Book Title: Anusandhan 2002 09 SrNo 21
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 4
________________ निवेदन मध्यकालीन कृतिओनुं संपादन करनार माटे एक समस्या अनिवार्यपणे ऊभी थाय छे के तेणे संपादन माटे हाथ पर लीधेली कृतिनुं संपादन तथा प्रकाशन क्यांय थयुं हशे के केम ? गुजराती साहित्य कोश तथा जैन गुर्जर कविओ जेवा मातबर संदर्भग्रंथो, अलबत्त, उपलब्ध छे, अने तेनो उपयोग करवाथी घणे अंशे आ समस्या उकली पण शके छे ज. आम छतां, एटली बधी कृतिओ छे, अने एटली बधी विविध रीते ने जगाएथी प्रकाशन थयुं-थतुं होय छे के घणी कृतिओ विशे जाणकारी नथी पण मळती. आथी, आ रीते संपादित-प्रकाशित थयेली तथा थती कृतिओनी एक, विविध माहितीथी भरपूर, सूचि करवामां आवे, तो ते एक महत्त्वपूर्ण संदर्भग्रंथ बनी रहे खरो. आवी ज सूचि शोधलेखो तथा शोधप्रबन्धोनी पण थवी जोईए. ___'अनुसंधान' माटे काम करवानुं आवतां तेमां समस्या ऊभी थवा मांडी होई, आ विचार सहज ऊगतां, अत्रे उपस्थित कर्यो छे. -शी. આર્થિક સહયોગ શ્રી મહાવીર સ્વામી શ્વે.મૂ. જૈન મંદિર ટ્રસ્ટ, ચિક પેટ અને શ્રી શંખેશ્વર પાર્શ્વનાથ જૈન શ્વે.મૂ. મંદિર, રાજાજીનગર બેંગલોર Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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