Book Title: Arhat Vachan 1999 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 17
________________ के महाकवि रविषेणाचार्य ने पद्म - पुराण' 14 में लिखा है - साम्राज्यादपि पद्माभ, तदेव बहु मन्यते, नश्यत्येव पुना दर्शनं स्थिर सौख्यदम् । तदभव्य - जुगुप्सातो भीतेन पुरुषोत्तम, न कथंचित त्वया त्याज्यं नितान्तं तद् - धि दुर्लभम् ॥ - पवन सुत हनुमान की माता अंजना, पति श्रीपाल को कुष्ठ से मुक्त करने वाली मैनासुन्दरी, बाइसवें तीर्थंकर नेमिनाथ की दुल्हिन राजुलमती आदि नारी के 'अबला' विशेषण को झुठला कर दिखाती हैं कि नारी 'सबला' कैसे हो सकती है। तीर्थंकर महावीर की शिष्या बनकर सती चन्दना ने सिद्ध कर दिया कि पहाड़ काटकर आगे बढ़ती गंगा की भांति नारी के सामने सांसारिक बाधाएँ बेमानी हैं । चन्दना की एक बहिन मृगावती की पारिवारिक और राजनीतिक सूझ बूझ अद्भुत थी । श्रेणिक - चेलना, चण्डप्रद्योत - शिवादेवी, उदायन प्रभावती आदि दंपतियों के चरित्रों में श्रंगार, वीर और शांत रसों के परिपक्व उदाहरण मिलते हैं। कुछ ऐतिहासिक नारियाँ जैन लेखकों ने नारी की भर्त्सना भले ही की हो, नारी का पक्ष भी खूब लिया । धार्मिक अनुष्ठानों में पत्नी का पति के साथ एक ही आसन पर आसीन होना अनिवार्य बताया गया । सामाजिक समारोहों में पति से बतरस लेती पत्नी के शब्दचित्र जैन साहित्य में भरपूर हैं। पति के साथ सांसारिक सुख के सरोवर में गोते लगाती सुकुमार सुन्दरियाँ जैन साहित्य में वर्णित हैं और कला में उत्कीर्ण हैं, राजकाज के संचालन और प्रजा के पालन में पति का हाथ बंटाती नारियों की संख्या भी बहुत है। शत्रु के समने चकनाचूर करने को पति के कठोर करों में खड्ग पकड़ाती चंडी नारियाँ जैन संस्कृति की धड़कन हैं। लक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका, पद्मावती आदि देवियों ने जैन कला और स्थापत्य और साहित्य में अपना स्वतंत्र विकास किया, जिससे उनकी मूर्तियाँ बनी और उपासना होनी शुरू हुई। देवियों के इस स्वतंत्र विकास से नारी जाति के विकास में गति आई होगी। - कुछ अद्भुत - अपूर्व नारियों के नाम इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। छठी शती ईस्वी पूर्व में मगध सम्राट बिम्बिसार श्रेणिक की शती ईस्वी पूर्व में मथुरा के राजा पूतिमुख की पत्नी उर्विला, बारहवीं विष्णुवर्धन की रानी शान्तला आदि ने अपने- अपने पतियों को जैन रखने का कष्टपूर्ण संघर्ष किया। साम्राज्ञी चेलना, दूसरी शती में होयसल - नरेश धर्म में लाने या बनाये प्रथम शती ईस्वी पूर्व में शकारि विक्रमादित्य के समकालीन कालिकाचार्य की साध्वी बहिन सरस्वती का अपने शील की रक्षा के लिये किया गया संघर्ष समाज के बाहर राजनीति में जा पहुँचा था । गुप्त सम्राट कुमारगुप्त के समय (432 ईस्वी) कोट्टिय - गण की विद्याधरी शाखा के दत्तिलाचार्य की गृहस्थ शिष्या शामाढ्या ने मथुरा में एक जिन प्रतिमा की स्थापना कराई थी। छठी शताब्दी और उसके बाद निर्मित कांस्य मूर्तियों के बड़ोदरा के निकट अकोटा से प्राप्त समूह में जो अत्यन्त प्रसिद्ध जीवंत स्वामी की मूर्ति है उसकी निर्मात्री चन्द्रकुलोत्पन्न नागेश्वरी देवी थी। दसवीं शताब्दी में कल्याणी के उत्तरकालीन चालुक्यों के महादण्डनायक नागदेव की पत्नी, अत्तिमब्बे, पतिभक्ति और वीरता के लिये विख्यात थी, 'दान चिंतामणि' अर्हत् वचन, अप्रैल 99 - 15

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