Book Title: Dwatrinshad Dwatrinshika
Author(s): Vijaysushilsuri
Publisher: Vijaylavanyasuri Granthmala
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________________ द्वादशी न्यायद्वात्रिंशिका ......611 विनिर्णयान्न संदेहः सर्वथोत्तरसंभवात् / स एव हेतुश्चक्षुर्वन्नानिष्टप्रतिपत्तितः // 19 // दृष्टान्तदूषणामोहो हानिपक्षाप्रसिद्धयः / वाचोयुक्त्युपपत्तिभ्यामत एव विपर्ययः // 20 // अनभ्युपगमो लोक-शास्त्र-धर्मविकल्पितः / सामान्याभ्युपपत्तिभ्यां न समोऽनिष्टकल्पनात् // 21 // अन्योऽन्योभयसामान्यसर्वसंगविशेषतः / . सामान्यघाततसिद्धशास्त्रलोकोपपत्तितः // 22 // . अन्यथेति च वैधर्म्यमापत्तिव्यभिचारतः / प्रतिपत्तिविकल्पाच्च तत्सिद्धिः कृतसंभवात् // 23 // पुनरुक्तमसंबद्धात् साम्यः सामर्थ्य दर्शनात् / मन्त्रवच्चेति नापार्थ्यप्रसङ्गानिष्टसिद्धयः // 24 // पुनरुक्तवदायोज्यं हेतुवादान्तरोक्तये / समानोताङ्गसङ्कल्पं प्रश्नाकारणसिद्धयः // 25 // भावाच्चेत् प्रतिज्ञादि प्रत्येकं चानुपक्रमात् / कालप्राप्तिविकल्पाभ्यां सर्वसिद्धेश्च नार्थवत् // 26 // क्वचित् कि िवत् कथविच्चेत्यनुषङ्गात् स लोपर्गः / कृताकृतविकल्पाभ्यां संशयप्रतिरूपतः // 27 / / न नाम दृढमेवेति दुर्बलश्चोपपत्तितः / वक्तृशक्तिविशेषात् तु तत् तद् भवति वा नवा // 28 // तुल्यसामाद्युपायेषु शक्या युक्तो विशेष्यते / विजिगीषुर्यथा वाग्मी तथा भूयः श्रुतादपि // 29 //

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