Book Title: Bhagwati Sutram
Author(s): Rushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha
Publisher: Rushabhdev Kesarimal Jain Shwetambar Sanstha

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Page 12
________________ श्रीभग १ शतके वती १ उद्देश: सूत्रम् । | पुट्ठाई आहारेंति, नो अपुढाई आहारेंति २८, पुट्ठाइंति-आत्मप्रदेशस्पर्शवन्ति, तत् पुनरात्मप्रदेशस्पर्शनमवगाहक्षेत्रा बहिरपि भवति अत | | उच्यते-जाई भंते ! पुट्ठाई आहारेति ताई किं ओगाढाई आहारेंति अणोगाढाई आहारेंति ?, गोयमा! ओंगाढाई, नो अणोगाढाई अव| गाढानीति-आत्मप्रदेशैः सह एकक्षेत्रावगाढानीत्यर्थः २९, जाई भंते ! ओगाढाई आहारेंति ताई कि अणंतरोगाढाई आहारेंति परंपरो गाढाई आहारेंति ?, गोयमा! अणंतरोगाढाई आहारेंति, नो परंपरोगाढाई आहारेंति, अनन्तरावगाढानीति-येषु प्रदेशेषु आत्मा अवगा| ढस्तेष्वेव यानि अवगाढानि तानि अनन्तरावगाढानि, अन्तराभावेनावगाढत्वात् , यानि च तदनन्तरवर्तीनि तानि अवगाढसंबंधात् परंपरावगाढानीति ३०, जाई भंते ! अणंतरोगाढाई ताई कि अणूइं आहारेंति ? बायराइं आहारेंति ?, गोयमा ! अणूइंपि आहारेंति बायराइंपि आहारेंति, तत्राणुत्वं बादरत्वं चापेक्षिक तेषामेव आहारयोग्यानां स्कंधानां प्रदेशवृद्ध्या वृद्धानामवसेयम् ३१, जाई भंते ! | अणूइंपि आहारेति बादराइंपि आहारेंति ताई किं उडं आहारेंति ? एवं अहोऽवि तिरियपि ?, गोयमा ! उडुपि आहारति एवं अहो|वि० तिरियंपि० ३२, जाई भंते ! उडुपि आहारेंति अहेवि० तिरियपि आहारेंति ताई किं आदि आहारेंति मज्झे आहारेंति पञ्जबसाणे आहारेंति ?, गोयमा ! तिहावि, अयमर्थः-आभोगनिर्वर्तितस्याहारस्यांतमौहर्तिकस्यादिमध्यावसानेषु सर्वत्राहारयन्तीति ३३, | जाई भंते ! आई मज्झे अवसाणेवि आहारेंति ताई किं सविसए आहारेंति ? अविसए आहारेंति ?, गोयमा! सविसए, नो अविसए आहारेंति, तत्र वः-खकीयो विषयः स्पृष्टावगाढानंतरावगाढाख्यः स्वविषयः तस्मिन् आहारयन्ति ३४, जाइं भंते ! सविसए आहारेति ताई किं आणुपुब्धि आहारेंति ? अणाणुपुब्बि आहारेंति ?, गोयमा ! आणुपुब्बि आहारेंति, तत्रानुपूर्व्या यथाऽऽसन्नं, नातिक्रम्य ३५, जाई भंते ! आणुपुब्धि आहारेंति ताई कि तिदिसिं आहारेंति ? जाब छदिसि आहारेंति ?, गोयमा! नियमा

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