Book Title: Kumbhojgiri Jain Shwetambar Tirth Shatabdi Mahotsava Granth
Author(s): Kubhojgiri Tirth Committee Kolhapur
Publisher: Kumbhojgiri Tirth Committee Kolhapur

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Page 36
________________ मूरतसे बड़ी कीरत ! आज मी मूर्ति वनी देखिली । देखुनी कीर्ति मनी रेखिली ॥ध्रु.॥ शान्त वनाचा सुरम्य परिसर शान्त वनाचा शान्तीसागर पार्श्वनाथ हे स्थान विराजे कोल्हापुर-मडळी ॥१॥ फत्तेचद शिरढोण-निवासी शताब्दिपूर्वी पापविनाशी मूर्ति स्थापिलो, जैनाची जणु भाग्यदेवी हासली ॥२॥ अन्तरिक्ष, भटेवा, अवन्ती सूरजमण्डण, शखेश्वर, ती पार्श्वनाथ-नामावलि जपुनी पुनीत हो जिभली ॥३॥ सत्य, अहिंसा, अस्ते यांची अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य साची जैनतत्त्वमालाच मानवा मातेची साऊली ।। ४ ।। अशुभ वासना, विकार, आशा जीवा जखडुनी नेती नाशा मानव बनला सैतानाच्या हातातिल बाहुली ॥५॥ धकाधकी ही संसाराची उसत नाही निमिषभराची ध्यान-धारणा निवान्त करण्या तीर्थे ही चागली ॥ ६ ॥ हे मनि आणुनी, धना वेचुनी सुवर्णात बसविली हिरकणी फत्ते दात्याची ही भासे । शाति जिवा लाभली ॥ ८॥ कृतार्थ झाला कुभोजगिरी श्वेताबर-मन्दिरा धरि शिरी आत्मज्ञाना ललाम शाला, धर्मध्वजा शोभली ॥८॥ भा. ल. रानडे BA (Hons ) सागली - - - - [श्री कुंभोजगिरी शताब्दि महोत्सव

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