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नमस्कार कर नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए कायोत्सर्ग करना
चाहिए। दिनेश – अच्छा तो शान्ति से इस प्रकार चित्त एकाग्र करके भगवान का दर्शन
करना चाहिए। और...... ? जिनेश – और क्या ? उसके बाद शान्ति से बैठकर कम से कम आधा घंटा
शास्त्र पढ़ना चाहिए। यदि मन्दिरजी में उस समय प्रवचन होता हो
तो वह सुनना चाहिए। दिनेश – बस.....। जिनेश – बस क्या ? जो शास्त्र में पढ़ा हो अथवा प्रवचन में सुना हो उसे थोड़ी
देर बैठकर मनन करना चाहिए तथा सोचना चाहिए कि मैं कौन हूँ? भगवान कौन हैं ? मैं स्वयं भगवान कैसे बन सकता हूँ ? आदि,
आदि। दिनेश - इस सबसे क्या लाभ होगा? जिनेश – इससे आत्मा में शान्ति प्राप्त होती है। परिणामों में निर्मलता प्राती
है। मंदिर में प्रात्मा की चर्चा होती है। अत: यदि हम आत्मा को
समझकर उसमें लीन हो जावें तो परमात्मा बन सकते हैं। प्रश्न -
१. देवदर्शन की विधि अपने शब्दों में बोलिए। २. मन्दिर में कैसे और क्यों जाना चाहिए ? ३. मन्दिर में कौन-कौन वस्तु नहीं ले जाना चाहिए ? ४. देवदर्शन करते समय क्या बोलना चाहिए? ५. मन्दिर में क्या क्या करना चाहिए ?
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