Book Title: Bharateshwar Bahubali Vrutti Part_1
Author(s): Shubhshil Gani
Publisher: Devchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
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॥ श्रीभरते. श्वर वृत्तिः॥
॥४॥
दीहकालट्ठिआओ रहस्सैकालट्ठिआओ पगरइ, इमं च णं दीहमदं चाउरंतं संसारकंतारं थेवेणवि कालेण परियट्टइ । श्रीआदीश्वर
चरित्रम् । तथा चोक्तं-"अन्नंपानं तथा वस्त्रं, आलयः शयनाऽसने । शुश्रषा वंदनं तुष्टिः, पुण्यं नवविधं स्मृतम् ॥१॥ साहूण कप्पणिज्जं जं नवि दिन्नं कहिंवि किंपि तहिं । धीरा जहुत्तकारिणो, सुसावगा तं न भुजंति ॥ २ ॥ तथा च-ददस्वान्नं ददस्वान्नं, ददस्वान्नं युधिष्ठिर !। सद्यः प्रीतिकरं लोके, किं दत्तेनापरेण हि ॥ ३ ॥ इत्यादि पात्रदानफलं धनो मत्वा घृतदान वंदितुं सदा याति, गुरूक्तं धर्ममशृणोदिति-संसारसागरोत्तारतरीतुल्यस्य श्राद्धधर्मस्य प्रतिष्ठानप्रतिष्ठमादौ सम्यक्त्वं वीतरागेणोक्तम्-"वीतरागप्रभुदेवः सुसाधुश्च परो गुरुः। कृपामूलस्त सद्धर्मः, सम्यक्त्वमभिधीयते ॥१॥ जिणवयणमेव तत्तं तत्थ रुई होइ दवसम्मत् । जहभावणाण सद्धा, परिसुद्धं भावसम्मत्तं ॥२॥सम्मत्तमि यलद्धे, पलियपुहुत्तेणसावओ हुज्जा। चरणोवसमखयाणं, सायरसंखंतरा हुंति ॥३॥ अंतमुहत्तं पालिय, सम्मत् जो वमेइ पजते । तस्स य ।। अवडपुग्गल, परियट्टो चेव संसारो॥४॥ भद्रेण चरित्ताओ, सुट्ठयरं च दंसणं गहेयव्वं । सिझंति चरणरहिया, दसणरहिया न सिझंति ॥५॥ सव्वत्थ उचियकरणं गुणाणुराओ रई अ जिणवयणे । अगणेसु अ मज्झत्थो, सम्म
॥
४
॥
in Educatan
rasa
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