Book Title: Gyansarashtakam
Author(s): Yashovijay
Publisher: Vadilal Mohakambhai Vakil

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Page 11
________________ axeUDENaClaicaachaielaicaCSIC जाता मिश्रिमलास्तदा विसपुरेऽभ्यासेन विद्यायुताः / प्रायः साधयितुमलं न विनये-नाद्यापि कि सेवया // 6 // तस्माद्याताः सुमान्या हि पुनरहमदाबादपुर्या स्वमत्या / दीक्षा तैस्तु ग्रहीता (1969) ग्रहरसनवभू-वैक्रमाब्दे च मागें / / मासे कृष्णे चतुर्थेऽह्नि शुभसमयके हर्षसाधोः सकाशाद / साधूनां सङ्गतिर्या नहि मवति मुधा वस्तुतः स्वीकृता सा // 7 // पञ्चमीदिवसे मार्गे मासे पक्षे सिते शुभे / वत्सरे वैक्रमीये तु, ( 1986 ) रसाष्टनवभूमिते // 8 // शास्त्राणां ज्ञानसत्वाच, क्रियाकौशल्यदर्शनात् / आचार्या नीतिसूरीशा-स्तेभ्यो गणिपदं ददुः // 9 // पन्यासास्पदभूषितेन गुरुणा पात्रं समालोक्य सत् / (1987 ) सप्ताष्टग्रहभूमिते शुभकरे हर्षेण संवत्सरे // मार्गे चासितपक्षके वसुतिथौ, वारे सिपोरे गुरौ / श्रीपन्यासपदं समर्पितमहो / अस्मै तु शास्त्राध्वना // 10 // सम्प्राप्य पदवी समुन्नतयशा, भव्याञ्जनान् बोधयन् / नानादेशविहारकर्मनिपुण-स्तन्वन् प्रतिष्ठां गुरोः // सिञ्चन् धर्मतरुं विवेकसहितः पीयूषगिर्वारिणा / ह्येवं श्रीगुरुदेवहर्षविदुषः शिष्याग्रणीरप्यभूत् // 11 // इत्थं काले व्यतीते (1999) नवनिधिनिधिभू-वत्सरे वैक्रमोये / षष्ठयां मासे च चैत्रेऽप्यधवलसहितेऽहम्मदावादग्रामे / / शान्तं धीरं महान्तं सरसगुणयुतं सुरिवर्यः प्रहर्षः / पट्टालङ्कारयोग्यं मुनिगणवरमा-चार्यवयं चकार // 12 // श्रीमतां हर्षसूरीणां पादपङ्कजसेवकाः। अभवन्नत्र विख्याताः श्रीमन्महेन्द्रसूरयः // 13 // आधः श्रीराजहंसाख्यो द्वितीयस्तु सुदर्शनः / सशीलस्तृतीयः प्रोक्तः, तेजप्रभतुरीयकः // 4 // रत्नाकरः पश्चमकः षष्ठो हेमप्रभः सुधीः / शिष्या आचार्यवर्यस्य महेन्द्रस्य मतस्य च // 15 // GilasacaICAacarbordevac // 11 //

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