Book Title: Gandharwad
Author(s): Jinbhadragani Kshamashraman, Vinaysagar
Publisher: Rajasthan Prakrit Bharti Sansthan Jaipur

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Page 157
________________ 134 परिणत होता है तब चेतन के सदृश ही व्यवहार करता है । जैनों ने संसारी आत्मा और शरीर आदि जड़ पदार्थों का ऐक्य क्षीर-नीर-तुल्य स्वीकार किया है । इसी प्रकार सांख्यों ने पुरुष एवं शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि आदि जड़ पदार्थों का ऐक्य क्षीर-नीर के समान ही माना है 1 । जैन सम्मत भाव-कर्म की तुलना सांख्य-सम्मत भावों से, योग की तुलना वृत्ति से और द्रव्य-कर्म अथवा कार्मण शरीर की तुलना लिंग शरीर से की जा सकती है। जैन तथा सांख्य दोनों ही कर्म फल अथवा कर्म - निष्पत्ति में ईश्वर जैसे किसी कारण को स्वीकार नहीं करते । जैन मतानुसार प्रात्मा वस्तुतः मनुष्य, पशु, देव, नारक इत्यादि रूप नहीं है, प्रत्युत श्रात्माधिष्ठित कार्मण शरीर भिन्न-भिन्न स्थानों में जाकर मनुष्य, देव, नारक इत्यादि रूपों का निर्माण करता है । सांख्य-मत में भी लिंग शरीर पुरुषाधिष्ठित होकर मनुष्य, देव, तिर्यञ्च रूप भूतसर्ग का निर्माण करता है । जैन दर्शन के समान बौद्ध दर्शन में भी यह बात मानी गई है कि जीवों की विचित्रता कर्म-कृत है । जैनों के सदृश ही बौद्धों ने भी लोभ (राग), द्वेष और मोह को कर्म की उत्पत्ति का कारण स्वीकार किया है । राग, द्वेष और मोह युक्त होकर प्राणी (सत्त्व) मन, वचन, काय की प्रवृत्तियाँ करता है और राग, द्वेष, मोह को उत्पन्न करता है । इस प्रकार संसार-चक्र चलता रहता है । इस चक्र का कोई श्रादि काल नहीं है, यह अनादि है । राजा मिलिन्द ने प्राचार्य नागसेन से पूछा कि, जीव द्वारा किये गये कर्मों की स्थिति कहाँ है ? प्राचार्य ने उत्तर दिया कि, यह दिखलाया नहीं जा सकता कि कर्म कहाँ रहते हैं । विसुद्धिमग्ग में कर्म को अरूपी कहा गया है (17.110), किन्तु अभिधर्म- कोष में वह अविज्ञप्ति रूप है ( 19 ) और यह रूप प्रतिघन होकर प्रतिघ है । सौत्रान्तिक-मत में कर्म का समावेश प्ररूप में है । वे प्रविज्ञप्ति ' नहीं मानते। इससे ज्ञात होता है कि, जैनों के समान बौद्धों ने भी कर्म को सूक्ष्म माना है । मन, वचन, काय की प्रवृत्ति भी कर्म कहलाती है किन्तु वह विज्ञप्ति रूप ग्रथवा प्रत्यक्ष है । 1. 2. 3. 4. 5. 6. 7. 8. गणधरवाद 9. माठर वृत्ति पृ० 29, का० 17 सांख्यका० 40 सांख्यका० 28,29,30 माठरका ० 40, 44.53 भासितं पेतं महाराज भगवता - कम्मस्सका माणव, सत्ता, कम्मदायादा, कम्मयोनी, कम्मबन्धु, कम्मपटिसरणा, कम्मं सत्ते विभजति, यदिदं हीनपणीततायाति ।" मिलिन्द० 3, 2; कर्मजं लोकवैचित्यं - अभिधर्म कोष 4. 1 अंगुत्तरनिकाय तिकनिपात सूत्र 33.1, भाग 1 पृ० 134 संयुत्तनिकाय 15.5.6 (भाग 2) पृ० 181-82 नसक्का महाराज तानि कम्मानि दस्सेतुं इध वा दूध वा तानि कम्मानि तिट्टन्तीति । मिलिन्दप्रश्न 3 - 15 पृ० 75 नवमी श्रोरियंटल कॉंफ्रेंस पृ० 620 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.


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