Book Title: Aagam 12 AUPAPAATIK Moolam evam Vrutti
Author(s): Dipratnasagar, Deepratnasagar
Publisher: Deepratnasagar

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Page 15
________________ आगम (१२) “औपपातिक” - उपांगसूत्र-१ (मूलं+वृत्ति:) ----------- मूलं [२] मुनि दीपरत्नसागरेण संकलित...........आगमसूत्र - [१२], उपांग सूत्र - [१] "औपपातिक" मूलं एवं अभयदेवसूरि-रचित वृत्ति: * प्रत सूत्रांक * (२) *% A दीप |देवः 'चैत्यम्' इष्टदेवताप्रतिमा 'दिवे' दिव्यं प्रधानं । 'सच्चे' सत्यं सत्यादेशत्वात् । 'सच्चोवाए' सत्यावपातं । 'सत्यसेव' | सेवायाः सफलीकरणात् । 'सणिहियपाडिहरे' विहितदेवताप्रातिहार्य । 'जागसहस्सभागपटिच्छए' यागाः-पूजाविशेषाः ब्राह्मणप्रसिद्धाः तत्सहस्राणां भागम्-अंशं प्रतीच्छति आभाव्यत्वात् यत्तत्तथा, वाचनान्तरे 'यागभागदायसहस्सपडि च्छए' यागा:-पूजाविशेषाः भागा-विंशतिभागादयो दायाः-सामान्यदानान्येषां सहस्राणि प्रतीच्छति यत्तत्तथा । 'बहुजणों' Mइत्यादि सुगम, नवरं 'पुण्णभद्दचेइयं ' इति अत्र द्विवचनं भक्तिसम्भ्रमविवक्षयेति ॥२॥ से णं पुण्णभद्दे चेइए एकेणं महया वणसंडेणं सब्बओ समंता संपरिक्खित्ते, से णं वणसंडे किण्हे किण्होभासे नीले नीलोभासे हरिए हरिओभासे सीए सीओभासे गिद्धे गिद्धोभासे तिब्वे तिब्वोभासे किण्हे | लकिण्हच्छाए नीले नीलच्छाए हरिए हरियच्छाए सीए सीयच्छाए णिहे णिच्छाए तिब्वे तिब्वच्छाए घणकडिअकडिच्छाए रम्मे महामेहणिकुरंबभूए। 'सधओ समन्ता' इति सर्वतः-सर्वदिक्षु समन्तात्-विदिक्षु । 'किण्हे'त्ति कालवर्णः । 'किण्होभासे त्ति कृष्णावभासः कृष्णप्रभः, कृष्ण एवावभासत इति कृष्णायभासः । एवं 'नीले नीलोभासे' प्रदेशान्तरे, 'हरिए हरिओभासे' प्रदेशान्तरे & एव, तत्र नीलो-मयूरगलवत्, हरितस्तु शुकपुच्छवत्, हरितालाभ इति वृद्धाः। 'सीए'त्ति शीतः पापेक्षया, बल्याद्या कान्तत्वात् इति वृद्धाः । 'णिद्धे'त्ति स्निग्धो न तु रूक्षः । 'तिब्बे'त्ति तीनो वर्णादिगुणप्रकर्षवान् । 'किण्हे किण्हच्छाएत्ति, | इह कृष्णशब्दः कृष्णच्छाय इत्यस्य विशेषणमिति न पुनरुक्तता, तथाहि-कृष्णः सन् कृष्णच्छायः, छाया चादित्यावरण अनुक्रम 4 % AC Baitaram.org | पूर्णभद्रचैत्यस्य वर्णनं, वनखंडस्य वर्णनं ~14~


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