Book Title: Shrutsagar 2014 09 Volume 01 04
Author(s): Kanubhai L Shah
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर श्रुतसागर SHRUTSAGAR (MONTHLY) September 2014, Volume : 01, Issue : 04 Annual Subscription Rs. 150/- Price Per copy Rs. 15/ Editor : Kanubhai Lallubhai Shah mamLLER muTRN. muTUITIOTICE PUNetTM TITHIran FF BATO सारख्या तारातंबोल नगर का काल्पनिक रेखा चित्र आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर For Private and Personal Use Only Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir राजस्थान की पुण्यधरा श्री नाकोडातीर्थ में परम पूज्य गुरुभगवंतश्री का ८०वाँ जन्मदिवस के पावन प्रसंग की झलक FOL For Private and Personal Use Only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir - (आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर का मुखपत्र) - - श्रुतसागर મૃતસાગર SHRUTSAGAR (Monthly) वर्ष-१, अंक-४, कुल अंक-४, सितम्बर-२०१४ * Year-1, Issue-4, Total Issue-4, Sept.-2014 वार्षिक सदस्यता शुल्क-रू. १५०/- * Yearly Subscription - Rs.150/ अंक शुल्क - रू. १५/- * Issue per Copy Rs. 15/ आशीर्वाद राष्ट्रसंत प. पू. आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. * संपादक * * सह संपादक * कनुभाई लल्लुभाई शाह हिरेन के. दोशी एवं ज्ञानमंदिर परिवार १५ सितम्बर, २०१४, वि. सं. २०७०, भाद्रपद वद-७ रजन Lan प्रकाशक आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा, गांधीनगर-३८२००७ फोन नं. (०७९) २३२७६२०४, २०५, २५२ फेक्स : (०७१) २३२७६२४९ Website : www.kobatirth.org Email : [email protected] For Private and Personal Use Only Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra १. संपादकीय २. गुरुवाणी ३. Beyond Doubt ४. तारातंबोल नगर वर्णन ५. कृतिवंश परिचय ६. पुस्तक परिचय ७. समाचार सार प्राप्तिस्थान : www.kobatirth.org अनुक्रम हिरेन दोशी आचार्यश्री पद्मसागरसूरिजी Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Acharyashri Padmasagarsuriji नविन वी. जैन रामप्रकाश झा डॉ. हेमन्तकुमार डॉ. हेमन्तकुमार आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर तीन बंगला, टोलकनगर परिवार डाईनिंग हॉल की गली में पालडी, अहमदाबाद - ३८०००७ फोन नं. (०७९) २६५८२३५५ For Private and Personal Use Only ३ ११ २२ २८ ३० Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir संपादकीय श्रुतसागरनो चोथो अंक आपश्रीना हाथमां छे. जीवनने मांजी शकाय एवा समयनी शुभ घडी एटले पर्व.. वर्षनुं विशेष अने आराधनानुं सविशेष पर्व एटले पर्युषण महापर्व ... भारतभरना तमाम श्री संघोमां खूब सुंदर रीते आराधना साधना पूर्ण थई... ए तमाम सुकृतोनी आनंदानुमोदना... आ अंकनी वात : गया अंकमां प्रकाशित वाक्-संयम अंगे पूज्य गुरुभगवंत श्रीए आपेल प्रवचननो आगळनो भाग आ अंकमां प्रकाशित कर्यो छे. तो साथे-साथे वाचकोनी मांगणीने अनुसार पूज्य गुरुभगवंतश्रीए आपेल प्रवचनोने गुजराती अने अंग्रेजी भाषामां पण प्रकाशित करवानुं प्रारंभ कर्तुं छे. आ अंकमां पद्यात्मक कृतिना बदले अप्रकाशित कृतिनी श्रेणिमां तारातंबोल नगरनो परिचय करावता चार पत्रो तेमज जैन सत्य प्रकाशमां अलग-अलग वर्षोमां प्रकाशित थयेला बे पत्रो एम कुल छ पत्रो अत्रे प्रकाशित कर्या छे. अत्रे प्रकाशित पत्त्रो ए मात्र कोई नगरनो के एक नगरथी बीजा नगरना अंतर मात्रनो उल्लेखात्मक परिचय नथी, पण ते ते नगर के गामनी साथे दूर-दूरना देशांतरोमां पण जिनधर्मनुं विस्तरण अने माहात्म्य जाणी शकाय छे. आ नगरी अने एनी आखी व्यवस्था विशे सचोट पुरावा शोधवाना बाकी छे. वाचकोनी उपादेयता अने शोधप्रवृत्ति माटे आ पत्रो प्रकाशित कर्या छे. लेखना अंतभागे छए पत्रोनो एक कोठो आप्यो छे. जेथी वाचकोने सरळता रहे.... ज्ञानमंदिरनी कार्य प्रणाली श्री संघमां प्रचलित अने प्रसिद्ध छे. सौ कोई अहींनी श्रुतसेवाथी प्रसन्न छे. वाचकोने श्रुतभंडारमां रहेला पुस्तकोनी माहितीओ सरळताथी मी शके ए माटे एक अनोखु अने आगवुं कही शकाय एवं एक Software बनाव्यं छे. आ प्रोग्राममां विविध प्रकारनी विशेषताओनो व्यापक द्रष्टिकोणथी समावेश करवामां आव्यो छे. एमांनी एक विशेषता एटले Kruti Tree एटले कृतिवंश... पुस्तक, हस्तप्रत के मेगेझिनमां प्रकाशित / लिखित माहितीओ प्रोग्राममां कया For Private and Personal Use Only Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR SEPTEMBER-2014 स्वरूपे संगृहीत थाय छे. तेमज एनाथी केवा अने केटला विविध लाभो श्री संघने अने वाचकवर्गने थई शके छे ए जणाववा माटे एवी दरेक विशेषताओ उपर सरळ भाषामां ज्ञानमंदिरना लायब्रेरी प्रोग्रामनी माहितीओ यथावसरे लेख स्वरूपे प्रकाशित थती रहेशे. एमांनो पहेलो मणको कृति वंश परिचय प्रस्तुत अंकमां प्रकाशित कर्यो छे. ___ तो साथे-साथे जीवन व्यवहारमा अने अध्यात्म जीवनमा उपयोगी थाय एवं एक पुस्तक एटले जैन आचार मीमांसा में जीवन प्रबन्धन के तत्त्व' नो संक्षिप्त परिचय प्रकाशित कर्यो छे. नोंध :- प्रस्तुत अंकना मुख्य टाईटल उपर प्रकाशित तारातंबोल नगरनुं परिचायक रेखा चित्र सम्राट संप्रति संग्रहालय विभागमांथी साभार अत्रे प्रकाशित कर्यु छे. क्षमापना वीरनु भूषण अने सज्जन- आभूषण गणाय एवं तत्त्व छे क्षमा... तलवारनी धार करता जेनो प्रभाव वधु छे एवं उपास्य तत्त्व छे क्षमा... मैत्रीनी महेंक अने धीना दीवाना सौम्य प्रकाशनी उपमा आपी शकाय एवं तत्त्व छे क्षमा... क्षमापनाना आपर्वनिमित्तेवीतेला वर्षना काळ प्रदेश उपर समयना सथवारे तमारी साथे यात्रा करता करता श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र परिवार तथा आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर परिवार तरफथी तमारा मनोभावने स्हेज पण दुःख थयु होय तो पर्वाधिराजना आ पावन पर्वने पामीने आपश्रीने सांवत्सरीक मिच्छामिदुक्कडम् पाठवीए छीए. For Private and Personal Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir गुरुवाणी आचार्य पद्यसागरसूरि वाक्-संयम सियार जब उस लाश के पास आया और सूंघकर देखने लगा; योगी की दृष्टि भी वहाँ पर गई। उसे मालूम पड़ा कि सियार आया है। वह इस लाश को खायेगा, भक्षण करेगा। दूर से ही योगी पुरुष ने अपने अन्तर की करुणा से कहा रे रे मुञ्चक मुञ्च सहसा, नीचस्य निंद्यवपुः योगी पुरुष ने दूर से देखकर उस सियार से कहा कि अवश्य ही तुमने पूर्व जन्म में कोई ऐसा अपराध किया होगा जिसका वह वर्तमान परिणाम है। इतनी निकृष्ट योनि में, पशु योनि में तुम्हारा जन्म हुआ है। यदि अब तुमने ऐसे गलत व्यक्ति की लाश को खाया तो भविष्य में तुम्हारी क्या गति होगी? यह भयंकर पापी आत्मा है। जीवन में कभी धर्म कार्य इसने किया नहीं। इसका सारा मनुष्य-जन्म निष्फल गया है। इसका सारा जीवन पाप-प्रवृत्ति से भरा हुआ रहा। ऐसी दुषित आत्मा की लाश है यह। इसे खाना छोड़। सियार ने कहा - भगवन्! आपका आदेश तो उचित है परन्तु मुझे भूख इतनी सता रही है कि जीना दुष्कर हो गया है। बड़ी मुश्किल से यह लाश मिली है। इसे भी आप मना कर रहे हैं। मुझ पर दया करिये। केवल थोड़ा-सा आहार का आधार मिल जाये, तो मुझे बड़ा सन्तोष होगा। इसकी यदि आँखें खा लूँ तो क्या हर्ज है? छोटी-सी आँख है। इस आँख ने क्या पाप किया होगा? योगी पुरुष ने सियार से कहा - ___नेत्रे साधु विलोक रहिते, इस आँख ने कभी सन्तपुरुषों का दर्शन नहीं किया। इसकी दृष्टि मात्र लोगों के दुर्गुणों पर गई। काक दृष्टि कैसी होती है? कौए की नजर जाती है गन्दगी पर। हमारी दृष्टि का यह विकार हमारे जीवन का विनाश करता है। हर व्यक्ति के दुर्गुण पर ही हमारी दृष्टि जाती है ह्यूमन साइकोलोजी है। मानवीय मनोविज्ञान है। आप यदि अपने मकान के अन्दर एक दम हाइट पेपर, सफेद कागज, बोर्ड पर लगा दें और मैं उसके बीचों-बीच काला बिन्दु रख दूं, तो आप सच कहें कि नजर कहाँ जायेगी? बिल्कुल केन्द्र में, सेन्टर में मैंने जहाँ काला बिन्दु लगा दिया है, सबकी नजर वहीं जायेगी। For Private and Personal Use Only Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR SEPTEMBER-2014 यह अनादिकाल का संस्कार है। ९९ प्रतिशत उसमें एकदम ह्वाइट पेपर है, सफेद कागज है। एक पर्सेन्ट यदि मैंने ब्लैक स्पोट कर दिया, काला निशान बना दिया, नजर उस काले निशान पर जायेगी। ९९ प्रतिशत जो निर्मल है, स्वच्छ है, वहाँ नजर नहीं जायेगी। यही हमारी आदत है, किसी व्यक्ति में हजार गुण हों, वहाँ हमारी दृष्टि नहीं जायेगी। परन्तु जहाँ जरा-सा भी दुर्गुण झलक जाये, हम झट वहीं पर दृष्टि टिका लेंगे। अपवाद या अवर्णवाद बोलकर अपनी जीभ गंदी करेंगे और तुरन्त पर-निन्दा के आश्रित बन जायेंगे। ____ योगी पुरुष ने कहा-'नेत्र साधु विलोकरहिते' इस आँख से कभी साधु पुरुषों का दर्शन ही नहीं किया, परदोष दर्शन में ही इसकी दृष्टि रही। अत: दृष्टि इसकी मलिन बनी रही। कभी प्रभु का दर्शन नहीं किया। विकार से भरी इसकी दृष्टि ने कभी अपने आप को नहीं देखा। यह हमेशा पर दृष्टि में रहा। लोग क्या करते हैं? यही देखने में जीवन चला गया। मेरे अन्तर जगत् में क्या है? यह देखने का प्रयास ही नहीं किया। अपने को देखने की दृष्टि प्राप्त नहीं की। दृष्टि निर्मल होनी चाहिये। परमात्मा ने कहा-गिद्ध दृष्टि चाहिये। गिद्ध की दृष्टि बहुत गहरी होती है। बहुत ऊँचाई से वह अपनी वस्तु को देख लेता है। उसी तरह से हमारे जीवन में दृष्टि होनी चाहिये। वर्तमान में रहकर भी मैं अपने परलोक को देख सकूँ। कल्पना कर सकूँ कि मेरा कार्य मुझे कहाँ पहुँचायेगा, किस प्रकार की मुझे गति मिलेगी? वर्तमान में इस प्रकार से देखना, यह दूरदृष्टि या गिद्ध दृष्टि है। सियार चुप रहा, परन्तु क्या करे, वह भूख से लाचार था। उसने कहा ‘भगवन्! और कुछ नहीं, कान खाँ, लूँ तो क्या है? कान ने क्या पाप किया है? छोटे-से कान यदि मैं भक्षण कर लूँ तो मुझे थोड़ी सी तृप्ति मिल जायेगी। मानसिक सन्तोष मुझे मिल जायेगा। 'सारश्रुतौ द्रोहिणी' योगी पुरुष ने गर्जना करके कहा-इस कान ने कभी भला श्रवण नहीं किया। पर-निन्दा का ही श्रवण किया है। जगत् की चर्चा का ही श्रवण किया है, कभी धर्म कथा या प्रवचन से इसने इस कान को पवित्र नहीं किया। ये कान खाने योग्य नहीं, तेरी बुद्धि भ्रष्ट हो जाएगी, तेरी सारी पवित्रता भी चली जाएगी, मेरा यह आदेश है, तू इसे खाने का विचार छोड़ दे। (क्रमश:...) For Private and Personal Use Only Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ગુરુવાણી (આત્મામાં લીન બનવું તે યોગ) આચાર્ય પદ્મસાગરસૂરિ આ દવા શરીર ઉપરના રોગોને દૂર કરે છે તેવી જ રીતે ભગવાનની વાણી, સંતોના શબ્દો આત્મામાં પડેલ વિષય-કષાયોરૂપી રોગોને દૂર કરે છે. જગત આખુંય ત્રણ પર્યાયમાં આવી જાય છે. આ જગતમાં પદાર્થો ઉત્પન્ન થાય છે. નાશ પણ થાય છે અને મૂળ રૂપે તો જગતના સર્વ પદાર્થો સ્થિર છે. જેમ કે માણસનો જન્મ થાય તે ઉત્પત્તિ કહેવાય, મરી ગયો તે નાશ અને મૂળ સ્વરૂપે રહેલો આત્મા તો અમર જ છે. તે તો કદી મરતો નથી. આત્મા સ્થિર છે એવી જ રીતે સર્વે પદાર્થોને ગણવા. આત્માની અંદર શોધ કરવાથી આત્માની પ્રાપ્તિ થાય છે. પરમાત્મા અરૂપી છે તે આંખથી દેખાતા નથી. પણ જ્ઞાનદૃષ્ટિથી આત્મામાં તેની અનુભૂતિ થાય છે. યોગ એટલે મન, વચન અને કાયાને સ્થિર કરી દેવાં ને પછી આત્મામાં લયલીન બની જવું. તે યોગ પણ જીવનમાં મહત્ત્વનો ભાગ ભજવે છે. યોગ આત્મદશામાં સ્થિર કરે છે. છે જ્યારે આત્માનો સાચો અનુભવ થાય છે ત્યારે સર્વ પ્રકારનાં દુઃખો શાંત થઈ જાય છે અને જ્યારે આત્મામાં આનંદના કુવારા ફુટે છે ત્યારે આત્મા સાચો યોગી બની જાય છે. જંગલ કે બગીચાને પાણી ન મળે તો તે સુકાઈ જાય છે અને ફળ મળતાં નથી. એવી જ રીતે જીવન એ બગીચો છે. તેને પ્રવચનરૂપી પાણી ન મળે તો તે સુકાઈ જાય છે અને મોક્ષરૂપી ફળ મળતું નથી. છે જ્યાં આત્મચિન્તન હોય ત્યાં ચિન્તા હોય જ નહીં અને જ્યાં ચિન્તા છે ત્યાં ચિન્તન પણ ન હોય. ખરેખર જીવ એમ વિચારે કે હું અહીં ક્યાંથી આવ્યો છું, શું કરી રહ્યો છું, કેટલો રહેવાનો છું, ક્યારે અને ક્યાં જઈશ તો જરૂર વૈરાગ્યભાવ આવે. માણસ વર્તમાનનો વિચાર કરે છે પણ ભવિષ્યકાળનો વિચાર કરતો નથી, ભૂતકાળને દેખતો નથી પણ વર્તમાનમાં જો ભવિષ્યનો વિચાર આવી જાય તો આત્મામાં તુરત જ સ્થિરતા આવી જાય છે, પાપનો વિચાર નાશ થઈ જાય છે. ખરાબ વિચાર કરવા એટલે હિન્સાના વિચારો કરવા. બીજાને મારી નાખવાના વિચારો કરવા તે રૌદ્રધ્યાન છે. એ ધ્યાન જે જીવ કરે તે નરકમાં જાય છે અને ત્યાં ભયંકર દુઃખો ભોગવે છે માટે એવા ધ્યાનમાં મનને ન ફસાવા દેવું. For Private and Personal Use Only Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra SHRUTSAGAR www.kobatirth.org 8 ધર્મ ધમાલમાં નથી Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SEPTEMBER-2014 * સામાયિકમાં ચિન્તન અને મનન કરવાનું છે, સામાયિકમાં સંવાદમય તત્ત્વ મળે છે. પ્રભુ મહાવીર ગૌતમને કહે છે કે તારી ઇંદ્રિયોને તું કાચબાની માફક વાપર. જ્યારે ભય આવે ત્યારે કાચબો પોતાની બધી ઇંદ્રિયોને સંકોચી લે છે તેમ પાપ કરવાનો ભય લાગે ત્યારે મોઢું, કાન, બધું બંધ કરી પ્રભુનું સ્મરણ કરવું. * ધમાલની અંદર ધર્મ છે જ નહિ. સાધના દ્વારા શુદ્ધિ અને શુદ્ધિ દ્વારા સાધના કરવાની છે. અંતરનું વલોણું કરી કરીને આત્મશુદ્ધિ કરવાની છે. * જાત્રામાં સંઘ ચાલ્યો ત્યારે એક શાંતિપ્રિય ભાઈએ કહ્યું કે હું મારી જવાબદારીથી જાત્રામાં આવી શકું તેમ નથી પણ એક તુંબડું આપ્યું અને કહ્યું કે આ તુંબડાને બધે સ્નાન કરાવીને, જાત્રા કરાવીને પવિત્ર કરાવજો. જાત્રા કરીને પાછા આવ્યા ત્યારે પેલા ભાઈએ પોતાનું તુંબડું પાછું માગ્યું અને જાત્રા કરીને આવેલાને સાદું ભોજન જમાડ્યું. આપણે જીવનમાં જેમ બને તેમ સાદાઈને લાવવાની છે. સાદાઈથી જીવન શાંત અને શુદ્ધ બનશે. જમણમાં પેલી તુંબડીનું શાક કર્યું: તુંબડી એકદમ કડવી હતી. તુંબડીનું શાક ખાઈને બધાંનાં મોઢાં કડવાં થઈ ગયાં. ન પેલા ભાઈએ કહ્યું કે આ તુંબડી ઘણી નદીઓમાં સ્નાન કરીને આવી છતાં પણ મીઠી ન થઈ તો આપણું અંતર પણ ઘણી જાત્રા કરે છતાં અંતરને શુદ્ધ ન બનાવે તો જાત્રા કર્યાનો ફાયદો શું? પહેલા તો સામાયિક સમતાથી અંતરને શુદ્ધ કરવાનું છે. * લોકો સદ્ગુણને, સારી વસ્તુઓને યાદ કરે છે, બળવાન કે પૈસાદારને કોઈ યાદ કરતા નથી. સુંદર ફર્નીચર હોય અને સુંદર બ્લોક હોય છતાં અંતરમાં શાંતિ ન હોય તો એ બ્લોક શું કરવાનો? For Private and Personal Use Only * ધમાલમાં અને ધમાલમાં જીવનને પૂરું કરી નાંખવાનું નથી. જીવન જીવવામાં આત્માનો પૂરેપૂરો વિચાર કરવાનો છે. આપણું જીવન રાગ-દ્વેષ-વેર-ઝેર-ઇર્ષા અને માનમાં પૂરું કરી નાંખવાનું નથી પણ ધીમે ધીમે દુર્ગુણોને બહાર કાઢવાના છે. Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Beyond Doubt Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir Acharya Padmasagarsuri The great Omniscient Lord, the last of the twenty four Thirthankars, the Lord of Lords, Lord MAHAVIRA had eleven major disciples who are called Ganadharas2. Prior to being Ganadharas, they were eminent scholars of Vedas, but still each one had some doubt or the other based on the Vedic tenets. In the very first meeting, (acquaintance), the Lord had their doubts thoroughly cleared after a discussion and it was this discussion that came to be popularly known as 'Ganadhara Vada. The Pavapuri city of India today was a great city called 'Apapa' in those days. A brahmin named Somil once organized a very big Yagna i.e. sacrificial ceremony and invited distinguished scholars to make the ceremony a great success. Somil called upon the eleven Brahmin pundits (scholars) who brought along with them four thousand four hundred students and made the ceremonial place a very busy and ceremonious one. Indrabhuti, Agnibhuti, Vayubhuti, Vyaktabhuti, Sudharma, Mandita, Mauryaputra, Akampita, Achalabhrata, Metarya and Prabhasa were the eleven Vedic scholars who came to glorify the holy function. Although each one had some doubt or other, each one regarded himself as an omniscient; overpowered by their ego, they never presented their doubts for clarification for the fear of being labelled as less knowledgeable and insignificant to the one who cleared their doubts and moreover their ego would have got a major blow. Each one could have got his doubt cleared if they desired, by presenting it before the others, for each one had a different doubt, but their ego-laden minds kept them silent and their doubts lay suppressed in their minds. 1. Kevali, 2. Prime Disciples For Private and Personal Use Only Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 10 SEPTEMBER 2014 It was during this time that Lord Mahavira arrived in Pavapuri when the great Yagna was organised and the heavenly beings i.e., the devas erected a Samavasarana for the Lord. To pay their obeisances and hear the holy discourse, the Gods came in their aerial vehicles“. Seeing this, Indrabhuti, the chief scholar was illusioned to believe that the Gods arrived there due to the unprecedented greatness of the Yagna and that they too were desirous to participate in the ceremony. But when the Gods moved their chariots ahead of the ceremonial place, Indrabhuti was shaken and shattered in belief and this incident left Indrabhuti wondering and contemplating on the blunder committed by the gods. He wondered if the gods had mistaken the ceremonial place. He was also proud that huge crowds had come from far off places to attend the Yagna. Along with eleven great scholars and 4400 students, thousands of great Brahmin scholars like Shankar, Shivshankar, Krishnadas, Govindram and others had come to grace the occasion and the whole atmosphere was colourful and pompous. He wondered if the gods had lost their balance of mind and became bankrupt in their divine knowledge. Ordinary people commit mistakes owing to their limited knowledge, but it is not understandable how these gods possessing Avadhi Gyanana (clairvoyance knowledge) commit such a mistake. In the meantime, one of the proceeding Gods said to another. “We have to go hurry to the Samavasarana, so as not to miss even a little part of the discourse of the last Thirthankara of this Kaal. Let it not happen that we miss even a single word of His divine speech” (Continue...) 1. Place of Sermon of Thirthankars, 2. Heavenly Chariots, 3. Sacrificial ceremony. For Private and Personal Use Only Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir तारातंबोलनगरी वर्णन नविन वि. जैन प्रस्तुत लेख संग्रहमां अलग-अलग ग्रंथोमांथी लेखोनु संकलन करवामां आव्यु छे, अलग-अलग नगरीओना नामो, अंतर तेमज नगरीओनुं माप, त्यांनी बीजी पण जाणवा जेवी अनेक रोचक बाबतो आपवामां आवी छे, एनी सत्यासत्य हकीकत उपर वाचक वर्ग विचार करे अने इतिहासना अभ्यासीओने ए संबंधी कंइक शोध-खोळ करवामां उपयोगी थशे ए हेतुथी अहीं प्रगट करवामां आव्या छे. प्राचीन तारातंबोलनगरी ऐतिहासीक वर्णन तारातंबोल नगरीनुं वर्णन करतां नीचे मुजबना केटलाक हस्तप्रत ग्रंथो आ.श्रीकैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिरना संग्रहमांथी मळ्या छे. प्राचीन माहितीओ ऐतिहासिक अने उपयोगी जणाय छे. अगाउ जैन सत्यप्रकाश मासिक वर्ष-४ अंक३ मां संग्राहक-मुनिराज श्री कांतिसागरजी द्वारा अने बीजो पत्र वर्ष-६ अंक-६ मां संग्राहक-श्रीयुत सागरमलजी कोठारी द्वारा प्रकाशित करवामां आवेल छे ए बन्ने लेखो अने अहीं प्राचीन ग्रंथोमांथी आपेल माहितीमां केटलीक साम्यताओ साथे केटलीक माहितीओमा खास्सो तफावत छे. श्रीसागरमलजीना लख्या प्रमाणे तेमनाज शब्दोमां “कुछ मास पूर्व 'श्री जैन सत्य प्रकाश में तारातंबोलनगर विषयक पत्र प्रगट हुए थे। उस समय कहा गया था कि अगर अन्य किसी ग्रंथ में इस घटना से सम्बन्धित साहित्य हो तो प्रकाश में लाया जावे ताकि इस सम्बन्ध की ऐतिहासिक खोज की जाय”। तेओना आ कथनथी आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानभण्डारमांथी मळेल हस्तलिखित प्रतोना आधारे नीचे मुजबना जुदा-जुदा ग्रंथोमांथी, ग्रंथनी भाषा यथावत् राखी माहितीओनुं संकलन करवामां आव्यु छे. जे संशोधननी दृष्टिए पण आनु शुं मूल्य होई शके ए जोवानुं रहे छे. छतां आ वर्णनो भाषानी दृष्टिए के एवी बीजी कोई दृष्टिए विद्वानोने उपयोगी थई पडशे एम लागवाथी अहीं तेने प्रस्तुत करवामां आव्या छे. प्रत नं.३७३३९ पत्रांक नं. १A-RA ॥ अथ तारातंबोलनगररी वात लिखीयै छ । संवत् १६८४ मिती मिगसर वदि १३ पातसाह श्रीसाहजाह दिल्ली राज करै ते समै की बात छै मुलतान को वासी जात को ष(क्ष)ली नाम ठाकुर वुलाकी तिहां देसां For Private and Personal Use Only Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SEPTEMBER-2014 SHRUTSAGAR की वात आपकी निजर देख आयो ताकी ए वात नकल छै॥ १. प्रथम देस गुजरात मध्ये श्रीअहमदावाद नगर तासु कोस ३०० मुलतांन छै २. मुलतांनसुं कोस १५० लाहोर छै ३. लाहोर सेती कोस ३०० खंधार छै ४. खंधारसुं कोस ९०० इसफानगर छै ताको वाजार कोस १२ लाबो छै ५. इसफानगर सेती कोस ६०० खुरासान छै खुरासान को वाजार कोस १५ लांबो छै ६. खुरासानसु कोस १२०० इसफतंबोलनगर छै तिहां को बाजार कोस ३६ लांबो छै कोस २४ चोडो छै तिहां रोमी पातिसाह राज करै छै घोडा २४ लाख छ हाथी १ एक लाख पचीवीस हजार छै तीनलाख गुलाम छै पांचलाख वादी छै एक किरोड पंचवीस लाख पादा छै नगर कै चोफेर कोट चोकोर छै पातसाह की रहास को कोट तांबा को छै. __७. इसफतंबोलसै कोस १४०० चवदसै वव्वरदेस छै तिहां सपेद रेसम होवै छै सो माणस का लोही मै रंगीजै छै किरमची पाट रंगीजै छै ८. तिहां सेती कोस ५० आकलनगर छै ९. आकलनगरसै कोस ७०० तारातंबोल छै नगर छै तिहां माहाराजा श्रीसूरचंदजी राजा राज करै छै नगर को बाजार कोस ४० लांबो छै कोस ३६ चोडो छै नगर चोगरद कोट तांबां को छै कोटि माहिला रूपा का छै वाकी सोना का छै तिहां राजा जैनधर्म पालै छै तिहां नगर मैं देहरा सोना का छै देहरा सातसै ७०० सिखरबंध छै तिहां नगर मध्ये वीच चोक छै तिहां देहरो श्रीआदिनाथजी को छै कोस २ कै विस्तार मै छै देहरै को पूठो सोना को छै ओर देहरा को काम रूपा को छै थांभा देहरा का सोना का छै प्रतिमा सोना की छै प्रतिमा ऊंची धनुष्य ६ मण १०८३ तोल की छै वेदी सोना की छै संघासन जडाव को छै देहरा ऊपर कलस मण सातसै (७००) को छै सोना कै देहरा के आसपास बहुत देहरा छै तिहां प्रतिमा तीन ३ चोवीसी की छै तिहां त्रिकाल पूजा हवै छै मात्र नाटक भगवान के आगे होय छै साधु रहै छै राजा नित्य वखांण सुणै छै राजा साधान आहार पांणी दैनै भोजन करै छै इसी भांति जैनधर्मरी थित छै तारातंबोल पास सिंधु नदी वडै विस्तार मै वहै छै अहमदावाद नगर हुंती तारातंबोल नगर कोस ५६५० छै तिहां की वात सत्य छै ताकी नकल छै. ॥ इति तारांतंबोल नगररी वार्ता संपूर्ण ॥ For Private and Personal Use Only Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org सितम्बर-२०१४ 13 श्रुतसागर लि. । पं. । धर्मचंद ग्राम राहसर मध्ये ॥ सं १९०७ रा मिती चैत्र वदि ११ दिने लिखतं ॥ Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir प्रतिलेखक परिचय-पं. । धर्मचंद सं. १९०७ विद्वाननो विशेष परिचय उपलब्ध नथी. प्रतिलेखन वर्ष - वि.सं. १९०७ रा मिती चैत्र वदि ११ दिने प्रत लखायानो उल्लेख छे. प्रतिलेखन स्थल- ग्राम राहसर मध्ये. प्रत परिचय - प्रत नं. ३७३३९. जे संपूर्ण छे, प्रतमां बे कृतिओनुं आलेखन थयेल छे. प्रतनुं माप - २६x१२ से.मी. छे. कुल पत्र संख्या२, प्रति पृष्ठ पंक्ति संख्या १०, प्रति पंक्ति अक्षर लगभग ३० छे, अक्षर साधारण सारा छे. २ प्रत नं. २८५५३ पत्रांक नं - १A संवत् १६८३ वर्षे पातशाह शिहायान राज बिठा तिहार पछी मुलतान वासी ठाकुर बुलाकीना मुखी शांभली दूरदेशांतरथी आव्या तिहूणे वार्त्ता लखावी : १. श्री अहमदावादथी ३२५ कोसे आगरो तिहांथी २. ३०० कोसे लाहोर तिहांथी ३. १५० कोसे मुलतांन तिहांथी ४. ३०० कोसे खंधार तिहांथी ५. ९०० कोसे इसपांनगर तिहां तिलंगी पातसाह राज्य करें हैं तिहांथी ६. ७०० कोसे सांमनगर तिहांथी ७. ८०० कोसे सासतानगर ते नगर बार कोसनें विस्तारें हैं तिहांथी ८. ६०० कोसे खुरासाणनगर ते कोस १५ नें विस्तारें नगर छै: ते नगरनो बिजार ४८ कोस प्रमांण विस्तारें हैं तिहां रोमी पातसाह राज्य करें छै ते छ मासि बाहर निकलै छें ते पातसाहनें २४००००० कटक छै: ३००००० लुंडा' छै लोहना कोठानो कोट छै: तिहांथी ९. ५०० कोसे बबरकोट छै देश छैः तिहां मनुष्य रूधीरस्यूं हीर रंगें छैं तिहांथी तारातंबोलनगर छै तिहां सूरचंदराजा राज्य करें छै ते नगर ४० कोसनें विस्तारे छै : तिहां पश्चिम समुद्र कोंठो` ढुकडो' छै तिहां जिनधर्म छई प्रसाद पौषधशाला स्तुभादिक जैनमंडित पृथ्वी छै साधु१ साध्वी२ श्रावक३ श्राविका४ छै तिहां जैनधर्म घणो हैं १. गुलाम, २. किनारो, ३. नजीक. For Private and Personal Use Only Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 14 SHRUTSAGAR SEPTEMBER-2014 तत्रोदयप्रभसुरि(उदयप्रभसूरि) नामा आचार्य , :तत्र सर्व जैनमय छ : पठे तो परमेश्वर जाणे : वर्ष १० नो भोजक गयो हतो ते वर्ष ८० थयां दूर देशांतर फरतां-फरतां वृध थयो वर्ष ९० नो त्यारे इहां आवी सर्व वार्ता लखावी ते सही छै : प्रतिलेखन पुष्पिका:-संवत १७८५नावर्षेमाहशुदि ९ दिने वार भृगुई(शुक्रवार) लख्यू , आगलोड मधे शुभं भवतुः प्रतिलेखक परिचय-प्रतिलेखक विद्वाननुं नाम उपलब्ध नथी. प्रतिलेखन वर्षवि.सं.१७८५ ना वर्षे माह शुदि ९ दिने वार भृगुईं (शुक्रवार) दिने प्रत लखायानो उल्लेख छे. प्रतिलेखन स्थल-आगलोड मध्ये. प्रत परिचय-प्रत नं. २८५५३ जे संपूर्ण छे, प्रतमां लण कृतिओनु संकलन थयेल छे. प्रतनुं माप-२१४१२ से.मी. छे. कुल पत्र संख्या-१, पंक्ति संख्या १७, प्रति पंक्ति अक्षर लगभग ३२ छे, अक्षर सारा-वाच्य छे. प्रत नं.९९० पेज-१A १. लाहोरथी गाऊ १५० मुलतान तिहांथी २. गाउ ३०० खंधार तिहाथी ३. गाउ ९०० इसपन्न तिहां तिलंगी पातिसाह राज्य करै छइं तिहाथी ४. गाउ ७०० सामनगर तिहांथी ५. गाउ ८०० सताननगर बारकोस को नगर तिहाथी ६. गाउ ६०० खुरासाण कोस पनर को नगर तिहाथी ७. गाउ २०० ईसतंबोल बहोतर ७२ कोस को नगर ४८ कोस को बाजार रोमी पातिसाह राज्य करै छई छ? महिने बाहिर नीकलै छै चोवीस लाख २४ कटक त्रिणलाख गुलाम ३ लोहनो कोट तिहाथी ८. गाउ ५०० बबरकोट जिहां हीर थाइं छै तिहांथी। ९. गाउ ७०० तारातांबनगर राजा सूरचंद राज्य करै छई ४० कोस को नगर तांबा को कोट छै २४ कोस को बाजार सुवर्ण मै देहरा रत्ननी प्रतिमा छइं तिहां जैनधर्म छई ते सही ए वात क्षत्री बुलाखीदास मुलताननो वासी ते जई आव्यो तेणें कह्यों ते लिख्यु छै सही तिहाथी आगै समुद्र नजीक छै लाहोरथी साढाछप्पनसें गाउ जईई तिवारै जैनधर्म पांमीई ते सही करी मानज्योजी इति संपूर्ण. छः छः..... मूल प्रतना प्रतिलेखकनो परिचय-नाम-गणि श्री ईसरविमल छे. तेओश्रीना For Private and Personal Use Only Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर सितम्बर-२०१४ स्वहस्ते लखायेल अन्य बे प्रतो पण ज्ञानमंदिरमा उपलब्ध छे. जेना नं. १३७८ तथा १३५२७ छे. आ बन्ने पण सं. १७६२मां लखायेल छे. तेमां प्रस्तुत प्रत तथा १३७८ बन्ने प्रत व्रघ्नपुरमां बे-त्रण दिवसना अंतरे लखायेल छे. अपभ्रंश ईसरविमलनी साथे अन्य प्रतमां शुद्ध नाम ईश्वरविमल पण मळे छे. प्रतिलेखन वर्ष-वि.सं.१७६२ पोस सुदि पंचमी तिथौ रविवासरे. प्रतिलेखन स्थल-व्रघ्नपुर. प्रत परिचय-प्रत नं.९९० जे संपूर्ण छे, प्रतमां कुल-४ कृतिओनुं संकलन थयेल छे. आ कति पाछलथी लखायेल छे. प्रतनुं माप-२५४१२ से.मी. छे. कुल पत्र संख्या-२७, अक्षर वाच्य छे. प्रत नं.२८२८२ पेज-३B-४A || संवत १६८४ वर्षे महा सुदि १३ भौमें ॥ पातस्याह साह जिहान राज्ये बेठां ते पाछलि वार्ता छइः। मुलताननो वासी जाते षीत्री नामे ठाकुर बलाखी ते दुर देसांतर देखी आव्यो तणे जें वात कही ते लखीइं छइः ॥ १. प्रथम गुजरात मध्ये श्री अहम्मदावादथी ३०० कोस आगरो छे तेहथी २. ३०० कोस लाहोर तेहथी ३. १५० कोस मुलतान तेहथी ४. ३०० कोस खंधारि तिहाथी ५. ९०० कोस ईसपन्ननगर छे. तिहां तिलंग पातस्याह राज्य करे छे. तेहनो बाजार १२ कोसनो लांबो छ तेहथी ६. ६०० कोस खुरसाण छे तेह बाजार १५ कोसनो लांबो छ तेहथी ७. १२०० कोस अस्तंतंबोल नगर छे ते नगर ३६ कोसनो लांबो छे २४ कोसनो चोडो छे तेहनो २४ कोसनो बाजार लांबो छे तिहा रुमि पातस्याह राज्य करे छइः ते छठे मासे बाहिर निकले छे ते पातस्याहनें २४ लाख घोडा छे १२। लाख हाथी छे ३ लाख गुलाम छे ५ लाख बांदी छे एक कोडि २५ लाख पायदल छे. नगरने आसपास चोकफेर लोहनो कोट छे पातस्याही कोट लांबानो छे तेहथी ८.५०० कोस बबर देस छे तिहां सपेत हीर माणसनें रुधीरें रंगाय छे देस मोटो छ ५०० कोसनो लांबो , तेहथी ९. ७०० कोस तारातबोल नगर छे वैताढ्यना विद्याधरनो वासो छ तिहां For Private and Personal Use Only Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 16 SHRUTSAGAR SEPTEMBER-2014 राजाधिराज राजा महाराजा श्री सुरचंद राज्य विद्यमान करे , ते नगर ४६ कोस(से?) लांबो छे ३६ कोसनो चोडो छे ४८ कोसनो बाजार लांबो छइ नगरने आसपास चोकफेर कोट लांबानो छे. (राजाने?) आसपास कोट अष्टधातुनो छः तिहा राजा जैन धर्म पाले छ तिहां सर्व (जैन देहरा ज छे सर्वविद?) भाषित धर्म छई तिहां जैनना देहरा ७०० सिखरबंध छइं पंक्तिबद्ध बाजार मैं बेहु तरफ छे (ते नगरने मध्य?) मोटो चोक छे. ते चोकनें मध्ये श्री आदिनाथजीनो देहरो छे. बे २ कोसनो विस्तारे छे ते देहरानि (पीठीका सोनानी छे.?) उपरि काम रुपानो छइ थंभा सोनाना छइ: प्रतिमा सोनानि छइ: प्रतिमा काउसग्गे छे प्रतिमा एकसो आठ धनुषनी छइ: उची छइ: बिंदी सोनानि छइ: सिहासन जडावनो छे देहराने आसपास ७२ चैत्यालय छे तेल पुजा थइ छइ: (ए)ह मांहि तिन चोवीसीनी प्रतिमा छे तिहां त्रिकाल पुजा थाइ छे माहामुनिश्वर दिगंतर सदा सर्वदा विराजमान छइ: राजा नित्य प्रेते देहरें आवी जिनवाणी सांभलें देहरे जई नाही पुजा करि मुनिश्वरने आहार दान देईने जीमे छइ: तिहा एक जैन धर्मनो महिमा छे बिजा (लिंग नहीं?) छे ए रीतें सदा जैनधर्म विद्यमान छे तारातंबोल नगरने आसपास मोटी नदि सिधु वहे छे ते नदिनो मोटो विस्तार , ए वार्ता मुलतांननो वासी ठाकुर बूलाखीइं वात कहि ते लखी छे अम्मदावादथी तारातंबोलनो ठीक कीधो त्यारें ५६०० कोस जमी छइ: ए कागल आगराथी लख्यो आव्यौ ते देखीने लखो छइ: ति पूर्वे बीजें पण लोकें ए वातनी साखि भरी उदेपुरनो वासी हुबडज्ञातीय कालुया राघवदास काबिल गयो हतो तेणे पण वार्ता सांभलि हिति: इति वार्ता संपूण्ण. प्रतिलेखक परिचय-प्रतिलेखक विद्वाननुं नाम उपलब्ध नथी. प्रतिलेखन वर्षविक्रम १९मी अनुमानित. प्रतिलेखन स्थल-उपलब्ध नथी. प्रत परिचय-प्रत नं. २८२८२ जे संपूर्ण छे, प्रतमां ९ कृतिओनुं संकलन थयेल छे. प्रतनुं माप-२८.५४१४ से.मी. छे. कुल पत्र संख्या-७, पंक्ति संख्या १९-२०, प्रति पंक्ति अक्षर लगभग ३७-४२ छे, प्रत दशा-पाणीथी विवर्ण छे अने अक्षरोनी स्याही फेलाई गयेल छे. तेथी केटलाक शब्दो दुर्वाच्य छे. वास्तविकतानी नजदीक पहोंचवानो पूरतो प्रयास कर्यो छे. न उकेलायेला अक्षरो-वाक्योने ब्रेकेटमा प्रश्नार्थ साथे मूकेल छे. जे योग्य करी वांचवा भलामण. ___ उपरोक्त लेखो वाळी प्रतो कोबा-आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिरमां सुरक्षित छे. उपरोक्त लेखो जे ऐतिहासक छे अने संशोधन-संपादन करता विद्वानोने खुब ज उपयोगी माहिती पुरी पाडवामां सहायभूत थशे ए आशयथी अहिं प्रगट कर्या छे. लेखो प्रायः अप्रकाशित होवा संभव छे. For Private and Personal Use Only Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra श्रुतसागर www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 17 तारा तंबोलनी चिट्ठी एक नगरनुं दंतकथा जेवुं वर्णन आपतो एक प्राचीन पत्र सितम्बर २०१४ संग्राहक - मुनिराज श्री कांतिसागरजी “स्वस्ति श्रीगाम अमदावाद महासुभस्थानके पूज्य राधे श्री५ श्री अनेक सर्वे ओपमा लायक तीरथरूप भाई रतनचंद, एतान श्री हेदराबादथी लिखी भाई पदमसीनो प्रणाम वांचसोजी, अमो अमारा कुटुंब सहित दूर देशांतरनी यात्रा करवा सारू सं.१८०५ की सालमां गयेल तेनी हकीकत प्रथम श्री अमदावादथी कोस ४८०० श्रीतारातंबोल शहर छे तेनी विगत संभलावे छे. १. प्रथम श्री अमदावादथी कोस ३०० आगरा शहर छे. २. तेहां थकी कोस ३०० श्री लाहोर शहर छे, ३. त्यों थकी कोस १५० श्री मूलतान शहर छे, ४. त्यां थकी कोस ३५० बंदर शहर छे, ५. त्यां थकी कोस ९०० श्री आसापुरी नगरी छे तेना बाजार कोस १२ ना छे, ६. त्यां थकी कोस ७०० गया एटले श्री तारातंबोल शहर छे, तेनी हकीकत संभलावे छे. श्रीमुकुटस्वामीनी मुरती छे, ते मुरती पबासण उपर बीने' आधारे छे, ते मुकुटस्वामीनी मुरती चोडी हाथ २८नी छे, तेनो उंचपणो हाथ ३८नो छे, तेना पगना अंगोठा उपर श्रीफल नंग २८ रहे छे, तेनी जात्रा करीने हमें आगल चाल्या ते ७. तेहां थकी कोस ६०० गया एटले तलाव नग १ मोटो आवे छे तेनी वचेवच श्री अजितनाथजीनो देवरो छे, तेहां अमे नावडामें बेसीने दरसण करवा गया हता त्यां श्री अजितनाथजीनी प्रतिमा चोडी हाथ ६नी छे. तेनो उंचपणो हाथ १०नो छे, तेनी जात्राने हमो आगल चाल्या. ८. त्यां थकी कोस ५०० गयां तेयां तलंगपुर नग्र आवे छे, ते नग्र कोस ५० नो छे. तेहां जीन परसादना देहरा नग २८ छे. तेहांथी आगल चाल्या के श्री चंदाप्रभुजीनुं देवरो मोटो छे. तिहां देरासरजी मध्ये श्रीजिनप्रतिमा नग १२८ छे, तेना दरसण करीने हमां आगल चाल्या. For Private and Personal Use Only ९. त्यारे कोस ७०० गया के श्री नवापुरी पाटणनामे सेहेर छे. १०. तेनी आगल कोस ३०० गया एटले बीजु तारातंबोल शहर घणो ज मोटो छे १. वगर Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR SEPTEMBER-2014 ते जोवा लायक छे. ते नगरनो कोट कोस ४००नो छे. ते नग्रनो कोट तांबानो छे त्यांना राजानो मेल सपेत धातुनो छे. राजानो नाम धीरसेन माराजा छे. ते वरधमान राज करे छे. त्यां वेपारी लोको हीरा-मोती-माणक-जवार-सोनो-रूपो-रतन सरव वेचे छे, ने सरव आप अपना हाट उघाडा मुकीने सर्वे सरवना घर जाय छे, पण कोइ कोइनी चीज लेवा पामतो नथी. एवा सर्वे लोको मोटा धरमी छे. ते नग्रनो बाजार कोस ६० नो छे. ते नग्र मध्ये श्री जैन परसादना देहरा नग ७०० छे त्याना राजा परजा सरवे जेनधरमी छे. ते जेन वीना बीजा कोइ देवने मानतो नथी. ते प्रतमानी गणती निचे लीखी छे. श्री जेन प्रतिमा १५००० पासाणनी छे, ने ४००० लीला माणकनी छे. तेमां ३४८६ प्रतमायो धातुनी छे. ११९० प्रतमायो एक सरवणी रत्ननी छे. १६ प्रतमायो बावना चंदननी छे, ने ११ प्रतमायो गोरुचंदननी छे, ने ९ प्रतमायो माणकनी आंगली १ प्रमाण छे, ने ५४५ प्रतमायो लाल रत्ननी छे. ने ४८७ प्रतमायो काला रत्ननी छे, ने १ प्रतमा सांचा मोतीनी छे, ने ४ प्रतमायो लाल रत्ननी आंगली १ प्रमाण छे, ने ४ प्रतमायो हीरानी छे, ने ५ प्रतमायो लसणीयानी छे आंगली १ प्रमाण छे. सर्व मिली एकंदर प्रतमा २४७६४ छे. त्यांना राजानो चोक छे ने चोक मध्ये श्रीरीखवदेवजीनो देहरो छे. तेनो उंचपणो कोस ४नो छे. त्यां एक एक दीसायो मंडप नग ९ छे. च्यार दियां मिली मंडप नग ३६ छे ने जिन परसादनो कोट तांबानो छे ने ते कोटना थंभा रूपाना छे. तेने बीजा थांभा सोनाना गंभाराना छे तथा परसाद संघासन सोनाना छे, तथा जडावना छे, संघासण उपर प्रतमायो नग ३ चोविसीनी छे. ते प्रतमायोनो वरन आपआपोना जुदा जुदा रंगनी छे, ते पण सपेत तथा लीलो तथा कालो एवा रंग आपआपना वरण छे. त्यांनो राजा दिन प्रते निकली पूजा करे छे. ते राजा बहुगुणी छे, तथा जैनधरमी छे. तथा समतावान छे, तथा सीयलवान छ, जसवंत छे, गुणवंत छे, विनेवंत छे सर्वे गुणकरी वीराजमान छे, ते नग्रमध्ये अमो दीवस ४२ रहा हुंता, ने बीजा पण देहरा घणा सारा छे, ते देराना मध्ये प्रतमायो सुवरणनी छे तथा जडावनी छे, गणती नग १३२ छे, तेहां बिजी प्रतमायो नग १०५ छे ते फटकरतननी छे. ते प्रतमायोना दरसन कर्या छे. ते नग्र मध्ये श्रावक महाकुटंबी छे. तथा महाधरमी छे, तप जप मध्ये सरवे पुरण छे. ते देहराना भंडार मध्ये द्रव्य क्रोड ९० नीवेनो छे. ते देहराना भंडार मध्ये जवला गवला तथा बीजा गवलाना ग्रंथ छे, ते ग्रंथोना सलोक १०४००० छे. ते बीजा For Private and Personal Use Only Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 19 श्रुतसागर सितम्बर-२०१४ ग्रंथोना सिलोक १०८००० छे, ते ताडपत्र पर लीखेला छे, तेने कोइ पण पंडीत वांची सकता नथी, ते नग्रना वनमध्ये श्रीशांतिनाथजीनो देहरो छे, ते नग्र मध्ये सांफ बीर्छ वाघनो भय घणो छे, ते त्यांथी आगल चाल्या के तेयां श्री रखवदेवजी तथा नेमजी नाम साधुजी रहे छे ते मुनी उमर वरस ९०नी अमो गया त्यारे हुंती, ते सांज उपरे (पहेलां) आहार लेवा निकले छे ते सुझता आहार मिले तो लेवे नहीतर लेवे नही. ते साधुजीना दरसन थयां छे, तयां थकी कोस ६५ गया एटले गंगानग्र छे, ते ननना वन मध्ये श्रीरीखवदेवजीनो देहरो छे, तेमां श्री प्रभाचंद्रजी नाम साधु रहे छे, ते मास १ मध्ये बे वार पारणो करे छे. ते जोगवाईनो आहार मिले तो लेणो नही तो बीजे मासे वात गइ, एवा मुनीराजना दरसण थाय छे. त्यांथी आगल चालवानो करता हता के एटले साधुजी अमोने कहो के आगल जासो नही. साथी ने येहांथी कोस ३०० गया एटले पछे एक टांग्नो मुलक आवे छे. एवी हकीकत अमाने श्रीपरभावचंद्रजीये कही एटले अमो सं. १८२१थी सालमां सर्वे जालायो करी १६ वरसे कुसलक्षेम घरे आवीया छां. एवा अमाना मोक्षगामीना दरसन थया छे. ए कागल संपूर्ण लिख्यो छे. नोंध-उपरना पत्रनी नकल मारी पासे जुनीभाषामां तेमज बाळबोध लिपिमां लखेली छे. अने ते लगभग १०० वरसनी लखेली लागे छे. ___ आ पत्र मां जे जे विगतो आपी छे ते बधी बहु विचारणीय छे. एक ठेकाणे श्रीऋषभदेव भगवाननो प्रासाद ४ कोस उंचो होवा- लख्यु छे. आथी कोसनो शु निश्चित अर्थ करवो ए समजातुं नथी. ऐतिहासिक दृष्टिए पण आनु शुं मूल्य होइ शके ए जोवानु रहे छे. छतां आ पत्र भाषानी दृष्टिए के एवी बीजी कोइ दृष्टिए विद्वानोने उपयोगी थइ पडशे एम लागवाथी अहीं छाप्यो छे. एनी सत्यासत्य हकीकत उपर वाचक वर्ग विचार करे अने इतिहासना अभ्यासीओ ए संबंधी कंइ खूलाशो बहार पाडे एवी आशा छे. (जैन सत्यप्रकाश वर्ष-४ अंक-३) ___ आ अंकना आ पत्रनी फूटनोंटमां तीर्थमाळामां तारातंबोलनी सविस्तर माहिती होवानो उल्लेख कर्यो छे. तारातंबोलविषयक उल्लेख ___ संग्राहक-श्रीयुत् सागरमलजी कोठारी कुछ मास पूर्व 'श्री जैन सत्य प्रकाश में तारातंबोलनगर विषयक पत्र प्रगट हुए थे। उस समय कहा गया था कि अगर अन्य किसी ग्रंथ में इस घटना से सम्बन्धित साहित्य हो तो प्रकाश में लाया जावें ताकि इस सम्बन्ध की ऐतिहासिक खोज की For Private and Personal Use Only Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 20 SEPTEMBER-2014 जाय। इस पर से एक यति जी द्वारा अपने संग्रह ग्रंथ में- जिसमें उन्होंने विहारी सतसई, कोकशास्त्र, कविता, वैद्यक शास्त्र, ज्योतिष, मंत्र, तंत्र, आदि अनेक विषयों के साथ कई ऐतिहासिक बातों का भी उल्लेख किया उसी हस्तलिखित नोंध कोपी को देखते हुवे मुझे यह प्रवास वर्णन मिला जो कि उपरोक्त लेख सदृश होने से प्रकाशनार्थ भेजा है। उक्त कोपी १७वीं शताब्दी की होने का अंदाज किया जाता है, पत्र इस प्रकार है “संवत् १६८६ वर्षे पातिसाह साहिज्यां राज्य करै तिवारै वार्ता छे मुलताण वासी, जाति खत्री, नाम ठाकुर विलायत, दूर देशांतरथी आयो ते वार्ता कहे। गुजरात देश मध्ये अहमदाबाद नगरथी ३२५ आगरा, तेहथी ३०० कोस लाहोर, तिहांथी १५० मुलताण, तिहांथी ३०० खंधार, तिहांथी ७०० सांम नगर छे, तिहांथी ८०० सासता नगर बार कोस ने विस्तार छे, तिहांथी ६०० खुरसानसेहर १५ कोस विस्तार छे, तिहांथी १२०० तारातंबोल नगर छे ते ७२ कोस विस्तार छे नगरनो बाजार ४८ कोसने विस्तार छे, तिहां रोमी पातिसाह राज्य करे छे, ते छ मासे बारणै आवै ते पातिसाहरै २४ लाख कटक छे, तेहने ३ लाख लूंडा लूंडी छै लोहनो कोट सहिर दोलो छै । तिहांथी ५०० कोस बबर देश छै तिहां हिर रंगाई, तिहां सूरचंद राज्य करै ते नगर ४० कोसने विस्तारे छे, तिहां समुद्रनो कांठो छे, जैनधर्म छे अद्भुत प्रासाद पोसाल अनेक छे।” इति... (जैन सत्य प्रकाश वर्ष - ६ अंक- ६) नोंध-उपरोक्त छ लेखोमां आवेला स्थान- अंतर दर्शावतो कोठो नीचे मुजब आपवामां आव्यो छे. तेमां चार लेखोमां अमदावादथी अने प्रत नं. ९९० मां लाहोरथी आम जुदा-जुदा रूटमां शहेरो तथा अंतर दर्शावेल छे, शहेरोनो क्रम पण बदलायेलो छे, प्रतोमा जे प्राचीन नगरीओना नामो आवेला छे ते वर्तमानमां कया नामे ओळखाय छे, क्यां आवेल छे तेनी विगतो उपलब्ध नथी तेम ज प्रतोमां नगरीओना अंतर कोष अने गाउ लखेल छे तेनुं शुं माप समजवुं ते पण शोध-संशोधननो विषय छे, जेनी सुज्ञ वांचको नोंध लेवी. आ नगरी विशे अन्य पण हकीकतो कोईना ध्यानमां होय तो जणाववा विनंती. For Private and Personal Use Only Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रत नं.२८२८२ गाम, शहेर-अंतर-कोस जै.स.प्र. वर्ष-४ अंक-३ गाम,शहेर-अंतर-कोस गुजरात-श्रीअहमदावादथी जै.स.प्र. वर्ष-६ अंक-६ ___ गाम,शहेर-अंतर-कोस श्रुतसागर Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra गुजरात-श्रीअहमदावादधी प्रत नं.३७३३९ प्रत न.२८५५३ । प्रत नं.९९० गाम,शहेर-अंतर-कोस | गाम, शहेर-अंतर-कोस अंतर-गाउ | गुजरात- श्रीअहमदावादथी | गुजरात-श्रीअहमदावादथी | लाहोरथी ३२५-आगरा ३००-मुलतान ३००-लाहोर १५०-लाहोरA १५०-मुलतान १५०-मुलतान ३००- खंधार ३००-खंधार ३००-खंधार ९००-इसफानगर ९००-इसपानगर ९००-इसपन्न ३००-आगरा ३००-आगरा ३००-लाहोर ३२५-आगरा ३००-लाहोर १५०-मुलतान ३००-लाहोर १५०-मुलतान ३००-खंधारि ९००-ईसपन्ननगर ३००-खंधार १५०-मूलतान ३५०-बंदर* ९००-आसापुरी नगरी# ७००-तारातंबोल# ७००-सामनगर ७००-सामनगर ७००-सांमनगर ८००-सासतानगर ८००-सताननगर ६००-तळाव ८००-सासतानगर For Private and Personal Use Only 21 www.kobatirth.org ६००-खुरासान ६००-सुरासाणनगर ६००-खुरसानसेहर ६००-खुरासाण २००-ईसतंबोल ५००-बबरकोट ५००-तलंगपुर ७००-नवापुरी पाटण# १२००-इसफ तंबोलनगर १४००-वब्बरदेश |६००-खुरसाण | १२००-अस्तंतेबोल ५००-बबर देश ७००-तारातंबोल ५००-बबरकोट ५०-आकलनगर ?- तारातंबोल ७००-तारातबोल ७००- तारातंबोल १२००-तारातबोल | ३००बीजु तारातबोल अमदावादथी तारार्तबोल-४८०० कोस. सितम्बर-२०१४ Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir नोंध-* बंदर ए खंधार होइ शके छे. # आ नामो अन्य कोइ साथे मेळ खाता नथी. A प्रत नं. ३७३३९ मा अन्य प्रतोनी सरखामणीमां अहमदाबाद पछी मुलतान पहेला आवे छे अने लाहोर ए पछी आवे छे एम लख्यु छे. Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ग्रन्थसूची प्रोग्राम में कृति-वंशपरिचय रामप्रकाश झा कृति का परिचय : कृति शब्द का अर्थ है “किया गया, रचा गया अथवा निर्माण किया गया". आचार्यश्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर में किसी व्यक्ति के द्वारा गद्य, पद्य अथवा मिश्रित (गद्य पद्य संयुक्त) रूप में किसी खास विषय को लेकर की गई शब्दबद्ध रचना को कृति कहा जाता है. ___ यदि स्वतंत्र रूप से किसी विषय का प्रतिपादन किया जाता है तो उसे मूल कृति कहते हैं. जैसे- प्रत्येकबुद्ध द्वारा रचित 'उत्तराध्ययनसूत्र' मूल कृति है. यदि मूल कृति के ऊपर अनुवाद, टीका, भाष्य, टबार्थ, बालावबोध आदि किसी भी रूप में कृति की रचना की जाती है, तो उसे मूल कृति की 'संततिरूप' कृति कही जाती है. पुत्रपौत्रादिरूप वह कृति उस मूल कृति परिवार के सदस्य के रूप में जानी जाती है. आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमन्दिर की अनोखी सूचीकरण प्रणाली व तदनुरूप विशेष रूप से बने लायब्रेरी प्रोग्राम में मूल कृति का स्तर 'A' निर्धारित किया गया है तथा उसके पुत्र-पौत्रादि रूप कृतियों का क्रमशः B, C, D, E, F... आदि स्तर निर्धारित किया गया है. प्रायः सभी ग्रन्थालयों में पुस्तक के ऊपर छपे हुए नाम से अथवा लेखक या सम्पादक आदि के नाम से पुस्तकें ढूँढ़कर वाचकों को दी जाती हैं. परन्तु आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमन्दिर की यह विशिष्टता है कि यहाँ विद्वानों, संशोधकों तथा सम्पादकों की सुविधा हेतु पुस्तक नाम के आधार पर, कृति के आधार पर, विद्वान तथा कृति रचना वर्ष के आधार पर, यहाँ तक कि कृति के प्रारम्भिक व अन्तिम पाठ के आधार पर भी हस्तप्रत, पुस्तक आदि की शोध की जाती है. पुस्तक के ऊपर छपे हुए नाम को प्रकाशन नाम, हस्तप्रत के ऊपर प्रतिलेखक के द्वारा लिखे गए नाम को हस्तप्रत नाम तथा कर्ता के द्वारा दिए गए नाम को कृति नाम कहा जाता है. इस ज्ञानमन्दिर में उपलब्ध प्रत्येक कृति का मुख्य नाम, प्रचलित नाम, कर्तानाम, भाषा, स्वरूप, प्रकार, कृति परिमाण, आदि-अन्तिमवाक्य, रचनास्थल, रचनाकाल, (वर्ष, मास, पक्ष, दिन आदि) रचना प्रशस्ति के अन्तर्गत प्राप्त विशिष्ट घटमाओं, राजादि का वर्णन, संघयात्रा आदि का वर्णन, गुरुपरंपरादि की सूचना तथा वह कृति For Private and Personal Use Only Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir सितम्बर-२०१४ श्रुतसागर 23 जिस प्रकाशन, हस्तप्रत अथवा अंक में मिलती हो, उसकी सूचना वाचकों को उपलब्ध करायी जाती है. कृति का स्वरूप एवं उसकी रचनाशैली : किसी भी परंपरागत भारतीय कृति के प्रारम्भ में प्रायः मंगलाचरण होता है. मंगलाचरण में सामान्यतः कर्ता अपने इष्टदेव अथवा गुरु का स्मरण या उनके गुणों का संकीर्तन करता है. कोई कृति सर्ग, अध्याय, अध्ययन, परिच्छेद आदि परिमाणों में विभक्त उपविभक्त होती हैं, तो कोई सम्पूर्ण अविभाजित कृति होती है. कुछ पद्यबद्ध कृतियों में श्लोकों, गाथाओं या सूत्रों का एक निश्चित अनुक्रम होता है, जो कृति के प्रारम्भ से अंत तक एक समान चलता है, जबकि कुछ कृतियों में प्रत्येक सर्ग, अध्याय आदि के बाद यह क्रम बदल जाता है अर्थात् पुनः एक से प्रारम्भ होता है. जबकि गद्यबद्ध कृतियों में श्लोक, गाथादि नहीं होते, मात्र सर्ग, अध्याय, अध्ययन आदि होते हैं. कभी-कभी कृति के अध्याय / अध्ययन आदि के अपने स्वतन्त्र नाम भी होते हैं. उदाहरण के लिए - दशवैकालिकसूत्र के प्रथम अध्ययन का नाम द्रुमपुष्पिका अध्ययन है, द्वितीय अध्ययन का नाम श्रामण्यपूर्विक अध्ययन है. परन्तु तत्त्वार्थाधिगमसूत्र में प्रथम अध्याय, द्वितीय अध्याय आदि है, किसी भी अध्याय का कोई नाम नहीं है. कृति की रचनाशैली अनेक प्रकार की होती है, जैसे- महाकाव्य, नाटक, सूल, चंपू, सट्टक, स्तोत्र, स्तव, रास, ढाल, चौपाई, छंद, सज्झाय, स्तवन, स्तुति, चैत्यवंदन, पद, धवल, झूलणा, झीलणा, हरियाली इत्यादि. इसप्रकार की रचनाशैली प्रायः मूल कृति में पाई जाती है, जो टीकादि स्वरूप से भिन्न होती है. कृति के अन्त में प्रायः रचना प्रशस्ति हुआ करती है. कभी-कभी कृति के प्रत्येक अध्याय आदि के अन्त में भी रचना प्रशस्ति होती है, जिसके अन्तर्गत कर्त्ता का विस्तृत परिचय, उसकी गुरु-परंपरादि का परिचय, कृति का रचनास्थल, रचनावर्ष आदि का उल्लेख होता है. कभी-कभी कृति के प्रारंभ में भी कर्ता द्वारा अपने वंश, गुरु आदि का परिचय प्रस्तुत् किया जाता है. आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमन्दिर के लायब्रेरी प्रोग्राम की विशिष्टता : यहाँ के कम्प्युटरीकृत लाइब्रेरी प्रोग्राम की विशिष्टता यह है कि यहाँ आनेवाले विद्वानों, संशोधकों तथा वाचकों को इसके माध्यम से किसी भी कृति की सम्पूर्ण For Private and Personal Use Only Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir 24 SHRUTSAGAR SEPTEMBER-2014 जानकारी कुछ ही क्षणों में प्राप्त हो जाती है. यदि किसी वाचक को उत्तराध्ययनसूत्र के ऊपर रचित सभी टीकाओं के विषय में जानकारी प्राप्त करनी हो तो लायब्रेरी प्रोग्राम की कृति माहिती में उत्तराध्ययनसूत्र+टीका टाईप करके शोध करने से उसकी टीकारूप सभी पुत्र कृतियों की सूची देखने को मिलती है. उस सूची में वांछित टीका के विषय में विस्तृत जानकारी, जैसे-उसकी भाषा, उसके कर्ता, कर्ता की गुरुपरम्परा, उस कृति का आदिवाक्य, अन्तिमवाक्य, उसके परिमाण, उसका रचना वर्ष; इसके अतिरिक्त वह कृति कहाँ से प्रकाशित हुई है?, उसके अतिरिक्त वह कृति किस पुस्तक अथवा सामायिक के किस अंक के कौन से पृष्ठ पर प्रकाशित है? यदि वह कृति अप्रकाशित है तो कौन से हस्तप्रत के किस पृष्ठ पर उपलब्ध है? इस प्रकार की सारी जानकारियाँ कुछ ही क्षणों में प्राप्त हो सकती है. ___ इस सुविधा से वाचक को उनके अभ्यास हेतु वांछित कृति से सम्बन्धित प्रकाशन, मैगजिन व हस्तप्रत अतिशीघ्र प्राप्त हो सकते हैं, अपने बचे हुए समय का सदुपयोग वे उनके द्वारा किये जानेवाले अध्ययन, अनुवाद, संशोधन, सम्पादन आदि कार्यों में कर सकते हैं, जिससे उनके कार्य में गति मिलती है. ___ यदि वाचक को कृति का नाम, कर्ता का नाम आदि कुछ भी याद न हो, मात्र कृति का कुछ प्रारंभिक अंश ही याद हो, तो उसके आधार पर भी कृति की शोध की जा सकती है. जैसे - वाचक को यदि संजोगा विप्पमुक्कस्स अणगारस्स' इतना ही याद हो तो इसके आधार पर उन सभी कृतियों की सूची देखी जा सकती है, जिनका प्रारम्भ उपर्युक्त वाक्य से होता हो, इस प्रकार वाचक को इस आदिवाक्य से प्रारम्भ होनेवाले उत्तराध्ययनसूत्र मूल कृति तथा उस कृति से जुड़े प्रकाशनों, हस्तप्रतों तथा अंकों के विषय में शीघ्र ही जानकारी प्राप्त हो सकती है. यदि वाचक को उत्तराध्ययनसूत्र के ऊपर भावविजयजी के द्वारा रचित अधिरोहिणी वृत्ति चाहिए तो कृति नाम के बॉक्स में उत्तराध्ययन तथा विद्वान नाम के बॉक्स में भावविजय टाईप कर शोध करने से उपर्युक्त वृत्ति क्षणमात्र में मिल जाती है. इस प्रकार ज्ञानमन्दिर का यह लायब्रेरी प्रोग्राम वाचकों तथा संशोधकों के लिए एक कल्पवृक्ष के समान है, जिसकी सहायता से उनका अध्ययन, संशोधन आदि कार्य हेतु अत्यल्प समय में अधिकाधिक सूचनाएँ प्राप्त हो सकती है. यदि वाचक को किसी विद्वान के द्वारा संशोधित अथवा सम्पादित प्रकाशनों में से कोई प्रकाशन चाहिए तो प्रकाशन नाम में पुस्तक का नाम तथा विद्वान नाम में उस विद्वान का नाम देकर शोध For Private and Personal Use Only Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org श्रुतसागर 25 करने से उपर्युक्त सूचनाएँ तुरन्त प्राप्त हो सकती है. Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir सितम्बर-२०१४ यदि किसीको आचार्य सिद्धसेनदिवाकरसूरिजी द्वारा रचित द्वात्रिंशद्वात्रिंशिका के ऊपर आचार्य लावण्यसूरि द्वारा रचित किरणावली वृत्ति चाहिए तो कृति नाम में 'द्वात्रिंशिका' टाईप कर यह शब्द नाम में 'कहीं भी आया हो, ऐसा विकल्प चयन करते हैं और विद्वान नाम में लावण्यसूरि टाईप कर शोध करते हैं, तो ऐसी सभी कृतियों की सूची कम्प्यूटर स्क्रीन पर आ जाती है. जिसके नाम में आगे, पीछे या बीच में, कहीं भी 'द्वात्रिंशिका' शब्द आया हो. उस सूची में कर्सर को ऊपर-नीचे ले जाने से द्वात्रिंशद्वात्रिंशिका नामक कृति मिल जाती है. उसके ऊपर कर्सर रखकर उसके सामने विद्वान के कोष्ठक में जहाँ भी लावण्यसूरि का नाम मिले, तो वह कृति अवश्य ही द्वात्रिंशद्वात्रिंशिका की किरणावली वृत्ति ही होगी. उस कृति से जुड़े हुए प्रकाशनों, हस्तप्रतों तथा अंकों की सूचनाएँ व जिस पृष्ठ पर वह कृति उपलब्ध हो, उसकी जानकारी भी प्राप्त की जा सकती है. ये सूचनाएँ विद्वानों और संशोधकों के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होती हैं. इसके अतिरिक्त मूल कृति पर कर्सर रखकर उसके ऊपर लिखी गई टीका, अनुवाद, टबार्थ आदि जितनी भी पुत्र कृतियाँ ज्ञानमन्दिर में संग्रहित हैं, वे सभी कृतियाँ उसकी शाखा-प्रतिशाखा सहित सम्पूर्ण वंशवृक्ष के रूप में देखने में आती हैं. उसमें से वांछित पुत्रकृति पर कर्सर रखकर उससे जुडे प्रकाशन, हस्तप्रत अथवा अंक तथा उन सभी पुस्तकों के नंबर, हस्तप्रतों के नंबर आदि देखने को मिलते हैं. इस प्रकार वह कृति जिस प्रकाशन, हस्तप्रत अथवा सामायिक के साथ जुड़ी हुई हो, वह वाचक को उपलब्ध कराया जाता है. कृति परिवार का निर्माण व कृति-वंश परिचय : कृति का वंशवृक्ष बनाने हेतु लायब्रेरी प्रोग्राम में सर्वप्रथम मूल कृति की प्रविष्टि की जाती है. उसके बाद उसे योग्य प्रकाशन, हस्तप्रत, सामायिक आदि के साथ जोड़ दिया जाता है. मूल कृति को पिता, अर्थात् कृति-परिवार का मुखिया माना जाता है तथा उस कृति के अनुवाद, टीका, विवेचन, टबार्थ, बालावबोध आदि को उसकी पुत्र-पौत्रादि सन्ततिरूप कृति मानी जाती है. For Private and Personal Use Only उदाहरण के लिए भद्रबाहुस्वामी के द्वारा रचित कल्पसूत्र को मूल (पिता कृति) माना गया है, उपाध्याय विनयविजयजी द्वारा रचित सुबोधिका टीका को उसका पुत्र Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org SHRUTSAGAR 26 SEPTEMBER-2014 बनाया गया है तथा सुबोधिका टीका का साराभाई मणिलाल नवाब कृत गुजराती अनुवाद को सुबोधिका टीका का पुत्र तथा कल्पसूत्र का पौत्र बनाया गया है. जिस प्रकार एक पिता के अनेक पुत्र होते हैं, उसी प्रकार एक मूल कृति की अनेक पुत्र कृतियाँ होती हैं. उन पुत्र कृतियों की भी अनेक पौत्र व प्रपौत्र कृतियाँ होती हैं. इस प्रकार जैसे एक व्यक्ति का परिवार क्रमशः बढ़ता रहता है, उसी प्रकार एक मूल कृति के पुत्र-पौत्रादि बढ़ते रहने के कारण उसका परिवार भी बढ़ता है. और एक समय आने पर विशाल वंशवृक्ष बन जाता है. परन्तु जिस प्रकार उस परिवार का छोटे से छोटा सदस्य भी उस परिवार के मुखिया के नाम से जाना जाता है, उसी प्रकार एक कृति-परिवार के छोटे से छोटे सदस्य का सम्बन्ध भी कहीं न कहीं उस परिवार के मुखिया अर्थात् उस मूल कृति के साथ प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अवश्य जुड़ा होता है. इस सम्बन्ध में एक उदाहरण प्रस्तुत है कृति - वंशवृक्ष कल्पसूल मूल कर्त्ता भद्रबाहु स्वामी Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir कल्पसूत्र की सुबोधिका टीका उपा0 विनयविजयजी गणि कल्पसूत्र की सुबोधिका टीका का हिस्सा गणधरवाद उपा0 विनयविजयजी गणि कल्पसूत्र की सुबोधिका टीका के हिस्से गणधरवाद पर हिन्दी प्रवचन आ० पद्मसागरसूरि कल्पसूत्र की सुबोधिका टीका के हिस्से गणधरवाद पर हिन्दी प्रवचन का गुजराती अनुवाद अशोक शाह For Private and Personal Use Only Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org सितम्बर-२०१४ श्रुतसागर 27 उपर्युक्त उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि भद्रबाहुस्वामी द्वारा रचित कल्पसूत्र मूल के ऊपर उपाध्याय विनयविजयजी द्वारा रचित सुबोधिका टीका है. सुबोधिका टीका का एक हिस्सा है- गणधरवाद, गणधरवाद के ऊपर आचार्य श्रीमद् पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. द्वारा दत्त प्रवचन संशय सब दूर भये, उस प्रवचन का अशोक शाह कृत गुजराती अनुवाद आतम पाम्यो अजवाळु का सम्बन्ध कहीं न कहीं कल्पसूत्र से स्थापित हो जाता है. अर्थात् वह कल्पसूत्र के परिवार के एक सदस्य के रूप में प्रस्थापित है. इस प्रकार आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमन्दिर की सूचना पद्धति के आधार पर प्रत्येक कृति के साथ योग्य न्याय करते हुए वाचक, संशोधक व सम्पादक को उनकी वांछित कृति से सम्बन्धित प्रकाशन, अंक, हस्तप्रत आदि की सूचनाएँ अल्पतम समय में उपलब्ध करायी जाती हैं और किसी भी स्तर की संततिरूप कृति का उस परिवार के मुखिया के साथ किसी न किसी रूप में सम्बन्ध स्थापित कर उसे उस परिवार के सदस्य के रूप में मान्यता दी जाती है. Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir अगले अंक में "हस्तप्रतों में उपलब्ध विद्वानों के प्रकार एवं उसका परिचय” प्रस्तुत किया जाएगा. + + For Private and Personal Use Only '(क्रमश:...) Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra पुस्तक नाम कर्ता प्रकाशक प्रकाशन वर्ष मूल्य भाषा www.kobatirth.org पुस्तक समीक्षा : ४००/ : हिन्दी Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir : जैन आचार मीमांसा में जीवन प्रबन्धन के तत्त्व : मुनि श्री मनीषसागरजी म. सा. : प्राच्य विद्यापीठ, दुपाड़ा रोड, : ईस्वी सन् २०१३ डॉ. हेमन्तकुमार For Private and Personal Use Only शाजापुर-४६५००१ मुनिश्री मनीषसागरजी म. सा. द्वारा लिखित जैन आचार मीमांसा में जीवन प्रबन्धन के तत्त्व एक विशालकाय ग्रन्थ है. पूज्यश्री ने विशाल जैनसाहित्य का आलोकन कर उसमें से अमृतमयी जीवन प्रबन्धन के तत्त्वों को निकाला है. १४ अध्यायों में विभक्त प्रस्तुत ग्रन्थ में जीवनोपयोगी जीवन प्रबन्धन, शिक्षा प्रबन्धन, शरीर प्रबन्धन, अभिव्यक्ति प्रबन्धन, तनाव प्रबन्धन, पर्यावरण प्रबन्धन, समाज प्रबन्धन, अर्थ प्रबन्धन, भोगोपभोग प्रबन्धन, धार्मिकव्यवहार प्रबन्धन एवं आध्यात्मिकविकास प्रबन्धन जैसे समसामयिक विषयों को एक-एक अध्ययन में बड़े ही सूक्ष्मतापूर्वक विवेचित किया गया है. वैसे तो इस ग्रन्थ का प्रत्येक अध्याय एक पूर्ण ग्रन्थ है, क्योंकि उसमें न केवल उस उस विषयक जैन साहित्य में आगत विषयों का संकलन किया गया है, अपितु उसका वर्तमान सामाजिक समस्याओं के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण कर जीवन की गुणवत्ता को संवारने में उसकी उपयोगिता और आवश्यकता भी प्रतिपादित की गई है. इनमें से प्रत्येक विषय से संबंधित अलग-अलग सूचनाएँ तो मिलती थी किन्तु एक विषय समूह के रूप में इन सभी को एक साथ कलमबद्ध करके एक सूत्र में पिरोना अपने-आपमें असाधारण उपलब्धि है. प्रस्तुत् ग्रन्थ पूज्य मुनिश्री का शोध प्रबन्ध है. इस शोध प्रबन्ध पर उन्हें जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय, लाडनूं के जैन विद्या एवं तुलनात्मक धर्म दर्शन संकाय द्वारा पीएच. डी. की उपाधि से विभूषित किया गया है. प्रस्तुत् शोध प्रबन्ध में पूज्यश्री ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि जीवन प्रबन्धन के तत्त्व केवल पाश्चात्य Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir श्रुतसागर सितम्बर-२०१४ देशों की खोज नहीं है वरन् जैन धर्म दर्शन में भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है. आज जीवन प्रबन्धन शब्द हमें आधुनिक लगता है, किन्तु जैन धर्म दर्शन की परम्परा तो सम्यक् जीवनशैली की अनादिकाल से पोषक रही है, और इसी बात को पूज्यश्री ने समाज के समक्ष विस्तारपूर्वक उपस्थापित किया है. ___ जैनदर्शन केवल सिद्धांतवादी ही नहीं, अपितु प्रयोगवादी भी है. यह हमें जीवन जीने की सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक दोनों प्रकार की शिक्षा प्रदान करता है. जैन आचार मीमांसा में एक और व्यक्ति को आध्यात्मिक शिक्षा के माध्यम से आत्मोन्नति के शिखर तक पहुँचने की प्रेरणा दी गई तो दूसरी ओर व्यावहारिक शिक्षा के माध्यम से अपने वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन का संतुलित विकास करने की नीतियाँ भी निर्देशित की गई हैं. पूज्यश्री ने जैन आचारग्रन्थों का सम्यक् परिशोधन कर इसमें निहित प्रबन्धनसूत्रों को समाज के समक्ष उपस्थित करके पुनः प्रतिष्ठापित करने का सुन्दर प्रयास किया है. ___ “भौतिक और आर्थिक विकास यद्यपि जीवन जीने के लिए आवश्यक हैं, फिर भी उनका सम्यक् प्रबन्धन तो नैतिक, धार्मिक तथा आध्यात्मिक जीवन मूल्यों पर ही आधारित होगा” पूज्यश्री का यह कथन न केवल पूर्णतया सत्य है, बल्कि यही भारतीय संस्कृति का सारभूत उद्घोष है. इस ग्रन्थ के स्वाध्याय से व्यावहारिक एवं आध्यात्मिक जीवन प्रबन्धन की समुचित प्रेरणा प्राप्त होगी. जीवन प्रबन्धन विषय को अपने शोधकार्य का विषय बनाकर पूज्य मुनिश्री ने जिनशासन को एक बहुमूल्य कृति प्रदान की है. भविष्य में भी जिनशासन की उन्नति एवं श्रुतसेवा में समाज को उनका अनुपम योगदान प्राप्त होता रहेगा ऐसी शुभेच्छा सहित कोटिशः वन्दन. For Private and Personal Use Only Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir नाकोड़ातीर्थ में राष्ट्रसंत आचार्य श्री पद्मसागरसूरिजी का ८०वाँ जन्मोत्सव मनाया गया __ डॉ. हेमन्तकुमार परम पूज्य राष्ट्रसन्त श्रुतोद्धारक आचार्यदेव श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज साहब का 80वाँ जन्म महोत्सव श्री नाकोड़ाजी तीर्थ पर पूर्ण धार्मिक वातावरण में विभिन्न कार्यक्रमों के साथ मनाया गया. भक्ति वन्दना के साथ प्रारम्भ हुए जन्म महोत्सव में देशभर से पधारे हजारों श्रद्धालुओं एवं भक्तगणों का श्री नाकोड़ाजी तीर्थ के अध्यक्ष श्री अमृतलालजी जैन स्वागत किया. ____ इस मंगलमय प्रसंग पर राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री एच. आर. पवार, गुजरात के पूर्व गृहमंत्री श्री प्रफुल्लभाई पटेल, प्राकृत भारती अकादमी के संस्थापक एवं एस.ई.बी.आई. के पूर्व अध्यक्ष श्री डी. आर. मेहता, भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के अग्रज श्री सोमाभाई मोदी, स्थानीय विधायक, कोबातीर्थ के ट्रस्टीगण एवं अनेक गणमान्य महानुभावों में पूज्यश्री के दीर्घ एवं स्वस्थ्य जीवन की मंगल कामना की. _पूज्य मुनिप्रवर श्री विमलसागरजी ने पूज्य गुरुदेवश्री के जीवन कवन का मार्मिक परिचय दिया एवं कार्यक्रम का बड़ा ही प्रभावशाली संचालन किया. पूज्य पंन्यास श्री देवेन्द्रसागरजी, पूज्य पंन्यास श्री हेमचंद्रसागरजी, पूज्य पंन्यास श्री विवेकसागरजी, पूज्य गणिवर्य श्री प्रशांतसागरजी, पूज्य मुनिप्रवर श्री महापद्मसागरजी एवं पूज्य मुनिप्रवर श्री पुनीतपद्मसागरजी ने पूज्य आचार्यश्री के संयम जीवन की विशेषताओं का वर्णन करते हुए अपनी श्रद्धाभक्ति एवं शुभकामनाएँ प्रेषित की. परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य भगवन्त ने उपस्थित जन समूह को प्रतिबोधित करते हुए कहा कि साधुओं का जन्मदिवस तो जिस दिन उसकी दीक्षा हुई हो वही होता है. कोई भी व्यक्ति का केवल अच्छी वाणी बोलने से महान नहीं होता है, उसे महान तो उसके व्यवहार, कार्य, आचरण ही बनाते हैं. मैं आज जो भी हूँ वह सब गुरुकृपा से ही हूँ. ___ मैं अपने आपको सौभाग्यशाली मानता हूँ क्योंकि गुरु का आशीर्वाद मुझे सदैव मिलता रहा है. आज का दिन मंगलकारी इसलिए नहीं है कि आज मेरा जन्म हुआ है बल्कि आज का दिन तो मंगलकारी इसलिए है कि आज अकबर प्रतिबोधक, जिन For Private and Personal Use Only Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir सितम्बर-२०१४ 31 श्रुतसागर शासन के महान आचार्य जगद्गुरु विजय हीरसूरिजी महाराज साहब की पुण्यतिथि है. उनका जीवन कितना महान था इसका इतिहास साक्षी है. मेरे लिए तो आप सभी बस ऐसी भावना व्यक्त करें कि मेरा मृत्यु महोत्सव बन जाए, मेरा बार-बार जन्मोत्सव नहीं मनाया जाए, मेरे भव का विसर्जन हो. पूज्यश्री की जन्मभूमि अजीमगंज श्रीसंघ की ओर से निर्मित पूज्यश्री के जीवनझांकी की सी. डी. प्रदर्शित की गई. इस मंगलमय अवसर पर जीवदया के लिए अनेक कार्यक्रमों की घोषणा की गई. मन्दिर व धर्मशालाओं को सुन्दर ढंग से सजाया गया था. श्रद्धालुओं के लिए सुन्दर आवास एवं भोजन की समुचित व्यवस्था की गई थी. सभी कार्यक्रम पूर्ण धार्मिक वातावरण में हर्षोल्लास पूर्वक सम्पन्न हुआ. राष्ट्रसंत आचार्य श्री पद्मसागरसूरिजी का अगला चातुर्मास सेटेलाइट जैन श्वे. मू. पू. संघ, अहमदाबाद में घोषित परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य देव श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी म. सा. का वर्ष २०१५ का चातुर्मास श्री सेटेलाइट जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ, अहमदाबाद में होना निश्चित हुआ है. सेटेलाइट संघ के अग्रणियों ने श्री नाकोड़ाजी तीर्थ पर पूज्यश्री से निवेदन किया कि आप अपने शिष्य-प्रशिष्यों के साथ वर्ष २०१५ के चातुर्मास का लाभ हमारे संघ को प्रदान करें. सेटेलाइट संघ की भावना को देखते हुए पूज्यश्री अपनी सहर्ष स्वीकृति प्रदान की. पूज्यश्री की स्वीकृति मिलते ही उपस्थित सभी श्रद्धालु आनन्दित होकर झूमने लगे. राष्ट्रसंत आचार्य श्री पद्मसागरसूरिजी के ५ शिष्य-प्रशिष्यों को आचार्य पदवी प्रदान की जाएगी श्री नाकोड़ा तीर्थ के अध्यक्ष श्री अमृतलालजी जैन ने पूज्य आचार्य देव श्री पद्मसागरसूरिजी म.सा. से निवेदन किया कि आप अपने शिष्य-प्रशिष्यों में से जो योग्य हैं उनके आचार्य पद प्रदान करने का कार्यक्रम का लाभ हमारे संघ को प्रदान करें तथा तिथि की घोषणा करें. पूज्यश्री ने उनके निवेदन को स्वीकार करते हुए अपने ५ शिष्य - प्रशिष्यों को १ दिसम्बर, २०१४ को आचार्य पदवी प्रदान करने की घोषणा की. आचार्य देव ने पंन्यास श्री देवेंद्रसागरजी म. सा. पंन्यास श्री हेमचंद्रसागरजी म.सा., पंन्यास श्री विवेकसागरजी म.सा., पंन्यास श्री अजयसागरजी म.सा. एवं मुनि श्री विमलसागरजी म.सा. को आचार्य पद से विभूषित करने की घोषणा की. For Private and Personal Use Only Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir SHRUTSAGAR 32 SEPTEMBER-2014 वैराग्य वर्द्धक एवं जीवनोपयोगी तीन ग्रंथरत्नों का विमोचन संपन्न पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य श्री पद्मसागरसूरिजी म. सा. द्वारा लिखित चिंतननी केडी तथा संशय सब दूर भए एवं आचार्य श्री भद्रगुप्तसूरिजी म. सा. द्वारा लिखित तारा दुःखने खंखेरी नांख का आचार्य श्री कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर द्वारा पुनः संपादन है. उसका विमोचन राष्ट्रसन्त आचार्य श्री पद्मसागरसूरिजी म. सा. के जन्मोत्सव के प्रसंग पर नाकोड़ाजी तीर्थ पर न्यायमूर्ति श्री एच. आर. पवार, पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायालय, श्री डी. आर. मेहता, जयपुर, श्री प्रफुल्लभाई पटेल, पूर्व गृहमंत्री गुजरात सरकार, श्री सोमाभाई मोदी एवं श्री अमृतलालजी जैन अध्यक्ष, श्री नाकोड़ाजी तीर्थ के करकमलों से सम्पन्न हुआ. कोबातीर्थ में पर्वाधिराज पर्युषण धार्मिक वातावरण में सम्पन्न श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र, कोबा में दिनांक २२ अगस्त, १४ को जैनशासन का महापर्व पर्युषण धार्मिक वातावरण में हर्षोल्लास पूर्वक सम्पन्न हुआ. परम पूज्य राष्ट्रसन्त आचार्य श्री पद्मसागरसूरीश्वरजी महाराज साहब के शिष्य जापमग्न आचार्य श्री अमृतसागरसूरीश्वरजी म. सा. एवं पूज्य साध्वीजी भगवन्तों की उपस्थिति में प्रतिदिन प्रातःकालीन एवं संध्याकालीन सामायिक-प्रतिक्रमण में सैकड़ों साधक उपस्थित होकर आत्म साधना करते रहे. जन्मवांचन एवं सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में बड़ी संख्या में आराधकों ने लाभ लिया. मन्दिर में प्रतिदिन आकर्षक आंगी की गई. श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र, कोबा की ओर से साधकों के आवास एवं भोजन की सुन्दर व्यवस्था की गई थी. सभी कार्यक्रमों को धार्मिक वातावरण में हर्षोल्लासपूर्वक सम्पन्न कराने में श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र के ट्रस्टीगण एवं कार्यकर्ताओं ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. For Private and Personal Use Only Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org ANAPAN PO राजस्थान की पुण्यधरा श्री नाकोडातीर्थ में परम पूज्य गुरुभगवंतश्री का ८० वाँ जन्मदिवस के पावन प्रसंग की झलक Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir agribamole a परमज्य राष्ट्र wound you meal feste For Private and Personal Use Only Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir TITLE CODE : GUJ MUL 00578. SHRUTSAGAR (MONTHLY). POSTAL AT. GANDHINAGAR. ON 15TH OF EVERY MONTH. PRICE : RS. 15/- DATE OF PUBLICATION SEPTEMBER 2014 श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबातीर्थ के पवित्र प्रांगण में पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के कुछ यादगार पल TEAMERA प्रकाशक आचार्य श्री कैलाससागरसरि ज्ञानमंदिर श्री महावीर जैन आराधना केन्द्र कोबा, गांधीनगर 382007 फोन नं. (079) 23276204, 205, 252, फेक्स (079) 23276249 Website : www.kobatirth.org email : [email protected] BOOK-POST / PRINTED MATTER PRINTED, PUBLISHED AND OWNED BY : SHRI MAHAVIR JAIN ARADHANA KENDRA, PRINTED AT: NAVPRABHAT PRINTING PRESS. 9-PUNAJI INDUSTRIAL ESTATE, DHOBHIGHAT, DUDHESHWAR, AHMEDABAD-380004 PUBLISHED FROM : SHRI MAHAVIR JAIN ARADHANA KENDRA, NEW KOBA, TA. & DIST. GANDHINAGAR, PIN : 382007, GUJARAT. EDITOR : KANUBHAI LALLUBHAI SHAH. For Private and Personal Use Only