Book Title: Arhat Vachan 1999 04
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 11
________________ अर्हत् वचन (कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर वर्ष - 11, अंक - 2, अप्रैल 99, 9 - 18 जैन समाज में नारी की हैसियत - आचार्य गोपीलाल अमर ** 8888888889900mm नर-नारी पर एक नजर प्रकृति का, कुदरत का, एक हिस्सा मानव-जाति भी है। उसमें नर की प्रकृति नारी की प्रकृति से अलग है। यह अलगाव भी प्राकृतिक है, इसलिये सब जगह है और सदा रहेगा। नर और नारी का यह अलगाव, वास्तव में, एक जुड़ाव है, नर - नारी के जोड़ से ही मानव - जाति का सिलसिला कायम है। यह सिलसिला भी प्रकृति की देन जैन धर्म प्रकृति प्रधान तो है ही, प्रकृति का दूसरा नाम भी है। प्रकृति की स्थापना या प्रवर्तन किसी ने कहीं किया, इसलिये जैन धर्म की स्थापना या प्रवर्तन भी किसी ने नहीं किया, इसीलिये नर और नारी में अलगाव - जुड़ाव की स्थापना या प्रवर्तन भी किसी ने नहीं किया। जैन सिद्धान्त की बुनियाद, व्यवहार की इमारत, साहित्य की सजावट और इतिहास की इबारत प्रकृति की जमीन पर बनती- बिगड़ती है। जैन समाज में नारी का विकास जैन समाज भारतीय समाज में इतना घुला - मिला है कि उसे अलग करके देख पाना मुश्किल है। पुत्री, बहिन, ननद, भानजी, भतीजी, पोती, धेवती, दुल्हिन, वधू, पतोहू, पत्नी, भाभी, जेठानी, देवरानी, माता, ताई, चाची, बुआ, मौसी, मामी, सास, दादी, नानी आदि नाते - रिश्ते और कन्या, कुमारी, सधवा, सपत्नी, रखैल, विधवा, दासी, दाई आदि विशेषण जैन समाज में नारी की वही हैसियत सूचित करते हैं जो जैनतर समाज में है संस्कार, दस्तूर, फैशन आदि भी अक्सर एक-जैसे हैं, काननी और संवैधानिक स्थिति भी प्राय: एक- जैसी ही है। इसलिये 'जैन समाज' के साथ 'जैन' विशेषण इस कारण से नहीं, बल्कि अन्य कारणों से लग सकता है, जबकि पुरुष या नारी के साथ लगे 'जैन' विशेषण का मतलब हो जायेगा जैन धर्म का अनुयायी पुरुष या नारी।। फिर भी, जैन आचार - व्यवहार में नारी की वैधानिक स्थिति, या कानूनी हैसियत, अच्छी अधिक और बुरी कम रही है, क्योंकि अपने परिवेश में प्रचलित सभी अच्छी परम्पराओं, प्रवृत्तियों आदि को मुक्त हृदय से अपनाने को जैन नर - नारियों को छूट रही और हानिकारक या सदोष परंपराओं (मूढ़ताओं) आदि से बचने की हिदायतें दी जाती रहीं। यही कारण है कि 'मनुस्मृति', 'मिताक्षरा' आदि की तरह का कोई धर्मशास्त्र (शरीअत या रिलजियस लॉ) लिखना जैनाचार्यों ने गैरजरूरी समझा। उन्होंने जैन धर्म और संस्कृति की व्याख्या में, या समाज व्यवस्था और लौकिक विकास पर बहुत लिखा, बारीकी से लिखा। लेकिन धर्मशास्त्र पर लिखने की बारी आई तो वे महज एक जुमला कह कर आगे बढ़ गये, 'वे सभी लौकिक विधान जैनों के लिये प्रमाण (मंजूर) हैं, जिनसे सम्यक्त्वव की हानि न हो और व्रतों में दोष न लगे।' सर्व एव हि जैनानां प्रमाणं लौकिको विधिः। यत्र सम्यक्त्व -हानिर्-न यत्र न व्रत-दूषणम्॥' * 12.10.1996 को एम.डी. जैन कॉलिज, आगरा के प्रांगण में पठित लेख का कुछ परिवर्धित रूप। * शोध अधिकारी, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली। निवास - 'अमरावती', सी-2/57, भजनपुरा, दिल्ली- 1100531

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