Book Title: Agam 06 Ang 06 Gnatadharma Sutra Nayadhammakahao Terapanth
Author(s): Tulsi Acharya, Nathmalmuni
Publisher: Jain Vishva Bharati

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Page 422
________________ नायाधम्मकहाओ अब्भणुण्णाया समाणी पासस्स अरहओ अंतिए मुंडा भवित्ता अगाराप्रो अणगारियं पव्वइत्तए। अहासुहं देवाणुप्पिए! मा पडिबंध करेहि ।। २६. तए ण से काले गाहावई विउलं असण-पाण-खाइम-साइमं उवक्खडावेइ, उवक्खडावेत्ता मित्त-नाइ-नियग-सयण-संबंधि-परियणं आमतेइ, पामतेत्ता तम्रो पच्छा पहाए जाव' विपुलेणं पुप्फ-वत्थ-गंध-मल्लालंकारेणं सक्कारेइ सम्माणेइ, सक्कारेत्ता सम्माणेत्ता तस्सेव मित्त-नाइ-नियग-सयण-संबंधिपरियणस्स पुरमो कालिं दारियं सेयापीएहिं कलसेहि व्हावेइ, व्हावेत्ता सव्वालंकार-विभूसियं करेइ, करेत्ता पुरिससहस्सवाहिणि सीयं दुरूहेइ, दुरूहेत्ता मित्तनाइ-नियग-सयण-संबंधि-परियणणं सद्धि संपरिवुडे सव्विड्डीए जाव' दुंदुहिनिग्धोस-नाइयरवेणं आमलकप्पं नयरिं मझमझेणं निग्गच्छइ, निम्गच्छित्ता जेणेव अंबसालवणे चेइए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता छत्ताईए तित्थगराइसए पासइ, पासित्ता सीयं ठवेइ, ठवेत्ता कालि दारियं सीयानो पच्चोरुहेइ ।। तए णं तं कालि दारियं अम्मापियरो पुरनो काउं जेणेव पासे अरहा पुरिसादाणीए तेणेव उवागच्छंति, उवागच्छित्ता वदंति नमसंति, वंदित्ता नमसित्ता एवं वयासी–एवं खलु देवाणुप्पिया ! काली दारिया अम्हं धूया इट्ठा कंता जाव उंबरपुप्फ पिव दुल्लहा सवणयाए, किमंग पुण पासणयाए ? एस ण देवाणुप्पिया ! संसारभउव्विग्गा इच्छइ देवाणुप्पियाणं अंतिए मुंडा भवित्ता •णं अगाराम्रो अणगारियं° पव्वइत्तए। तं एयं णं देवाणुप्पियाणं सिस्सिणिभिक्खं दलयामो। पडिच्छत् णं देवाणप्पिया ! सिस्सिणिभिक्खं । अहासुहं देवाणुप्पिया ! मा पडिबंध करहि ॥ २८. तए ण सा काली कुमारी पास अरहं वंदइ नमसइ, वंदित्ता नमंसित्ता उत्तर पुरथिमं दिसीभागं अवक्कमइ, अवक्कमित्ता सयमेव आभरणमल्लालंकारं प्रोमुयइ, प्रोमुइत्ता सयमेव लोयं करेइ, करेत्ता जेणेव पासे अरहा पुरिसादाणीए तेणेव उवागच्छइ, उवागच्छित्ता पासं अरहं तिक्खुत्तो आयाहिण-पयाहिणं करेइ, करेत्ता वंदइ नमसइ, वदित्ता नमंसित्ता एवं वयासी-प्रालित्ते णं भंते ! लोए १. ना० १७१६॥ २. ना. १२११३३ । ३. पच्चोरुहइ (क, ख, ग, घ)। ४. ना० १११११४५। १. सं. पा.--भवित्ता जाव पग्वइत्तए। ६. 'लोए' अतोने "एवं जहा देवाणंदा जाव" समर्पणवाक्यमस्ति, किन्तु भगवतीसूत्रे (६।१५२) देवागंदा-प्रकरणे समर्पितः पाठः संक्षिप्तोस्ति, तेन एतद्वाक्यं पाठान्तररूपेण स्वीकृतमस्माभिः । अस्य पूर्तिस्थलनिर्देशः प्रस्तुतसूत्रादेव कृतः। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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