Book Title: Jinabhashita 2009 02
Author(s): Ratanchand Jain
Publisher: Sarvoday Jain Vidyapith Agra

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Page 26
________________ आखिर हो ही गया स्थापित अमेरिका में पहला जैनमंदिर कैलाश मड़वैया २००० ईसा पूर्व आचार्य क्वाजल कोटल के नेतृत्व में पणि- जैन- श्रमण संघ पहुँचे और वे वहीं बस गये थे। मध्य अमेरिका में इन दिनों भी क्वाजल कोटल के स्मारक और जैननुमा चैत्य प्राप्त होते हैं । ( प्रमाणस्वरूप देखें चमनलाल की कृति 'हिन्दू अमेरिका' पृष्ठ १०२, संदर्भ'ज्ञानप्रकाश' पृष्ठ ३१-३२ लेखक वैद्य प्रकाश पाण्ड्या) 1 फिनिक्स और उसकी पृष्ठभूमि- ग्रेट ब्रिटेन की राजधानी लंदन में दो वर्ष पहले जब जैनमंदिर की स्थापना हुई थी, तभी वहाँ विद्यमान अमेरिकन जैनियों से यह भनक लगने लगी थी कि निकट भविष्य में जैनधर्म अमेरिका में भी अपनी पूरी भव्यता से पहुँचने के लिये आधारभूमि तलाश रहा है। यह आवश्यक तो था, पर कठिन भी था, क्योंकि जैनधर्मावलम्बियों की संख्या जितनी भी है वह यत्र-तत्र विखरी हुई है। न्यूयार्क में जैन अपेक्षात्मक कम नहीं हैं, पर सुदूर रेगिस्तानी प्रान्त ऐरीजोना में श्वेताम्बर और स्थानकवासी जैन ज्यादा हैं, दिगम्बर तो केवल ढाई घर ही हैं ढाई में इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि एक परिवार में पति दिगम्बर और पत्नी श्वेताम्बर है। पर सच यह है कि दिगम्बर, श्वेताम्बर और स्थानकवासियों में वहाँ 'वाद' की ज्यादा दूरियाँ नहीं हैं। कभी कभी तो वे भारतीयों पर बिगड़ते भी देखे गये कि हमें तो कम से कम मत बाँटों । सत्य भी यही है कि इनमें काल भी यही है कि इनमें काल के अनुसार मान्यतायें बनती बिगड़तीं रहीं हैं, पर मूल लक्ष्य तो एक ही है-मोक्ष की कामना । इस जैनमंदिर बनने के पूर्व तो फिनिक्स में समस्त भारतीयों की उपासना के लिये केवल एक ही मंदिर था - एकता मंदिर जिसमें हिन्दू, सिक्ख, जैन सभी के आराध्य देवों की मूर्तियाँ विराजमान हैं और अपनी-अपनी वेदी पर आकर वे पूजा-अर्चना किया करते हैं। ऐसा समन्वय भला और कहाँ देखा जा सकता है? अब नवनिर्मित जैनमंदिर में भी भारत से हटकर, विशषेता यह है कि बड़ी जिनप्रतिमाओं में एक श्वेताम्बरमूर्ति प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ की और दूसरी दिगम्बरों की - चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी की बिल्कुल आसपास बिराजीं हैं, बीच में केवल णमोकारमंत्र की स्थापना भर की गई अनुमानतः । है । शेष एक ओर १२ छोटी प्रतिमायें दिगम्बरों की और जैनधर्म सर्वथा वैज्ञानिक और आदिधर्म की मान्यताप्राप्ति के बावजूद अपने कठिन आचरण के कारण देश के बाहर यथेष्ठ स्थान नहीं पा सका। दूसरी ओर बौद्धधर्म, जैनधर्म के अंतिम चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी के समकालीन गौतम बुद्ध के द्वारा प्रवर्तित हुआ, पर भारत की सीमाओं के बाहर फैलता ही गया। आज अनेक देशों में बौद्धधर्म राज्यधर्म है । इस्लाम और ईसाई धर्म तो विश्व के अनेक देशों में बिखरे हुये हैं । हिन्दूधर्म भारत के बाहर मुख्यरूप से नेपाल और मारीशस जैसे कतिपय छोटे देशों में ही जा सका। अब अवश्य कुछ देशों में हिन्दूमंदिर बन रहे हैं। क्योंकि पहले तो समुद्रपार जाना ही इन धर्मों में पाप माना जाता था, फिर इन सब का कारण मूलरूप से यही रहा है कि अँग्रेजों और मुस्लिमों ने अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के कारण अनेक देशों में राज्यविस्तार किया और स्वभावत: शासित राज्यों में उनका धर्म भी स्थापित होता गया। दूसरी तरफ जैनधर्म जैसे स्वधर्म निजात्मा के विकास तक केन्द्रित होने के कारण अपने ही देश में सिमट कर रह गये। आधुनिक युग में व्यवसाय के प्रयोजन से कतिपय जैन भारत से बाहर गये और उन्हें अपने धर्म की संस्कृति की खबर बनी रही, फलतः पहले लंदन आदि में और आज सुदूर विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक एवं शक्तिशाली देश अमेरिका में अहिंसा और शांति के प्रवर्तक महावीर स्वामी का संदेश सात समुन्दर पार पहुँच गया । २० से २६ दिसम्बर २००८ की अवधि में अमेरिका के ऐरीजोना प्रान्त की राजधानी फिनिक्स में पंचकल्याण महोत्सव सम्पन्न हुआ और जैनधर्म के चौबीसों तीर्थंकरों की मूर्तियों से युक्त, भव्य जिनालय जैनसेंटर ऑफ ग्रेटर फिनिक्स में प्रतिष्ठित हो गया । मुझे गर्व है कि मैं उन क्षणों का न केवल भागीदार व साक्षी रहा, वरन् हिन्दुतान की संस्कृति और जिनत्व के काव्य का पाठ भी उक्त अवसर पर करने का सौभाग्य मिला । " Jain Education International अतीत के आइने में - यह तथ्य कदाचित् अप्रत्याशित लगे कि अमेरिका में सदियों पहले जैनधर्म था मेक्सिको, पेरू के आसपास के लोग आज भी भारत जैनों जैसा आचरण करते मिल जाते हैं। अमेरिका में 24 फरवरी 2009 जिनभाषित For Private & Personal Use Only - www.jainelibrary.org

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