Book Title: Dwatrinshad Dwatrinshika
Author(s): Vijaysushilsuri
Publisher: Vijaylavanyasuri Granthmala
View full book text
________________ 6.10 श्रीसिद्धसेनदिवाकरप्रणीता समं संशय्यते यत्र सामान्यमलिनं धिया / विचारं पुनरुक्तार्थ विशेषाय स संशयः // 8 // प्रतिज्ञानिर्णयो हेतुर्दृष्टान्तं बुद्धिकारणम् / प्रमाणहेसुदृष्टान्तजातितस्तिदुक्तयः // 9 // लोकधर्मोऽभ्यनुज्ञातः सिद्धान्तो वाग्नियामकः / अङ्गधर्मविकल्पाभ्यां प्रमेयोपचयाचयौ // 10 // . अविद्यार्थानवगमो विरूपाप्रतिपत्तितः / . . हेत्वाभासश्च निर्वादेष्वियमेव तु भूयसी // 11 // .. किञ्चित् सामान्य-वैशेष्यादयुक्तार्थोमपादनम् / छलं तदिति वैस्पष्टयाद् वाच्याभिप्रायभेदतः // 12 // व्यभिचारात् परं नास्ति परपक्षप्रदूषणम् / हेतुपर्यन्तयोगाच्च तस्मात् पक्षोत्तरो भवेत् // 13 // संशयः प्रतिदृष्टान्तविरोधापत्तिहानयः / / प्रतिपक्षविकल्पौ च व्यभिचारार्थपर्ययाः // 14 // अकारणत्वान्निर्देशा साध्यत्वाद्यनुयोगजः / हेत्वन्तराभ्युपगमः पुनरुक्कादतः परम् // 15 // एकपक्षहता बुद्धिर्जल्पवाग्यन्त्रपीडिताः / श्रुतसंभावनावैरि वैरस्यं प्रतिपद्यते // 16 // तानुपेत्य वितण्डाऽस्ति नयस्येति विचारणा / सैव जल्पे विपर्यासो वितण्डैवेति लक्ष्यते // 17 // न सिद्धान्ताभ्युपगमादितरः सार्वतन्त्रिकः / यस्येत्युक्तमनेकान्तादितरं नानुषज्यते // 18 //

Page Navigation
1 ... 661 662 663 664 665 666 667 668 669 670 671 672 673 674 675 676 677 678 679 680 681 682 683 684 685 686 687 688 689 690 691 692 693 694