Book Title: Dwatrinshad Dwatrinshika
Author(s): Vijaysushilsuri
Publisher: Vijaylavanyasuri Granthmala

View full book text
Previous | Next

Page 662
________________ द्वादशी न्यायद्वात्रिंशिका गुणो नाम द्रव्यं भवति गुणतश्च प्रभवति गुणापेक्षं कर्माऽप्यनुशयमारम्भविषयम् / विभु स्यात् किं द्रव्यं गुणजमुत वान्यः पदविधि र्दिशो दिक्पर्यन्तं तव किमिति शक्यं गमयितुम् // 28 // 12. द्वादशी न्यायद्वात्रिंशिका / दैवखातं च वदनमात्मायत्तं च वाङ्मयम् / श्रोतारः सन्ति चोक्तस्य निर्लज्जः को न पण्डितः ? // 1 // अभिष्टुवन्ति यत् स्वैरं नृपगोष्ठयां नृपुङ्गवाः / असत्संदिग्धमुक्तानि कृषास्तेन कृपात्मकाः // 2 // प्रगवृत्तान्तगहनाद् विश्लिष्य प्रहता गिरः / योजयत्यर्थगम्या यः शब्दब्रह्म भुनक्ति सः // 3 / / प्रसिद्धशब्दार्थगतिर्ज्ञानं जात्यन्धपश्च यः / : न स स्वयं प्रवक्तारमुपास्ते तन्त्रयुक्तिषु // 4 // दुरुक्तानि निवर्तन्ते सूक्ते नास्ति विचारणा / पुरुषो ब्राह्मणः विप्रः पुरुषो वेति वा यथा // 5 // न सामान्य-विशेषाभ्यामृतेऽन्याहेतु जायते / तद् विशेष-विधाताभ्यां हेत्वाभासोपजातयः // 6 // द्वितीयपक्षप्रतिघाः सर्व एव कथापथाः / अभिधानार्थविभ्रान्तैरन्योऽन्यं तद् विप्रलप्यते // 7 //

Loading...

Page Navigation
1 ... 660 661 662 663 664 665 666 667 668 669 670 671 672 673 674 675 676 677 678 679 680 681 682 683 684 685 686 687 688 689 690 691 692 693 694