Book Title: Arhat Vachan 1999 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 19
________________ विधान किया। 4. ब्रह्मचर्य का सम्पूर्ण पालन असंभव होने की स्थिति में स्व- दार - संतोष, एक - पत्नी व्रत (स्त्री के सन्दर्भ में पातिव्रत्य) आदि की व्यवस्था की। 5. नारी से पुरुष को विरक्त रखने के लिये नारी को नाकारा, विनाशकारी, नागिन आदि __ के रूप में पुरजोर शब्दों में चित्रित किया। 6. नारी के प्रति पुरुष के सहज आकर्षण को विकर्षण में बदलने के लिये कई लोकोक्तियाँ प्रचलित की, जैसे - 'जर जोरू जमीन, झगड़े की जड़ तीन' (लोकोक्ति), "ढोल गँवार शुद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी' (गोस्वामी तुलसीदास), 'संसार में विष - बेल नारी, तजि गये जोगीसरा' (कविवर द्यानतराय) आदि। 7. शारीरिक सौन्दर्य में पुरुष या स्त्री की असीमित आसक्ति और लंपटता को नियंत्रित करने के लिये शरीर की सारहीनता, मलिनता, क्षणभंगुरता आदि के वैराग्य - वर्धक चित्र खींचे, जैसे - 'अस्थि -चर्म- मयदेह मम, तामें ऐसी प्रीति, ऐसी हो श्री राम में, होय न तो भवभीति' (रत्नावली - चरित) "दिपैचाम- चादर - मढ़ी,हाड-पींजरादेह, भीतर या सम जगत में, और नहिं घिन गेह' (कविवर भूधरदास), 'पल-रुधिर - राध- मल-थैली,कीकस- वसादितैमैली, नव द्वार बहें घिनकारी, अस देह करै किम यारी' (कविवर दौलतराम) आदि। 8. ब्रह्मचर्य पालन में पुरुष को अपनी कमजोरी और नारी को अपनी दृढ़ता का अहसास कराने के लिये ऐसा साहित्य रचा, जिसमें स्त्री को अनुचित रूप से पाने की चेष्टा में पुरुष की चौतरफा बरबादी दिखाई गई है और नारी महिमा मंडित की गई है। 9. नारी में पुरुष की काम - वासना को समाप्त करके पूज्य - भाव जगाने के लिये नारी को लक्ष्मी, सरस्वती आदि के समान घोषित किया - 'यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता:' (लोकोक्ति) 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो' (महाकवि प्रसाद) 'स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्, नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता। सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र- रश्मिं, प्राच्येव दिग् जनयति स्पुरदंशु - जालम्॥' (भक्तामर स्तोत्र) आदि। मध्यकालीन साहित्यकार नारी के नख - शिख वर्णन में मगन हुए, मगर नारी के मनोविज्ञान और चरित्र - चित्रण में भी अचूक रहे। स्त्री के सहज सौंदर्य से वे इतने सरस हुए कि उन्होंने ऐसे स्त्रीलिंग शब्दों का खूब प्रयोग किया, जिनके पुल्लिंग (या नपुंसक लिंग) शब्द अपेक्षाकृत अधिक प्रचलित हैं जैसे -'देशन' के लिये "देशना', 'मोक्ष' के लिये 'मुक्ति', 'जिन - वचन' के लिये "जिन - वाणी'। 'सल्लेखन' शब्द व्रत का विशेषण होने से इसी रूप अर्हत् वचन, अप्रैल 99 17

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