४२ तथा १६४३मां खरतरोनी साथे महाराज हरराजनी सभामा तेमज अमदावादना मोगलसुबा-खानखानानी सभामा वाद करीने तपागच्छनो विजयध्वज फरकावेल अने जेना परिणामे खानखानाना शाहीवाजिंत्रोना नाद साथे हाथीनी अंबाडीमां 'प्रवचन परीक्षा' ग्रंथने पधराववा पूर्वक वरघोडो कढावेल हतो। आ वातने सजीवन बनावतुं चित्र, आ ग्रंथनी पाछळना कवरपेज उपर आपवामां आवेल छे। त्यारबाद सं. १६७२नी सालमा प्रतिस्पर्धीजूथना आक्रमक बळने दूर करवा माटे गीतार्थोनुं संमेलन भरीने पण 'सर्वज्ञशतक, प्रवचनपरीक्षा, इर्यापथिकीट्विशिंका, धर्मतत्वविचार, आदि ग्रंथोने सर्वसंमततया गच्छनायके 'प्रमाणिकग्रंथो' तरीके जाहेर करावेल ! एटलुं ज नहि परंतु पू. महो० श्रीना ते ते टंकशाळी ग्रंथोनी हस्तलिखित प्रतो कराववा पूर्वक अमदावाद-पाटण-खंभात-गंधार आदि शहरोना ज्ञानभंडारोमां पण मूकावी !! आथी तो वधु उश्केरायेला ते उपाध्यायपक्षमांना ज एक साध्वाभास मुनिए विषप्रयोग द्वारा पू. गच्छनायक श्री विजयसेनसूरिजी म. ने मोतना घाटे उतारेल !!! त्यारबाद पू. विजयसेनसूरिजी म.नी पाटे आवेला अने वर्तमान 'देवसूरतपगच्छ'ना अधिपति एवा पू.आ.श्री विजयदेवसूरिजी महाराज, ते उपाध्यायपक्षथी वधु सावध अने सजाग रहेवा पूर्वक स्वसमुदायनुं सफल संचालन करवा लाग्या. एटलं ज नहि परंतु प्रतिस्पर्धी जूथना मोवडी एवा पू. महो० श्री सोमविजयजी म. आदिनां प्रलोभक वाक्योथी लोभाया नहि होवा- तेमज पू. सागरगीतार्थोनो साथ नहि ज छोड्यो होवानुं पण इतिहासप्रसिद्ध छे। सागरनो साथ नहि ज छोडवाथी तो खूब ज उश्केरायेला प्रतिस्पर्धीवर्गे


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