Book Title: Arhat Vachan 1999 04 Author(s): Anupam Jain Publisher: Kundkund Gyanpith Indore View full book textPage 9
________________ इतनी दरिद्रता अनेक प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। यह मेरा सुनिश्चित मत है कि देश का जो संगठन इस काम को जितने अधिक अंशों में पूर्ण कर लेगा वही सच्चा सामाजिक संगठन बन जायेगा। शेष सभी मात्र कागजी। देव तथा देव उपासकों के बाद आइये जरा शास्त्र की चर्चा करें। 4. जैन धर्म/दर्शन/समाज/संस्कृति से सम्बद्ध किन-किन ग्रन्थों का अबतक प्रकाशन हो चुका है एवं कौन-कौन से ग्रन्थ अब तक अप्रकाशित कहाँ-कहाँ पड़े हैं? इसकी जानकारी क्या हमारे किसी विद्वत् संगठन को है? ____ शायद नहीं। अपनी इस धरोहर को कौन सम्हालेगा। विभिन्न विद्वत् एवं सामाजिक संगठनों से जुड़ा होने के नाते अपने किसी संगठन की आलोचना का अधिकार तो मुझे नहीं है किन्तु सुझाव की दृष्टि से इसका उल्लेख किया है। कुन्दुकुन्द ज्ञानपीठ इन्दौर ने सत्श्रुत प्रभावना ट्रस्ट, भावनगर के सहयोग से प्रकाशित जैन साहित्य के सूचीकरण की परियोजना प्रारम्भ की है। योजना के अन्तर्गत प्रारम्भिक तैयारी के अन्तर्गत - (क). जैन विद्या के अध्येताओं की स्थानवार सूची। (ख). जैन पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादक एवं प्रकाशकों की विस्तृत सूची तैयार की जा चुकी है। अगले चरण में जैन प्रकाशकों, पुस्तक विक्रेताओं, ग्रन्थ भंडारों की सूचियाँ तैयार की जायेंगी। समानान्तर रूप में देश के प्रमुख जैन पुस्तकालयों की परिग्रहण पंजियों का भी कम्प्यूटरीकरण किया जा रहा है जिससे किसी भी प्रकाशित जैन धर्म सम्बन्धी पुस्तक का विवरण तथा उसकी देश के विभिन्न पुस्तकालयों में उपलब्धता के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त हो सके। हम चाहते हैं कि विद्वानों का पूर्ण सहयोग प्राप्त हो जिससे योजना सफलतापूर्वक शीघ्रातिशीघ्र पूर्ण हो। 5. क्या शिक्षा के क्षेत्र में पाठ्यपुस्तकों में जैनधर्म विषयक भ्रांतिपूर्ण जानकारी के परिष्कार की कोई योजना किसी संगठन ने बनाई है? विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होने वाली विभिन्न स्तर की पाठ्यपुस्तकों में जैन धर्म विषयक अनेक भ्रांतिपूर्ण जानकारियाँ दी जाती हैं और आश्चर्य है हमारे देश में कार्यरत जैन समाज के अनेक संगठन इस बात की चर्चा तो करते हैं कि पाठ्यपुस्तकों में भ्रांतिपूर्ण जानकारी दी गई है किन्तु उसके परिष्कार के लिये योजनाबद्ध प्रयास नहीं करते। दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, हस्तिनापुर ने कतिपय पाठ्यपुस्तकों में निहित विसंगतिपूर्ण अंशों को संकलित कर उनके परिष्कार हेतु प्रयास किये हैं। अब तक प्राप्त त्रुटिपूर्ण अंशों को एक पुस्तिका के रूप में संकलित कर प्रकाशित किया जा रहा है। किन्तु ये प्रयास अभी नाकाफी है। विभिन्न प्रान्तों से विभिन्न भाषाओं में सैकड़ों की तादाद में गलत जानकारी देने वाली पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। ऐसी सभी पुस्तकों का संकलन, त्रुटियों का रेखांकन एवं परिष्कृत सामग्री उपलब्ध कराना एक व्यापक एवं जटिल कार्य है। अखिल भारतवर्षीय दि. जैन शास्त्री परिषद, विद्वत् परिषद तथा जैन विद्या के प्रेमी सभी बन्धु जब तक इस हेतु सजग नहीं होंगे, तब तक यह काम पूर्ण नहीं हो सकता। ये तो कुछ बिन्दु हैं। ऐसे अनेक विषय हैं जिन पर हमें प्राथमिकता के आधार पर सोचना होगा। मात्र तात्कालिक लाभ, कार्य की सरलता और सहजता की दृष्टि से नहीं, अपितु अर्हत् वचन, अप्रैल 99Page Navigation
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