Book Title: Kailas Shrutasagar Granthsuchi Vol 24
Author(s): Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba
Publisher: Mahavir Jain Aradhana Kendra Koba

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Page 465
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra ४५० www.kobatirth.org कैलास श्रुतसागर ग्रंथ सूची १०६१०७. भक्तामर स्तोत्र - रागमाला, संपूर्ण वि. १९३० आषाढ़ अधिकमास कृष्ण, ६, सोमवार, मध्यम, पू. ७, ले. स्थल. मंमोईनगर, प्रले. पं. हमीरविजय, प्र.ले.पु. सामान्य, प्र. वि. श्रीगोडीपार्श्वनाथ प्रशादात्., दे., ( २६१३, १२X३५). भक्तामर स्तोत्र-पद्यानुवाद, मु. देवविजय, पुहिं., पद्य, वि. १७३०, आदि: भगत अमरगण प्रणत मुगटमणि; अंति: ते नर लछि के भरतार, गाथा-४४. Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir " १०६१०८. नमस्कार महामंत्र सह बालावबोध व नवकार रास, संपूर्ण वि. १९वी श्रेष्ठ, पू. ६, कुल पे २ प्रले. पं. मेघविजय गणि पठ. मु. वीरभाण; अन्य. पं. नानवर्द्धन (गुरु पं. हेतवर्द्धन); गुपि. पं. हेतवर्द्धन, प्र.ले.पु. मध्यम, जैवे. (२६४१२.५, ११४३४)१. पे. नाम. नमस्कार महामंत्र सह बालावबोध, पृ. १अ-६अ, संपूर्ण. " नमस्कार महामंत्र, शाश्वत, प्रा., पद्य, आदि: नमो अरिहंताणं; अंति: पढमं हवई मंगलम्, पद-९. नमस्कार महामंत्र-बालावबोध*, मा.गु., गद्य, आदि: अरिहंत प्रति माहरो; अंति: उत्कृष्टं मंगलीक होइ. २. पे. नाम. नवकार रास, पृ. ६अ -६आ, संपूर्ण. नमस्कार महामंत्र छंद, मु. जिनप्रभसूरि- शिष्य, मा.गु., पद्य, आदि सुखकारण भवियण समरो अंति: प्रभु सुंदर सीस रसाल, गाथा - १४ (वि. प्रतिलेखक ने एक गाथा को दो गिना है.) " १०६१०९ मेरुत्रयोदशीपर्व व्याख्यान का बालावबोध, संपूर्ण वि. १९४३ आश्विन शुक्ल, १ श्रेष्ठ, पृ. ६, ले. स्थल, लक्ष्मणपुर, प्रले. मु. तिलोकचंद, प्र.ले.पु. सामान्य, प्र. वि. हुंडी: मेरुत्र. द.व्या. दे., (२५.५४१३.५, १३३६). मेरुत्रयोदशीपर्व व्याख्यान- बालावबोध, मा.गु., गद्य, आदि: (१)मारुदेवं जिनं नत्वा, (२) श्रीऋषभदेवस्वामीनै; अंतिः सुख संपत्ति प्रगट हुवौ. १०६११० (+) जीवविचार प्रकरण सह टवार्थ, संपूर्ण, वि. २०बी, मध्यम, पृ. ६, ले. स्थल. अलायनगर, प्रले. मु. पुण्यविजय (गुरु मु. उत्तमविजय); गुपि. मु. उत्तमविजय (गुरु मु. नेमिविजय), प्र.ले.पु. सामान्य, प्र. वि. हुंडी : जिवचार., टिप्पण युक्त विशेष पाठ., दे., (२६.५X१३, ६x२९-३२). " जीवविचार प्रकरण, आ. शांतिसूरि, प्रा., पद्य, वि. ११वी, आदि: भुवणपईवं वीरं नमिऊण भणामि; अंति: उद्धओ रुदाउ सुअ समुद्धाओ, गाथा ५१ (वि. १९०६, आषाढ़ कृष्ण, १, बुधवार) जीवविचार प्रकरण-वार्थ* मा.गु., गद्य, आदि: भु० क० त्रिभुवन मांहे अतिः समुद्र ते मांहिथी कर्यो, (वि. १९०६, आषाढ़ कृष्ण, २. शुक्रवार) १०६१११ (+४) सुभाषित संग्रह, अपूर्ण, वि. १९वी मध्यम, पू. २९-१०(१ से ६, ८, १४ से १५, १९) = १९, पू.वि. बीच-बीच के पत्र हैं.. प्र. वि. संशोधित मूल पाठ का अंश खंडित है, जैवे. (२७.५x१३, १०x२२-२८) " सुभाषित संग्रह, सं., पद्य, आदि: (-); अंति: (-), (पू.वि. श्लोक ५० अपूर्ण से २८४ अपूर्ण तक है व बीच-बीच के पाठांश नहीं हैं.) १०६११२. बृहत्शांति स्तोत्र, संपूर्ण, वि. १९वी, मध्यम, पृ. ७, प्र. वि. हुंडी : बृद्धिशां., जैदे., (२५.५X१२, ८x२१-२४). बृहत्शांति स्तोत्र-खरतरगच्छीय, सं., प+ग., आदि: भो भो भव्याः शृणुत वचनं; अंति: सर्वत्र सुखी भवतु लोकः, (वि. कृति के अंत में मूल पाठ के अलावा मांगलिक गाथाएँ भी मिलती हैं.) १०६११३. दंडक प्रकरण सह टीका, अपूर्ण, वि. १९वी श्रेष्ठ, पृ. ५-१ (३) + १ (२) = ५, पू.वि. अंत के पत्र नहीं हैं., प्र.वि. हुंडी: दंडकवृत्ति मूल०., त्रिपाठ., जैदे., (२५X१३.५, १४-१८X४४-४९). दंडक प्रकरण, मु. गजसार, प्रा., पद्य, वि. १५७९, आदि नमिठं चौवीस जिणे, अंति (-), (पू. वि. गाथा १७ तक है.) दंडक प्रकरण- टीका, ग. समयसुंदर, सं., गद्य, वि. १६१६, आदि: शांतिं शांतिकरं नत्व; अंति: (-). १०६११४ (+) नवतत्त्व प्रकरण सह टवार्थ, अपूर्ण, वि. २०वी मध्यम, पृ. ९, पू.वि. अंत के पत्र नहीं हैं. प्र. वि. टिप्पण युक्त विशेष पाठ-पदच्छेद सूचक लकीरें. दे., (२६X१३, ५x२७-३०). नवतत्त्व प्रकरण १०७ गाथा, प्रा., पद्य, आदि जीवाजीवापुन्नं पावा अंति (-) (पू.वि. गाथा ६९ अपूर्ण तक है.) नवतत्त्व प्रकरण १०७ गाथा-टबार्थ, मा.गु., गद्य, आदि प्रथम जीवतत्त्व द्वितीय, अंति: (-). १०६११५. (+) कल्पसूत्र की कल्पद्रुमकलिका टीका-व्याख्यान ३ से ६, अपूर्ण, वि. २०वी, श्रेष्ठ, पृ. ८७, पू.वि. अंत के पत्र नहीं हैं. प्रले. मु. जसविजय, प्र.ले.पु. सामान्य, प्र. वि. संशोधित. दे. (२५.५४१२.५, १२-१५४४६-५०). For Private and Personal Use Only

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