Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapati Sutra Part 03 Stahanakvasi
Author(s): Madhukarmuni
Publisher: Agam Prakashan Samiti

View full book text
Previous | Next

Page 834
________________ ८०१ उन्नीसवाँ शतक : उद्देशक-८ सरीरनिव्वत्ति। [८ प्र.] भगवन् ! शरीरनिर्वृत्ति कितने प्रकार की कही गई है ? [८ उ.] गौतम! शरीरनिर्वृत्ति पांच प्रकार की कही गई है, यथा औदारिकशरीरनिर्वृत्ति यावत् कार्मणशरीरनिर्वृत्ति। ९. नेरतियाणं भंते! एयं चेव। [९.प्र.] भगवन् ! नैरयिकों की कितने प्रकार की शरीरनिर्वृत्ति कही गई है ? [९ उ.] गौतम! पूर्ववत् जानना चाहिए। १०. एवं जाव वेमाणियाणं, नवरं नायव्वं जस्स जति सरीराणि। । [१०] इसी प्रकार वैमानिकों पर्यन्त कहना चाहिए। विशेष यह है कि जिसके जितने शरीर हों, उतनी निर्वृत्ति कहनी चाहिए। . ११. कतिविधा णं भंते ! सव्विंदियनिव्वत्ती पन्नत्ता ? गोयमा ! पंचविहा सव्विंदियनिव्वत्ती पन्नत्ता, तं जहा—सोतिंदियनिव्वत्ती जाव फासिंदियनिव्वत्ती। [११ प्र.] भगवन् ! सर्वेन्द्रियनिर्वृत्ति कितने प्रकार की कही गई है ? [११ उ.] गौतम! सर्वेन्द्रियनिर्वृत्ति पांच प्रकार. की कही गई है, यथा— श्रोत्रेन्द्रियनिर्वृत्ति यावत् स्पर्शेन्द्रियनिर्वृत्ति। १२. एवं जाव नेरइया जाव थणिकुमाराणं। [१२] इसी प्रकार नैरयिकों से लेकर स्तनितकुमारों पर्यन्त जानना चाहिए। १३. पुढविकाइयाणं पुच्छा ? गोयमा ! एगा फासिंदियसव्विंदियनिव्वत्ती पन्नत्ता। [१३ प्र.] भगवन् ! पृथ्वीकायिक जीवों की कितनी इन्द्रियनिर्वृत्ति कही गई है ? [१३ उ.] गौतम! उनकी एक मात्र स्पर्शेन्द्रियनिर्वृत्ति कही गई है। १४. एवं जस्स जति इंदियाणि जाव वेमाणियाणं। [१४] इसी प्रकार जिसके जितनी इन्द्रियाँ हों उतनी इन्द्रियनिर्वृत्ति वैमानिकों पर्यन्त कहनी चाहिए। १५. कतिविधा णं भंते ! भासानिव्वत्ती पन्नत्ता ?

Loading...

Page Navigation
1 ... 832 833 834 835 836 837 838 839 840