Book Title: Arhat Vachan 1999 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 57
________________ तपश्चरण एवं समवसरण का आयोजन भी बद्रीनाथ गिरि शिखर की पावनता को प्रदर्शित करता है। भगवान ऋषभदेव के निर्वाण के पश्चात उनकी स्मृति में महाराज भरत ने अष्टापद ( हिमालय के आठ गिरि शिखरों ) पर अनेक जिनालयों, जिन प्रतिमाओं एवं स्तूपों का निर्माण करवाया था। काल के प्रभाव से इनका पूर्णतया विनाश हो जाने पर भी इनके भग्नावशेष आज भी यत्र-तत्र दिख जाते हैं। बद्रीनाथ स्थित गरुड़कुंड में जैन प्रतिमाओं के अवशेष बिखरे पड़े हैं। नागनाथ पोखरी में भी जैन मंदिरों के कुछ भग्न खंड देखे जा सकते हैं। बद्रीनाथ से कुछ दूर भारत तिब्बत सीमा पर स्थित एक ग्राम माणागांव का माता मंदिर माता मरुदेवी का ही मन्दिर है जहाँ तपश्चरण करते हुए उन्होंने अपनी नश्वर देह का परित्याग किया था। ऋषिकेश - बद्रीनाथ मार्ग के मध्य श्रीनगर में तो आज भी एकशिखर संयुक्त विशाल प्राचीन जिनालय विद्यमान है। - बद्रीनाथ मंदिर की मूल प्रतिमा पद्मासन एवं ध्यानमुद्रा में निर्मित भगवान ऋषभदेव की ही प्रतिमा है। प्रातः काल अभिषेक के समय, विशेष शुल्क देकर प्रतिमा को उसके दिगम्बर स्वरूप में दर्शन किया जा सकता है। प्रतिमा के दो ही हाथ हैं। बाद में जनता के दर्शन के काल में दो अतिरिक्त हाथ लगाकर एवं श्रृंगारित कर इसे चतुर्भुज स्वरूप प्रदान कर दिया जाता है। - मूलतः यह प्रतिमा किसकी है? इस संबंध में अनेक मनीषियों ने समय-समय पर अपने विचार प्रकट किये हैं। गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित 'कल्याण' मासिक के विशेषांक 'तीर्थांक'' के सम्पादकीय के अनुसार 'बद्रीनाथ की यह प्रतिमा मूलतः यहाँ की नहीं है। इसे कैलाश (भगवान ऋषभदेव की निर्वाणस्थली ) 10 के समीपस्थ आदि बदरी के थूलिंग मठ से लाकर यहाँ स्थापित किया गया था।' पूर्व में इस क्षेत्र पर बौद्धों का अधिकार था और वे इस प्रतिमा को भगवान बुद्ध की प्रतिमा मानकर इसका पूजन अर्चनन करते थे। बाद में यह ज्ञात होने पर कि यह बुद्ध मूर्ति नहीं है, उन्होंने इसे समीप ही प्रवाहमान अलकनंदा नदी में फेंक दिया था। पश्चात् श्री शंकराचार्य ने प्रतिमा को निकलवाकर इसे यहाँ विधिवत प्रतिस्थापित किया था। 'बद्रीनाथ यात्रा' शीर्षक लेख में केदारनाथ शास्त्री स्वीकार करते हैं कि 'बद्रीनाथ की प्रतिमा स्थानीय गरुड़कुंड से ही प्राप्त हुई प्रतिमा है।' कुछ सनातन धर्मावलम्बी पंडितों ने इस प्रतिमा के मूल स्वरूप को देखकर इसे प्रणाम तक नहीं किया है। जैन समाज बद्रीनाथ की इस प्रतिमा को भगवान ऋषभदेव की तथा हिन्दू इसे विष्णु की मूर्ति मानते हैं। भव्य एवं सौम्य मुखमुद्रा वाली यह प्रतिमा जैन एवं वैष्णव सभी की आस्था एवं धार्मिक सद्भावना की प्रतीक है। सच तो यह है कि अलौकिक सौन्दर्य सम्पन्न इस देवमूर्ति में सभी धर्मावलम्बियों को अपने अपने इष्ट देवता का दर्शन होता है। बद्रीनाथ मन्दिर में भगवत आराधना के समय नित्य पढ़े जाने वाले इस श्लोक से भी यही भावना प्रस्फुटित होती है - यं शैवाः समुपासते शिव इति ब्रह्मेति वैदांतिकाः । बौद्धाः बुद्ध इति प्रमाण पटवः कर्त्रेति नैयायिकाः ॥ अर्हनित्यमसौ जिनशासन रताः कर्मेति मीमांसकाः । सोऽयं माम विदधातु वांछित फलं त्रैलोक्य नाथो प्रमुः ॥ जैनागम में भी राम कृष्ण आदि को भविष्य में मोक्षगामी स्वीकार करते हुए उन्हें अर्हत् वचन, अप्रैल 99 55

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