Book Title: Arhat Vachan 1999 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 14
________________ इस लेख के अंत में प्रस्तुत की गई है। जैन नारियों द्वारा लेखन- कार्य नारियों द्वारा रचित शास्त्रों, काव्यों आदि की संख्या नगण्य दिखती है, जिसका कारण यह है कि नारियों ने जो रचनायें कीं, वे उनके अपने नाम से नहीं, बल्कि उनके गुरुओं के नाम से प्रचारित हुईं। यह बात नारियों के ही नहीं, गृहस्थ पुरुषों के सन्दर्भ में भी कही जा सकती है। और, यह बात कहीं लिखी - कही नहीं मिले, फिर भी है ऐसी ही, वरना क्या कारण है कि लगभग तमाम प्राचीन जैन साहित्य के लेखक पुरुष साधु ही हुए, नारियाँ या गृहस्थ पुरुष नहीं के बराबर हुए। वर्तमान स्थिति को प्राचीन स्थिति का मापदंड़ मानें तो कहना पड़ेगा कि आज की तरह प्राचीन काल में भी अधिकांश लेखन नारियों और पुरुष गृहस्थों द्वारा होता था, अलबत्ता आज की तरह तब भी कुछ पुरुष साधु भी लेखक - चिंतक रहे होंगे। इसका भी कारण यह है कि प्राचीन काल में, विशेष रूप से जैन समाज में, साधुओं का प्रभाव इतना अधिक था कि गृहस्थ श्रावक अपना सब कुछ उनके नाम पर कर देने में अपने को धन्य मानता था। वह जो लिखता उसे अपने गुरु साधु को सौंप देता, जिसे उसी रूप में या संशोधित - परिवर्धित करके वे अपने नाम से प्रचारित कर - करा देते थे। यह प्रवृत्ति आठवीं शताब्दी ईस्वी के बाद, भट्टारक - प्रथा, यति - प्रथा और गुरु - प्रथा (यापनीय) के प्रभावशाली होने पर और भी पुरजोर होती गई। इसीलिये, पंडित आशाधर आदि कुछ गृहस्थों को छोड़कर किसी गृहस्थ के नाम से शास्त्र तो क्या, कोई काव्य तक लिखा हुआ नहीं मिलता। उल्लेखनीय है कि शास्त्रों की रचना और लेखन के लिये, और फिर पाण्डुलिपि के रूप में उनकी सुरक्षा के लिये, किसी पेड़ की छाया नहीं, बल्कि मजबूत छत चाहिये, जो गृहस्थ लोगों के पास ही होती थी, साधुओं के पास छत या झोपड़ी तो नहीं ही होती थी, वे उसका उपयोग भी बहुत कम करते थे। जैन नारी की वैवाहिक स्थिति जैन नारी की वैधानिक स्थिति अपने परिवेश की तुलना में अच्छी अधिक और बुरी कम रही है, यह तथ्य जैन नारी की वैवाहिक स्थिति के सन्दर्भ में और भी सटीक है। जैन संस्कृति में आठ प्रकार के विवाहों का विधान चाहे नहीं किया गया, परन्तु उनका प्रचलन रहा है। प्राचीन जैन समाज में दहेज प्रथा का यो तो चलन ही नहीं था, या साहित्य में उसके उल्लेख होने से रह गये हैं। आजकल इस प्रथा में जैन समाज अग्रणी है। बहु - पत्नी प्रथा जैन समाज में भी, अन्य समाजों की तरह खूब रही, किन्तु किसी पत्नी के साथ बदसलूकी का उदाहरण नहीं मिलता। स्वयंवर के सन्दर्भ में आचार्य जिनसेन ने 783 ईस्वी में जो घोषणा की उसमें सिद्धान्त और व्यवहार एक - दूसरे के रूबरू होते हैं, चिंतन की वैज्ञानिकता है, मानवता के कीर्तिमान हैं. नारी का यथार्थवादी मल्यांकन है - 'स्वयंवर रचाकर कन्या अपनी रूचि का वर चुनती है, स्वयं चुने गये पुरुष के कुलीन या अकुलीन होने का प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिये स्वयंवर के मामले में समझदार भाई या अपने - पराये किसी भी व्यक्ति का गुस्से में आ जाना ठीक नहीं। कोई व्यक्ति खासा कुलीन होने पर भी अभागा हो अर्हत् वचन, अप्रैल 99

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