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अनुसन्धान ४५
श्रीबीबीपुरस्थित श्रीचिन्तामणिपार्श्वनाथ जिनालयनी प्रशस्ति : भूमिका
मुनिसुयशचन्द्र-सुजसचन्द्रविजय प्रशस्ति एटले चैत्यनिर्माणनी विगत-चैत्यप्रतिष्ठा करनार श्रावकना वंशनी-तेना कार्यनी प्रतिष्ठापक आचार्यनी माहिती-आपतो ऐतिहासिक दस्तावेज.
प्रस्तुत प्रशस्ति तपागच्छनी सागरशाखाना श्रीसौभाग्यना शिष्य सत्यसौभाग्य गणिओ सं. १६९७ मां रची छे. 'शान्तिदास शेठे आ जिनालयनी प्रतिष्ठा सं. १६८२ मां करी' तेवी नोंध जैन परम्परानो इतिहास, भाग-३, पृ. ७५७ पर छे. तो आ प्रशस्तिनी रचना ते वखते न थता १५ वर्षना आंतरे थई तेनुं शुं कारण हशे ? एवो सवाल सहज ऊठे छे.
अहीं चैत्यप्रशस्तिना परिचय साथे प्रशस्तिमां न होवा छतां शेठ शान्तिदास-आ. राजसागर सूरिजीनो-चिन्तामणिपार्श्वनाथनो विशेष परिचय अहीं संकलन करीने लख्यो छे.
बीबीपुर "सैयद सूर मीर बीन सैयद बडा बीन याकुबने 'बीबी' नामनी माता हती. तेनो रोजो मंगळदास शेठनी मीलनी पाछळ 'दादा हरि वाव'नी पासे छे. तेना नामथी 'बीबीपुर' वस्युं हतुं. ते असारवा अने सैयदपुर (सरसपुर) नी वच्चे हतुं. संभव छे के बीबीपुर-सीकंदरपुरनी साथे ज जोडायेल होय.'' [जैन. परं. इति. भाग-३, पृ. १९९]
अनुसन्धान २४ मां पू.सहजकीर्ति म. द्वारा रचायेल श्री १०८ पार्श्वनाथ स्तवन छपायुं छे. ते स्तवननी पहेली कडीमां 'इडरें अहमदाबाद आसाउलै बीबीपुर चिन्तामणी ए' पदथी बीबीपुर-चिन्तामणिपार्श्व० नो उल्लेख कर्यो छे. पू. उपा. श्रीभुवनचन्द्र म. टिप्पण करतां बीबीपुरने सरसपुर तरीके ज ओळखाव्युं छे.
तपा. शिवविजयजीना शिष्य शीलविजयजीओ सं. १६८२ मां रचेल
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तीर्थमाळामां पूर्वदिशानां तीर्थोनुं वर्णन करतां कडी १५१मां - 'ओस वंशे शान्तिदास श्रीचिन्तामणि पूज्या पास' एम शान्तिदास शेठ द्वारा प्र. (प्रतिष्ठित थयेल) चिन्तामणिपार्श्वनाथनी स्तवना करी छे.
श्रीचिन्तामणिपार्श्वनाथभगवान सं. १६५५मां तपगच्छ नायक पू. आ. श्रीविजयसेनसूरिजी म. चोमासा पछी कृष्णपुर-काळुपुर पधार्या हता. त्यारे तेमना शिष्यो पैकी केटलाकने स्वप्न आव्युं के तमे ढींगवावाडानी जमीन खोदावजो. जमीन खोदता तेमांथी श्यामवर्णनी श्रीचिन्तामणिपार्श्वनाथ भगवाननी प्रतिमा नीकळी. तेनु नाम पूज्य श्री श्रीविजयचिन्तामणिपार्श्वनाथ आप्युं. त्यारबाद सिकंदरपुरमा ज चातुर्मास करी एक भव्य जिनालयनिर्माणनो उपदेश आप्यो. श्रीसंघे विशाळ जिनालय बनाव्यु. सं. १६५६मां जे.सु. ५ ना दिवसे ते प्रतिमाजीनी आ.श्री सेनसूरिजी म.ना वरद हस्ते प्रतिष्ठा थई.
__ अमदावादना शेठ शान्तिदास पं. मुक्तिसागरजीनी कृपाथी सुखी थया हता अने अमदावादना सूबा बन्या हता. वर्द्धमान अने शान्तिदासने गुरु म.ना मुखेथी जिनमन्दिरनिर्माणना फळने जाणी देरासर बंधाववानी इच्छा थई. सं. १६७८ मां जीर्णोद्धार शरु थयो. [ श्लो. ४५ थी ४९] जोतजोतामां ६ मण्डप, ३ शिखर, ३ गभारा, ३ चोकीथी युक्त भव्य जिनालय ऊभुं थयु. जेनी आजुबाजु ५२ नानी देरीओ बनावी हती अने चतुर्मुख जिनालय हता. [श्लो. ५२, ५३] आ. जिनालय बनाववामां शेठे दीर्घदृष्टिथी काम लीधुं हतुं. मुस्लिमयुगमां जिनालयनी रक्षावें काम विकट होई आक्रमण वखते प्रतिमाजीओने सरळताथी सुरक्षित स्थाने खसेडी शकाय ते माटे पोतानी हवेलीथी देरासर सुधी एक मोटी सुरंग बनावी दीधी. आ जिनालय 'वीरपाल' नामना (सोमपुरा) सलाटे बनाव्यु. [श्लो. ८४] सं. १६८२ मां (जे.व. ९ ना दिवसे) महो. विवेकहर्ष गणीनी अध्यक्षतामां महो. मुक्तिसागरगणिना हाथे परमात्मानी महोत्सवपूर्वक प्रतिष्ठा थई. [श्लो. ६०]
___आ जिनालयना निर्माण-प्रतिष्ठाना कार्यमां शेठे ९ लाख रू. नो खर्च को हतो. जेनी नोंध सं. १८७० मां रचायेल शान्तिदास शेठना रासमां कवि
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क्षेमवर्द्धनगणिए पण लीधेल छे ;
जी हो चिन्तामणि देहेरुं करी लाल, नवलख नाणा रोक जी हो प्रभु पधरावी हरखीया लाल, रवि देखी जिम कोक
(ढाळ ४ कडी १३) अहीं खास नोंधवं जोईए के ऐतिहासिक रास संग्रहमां पृ. ८नी टिप्पणीमां सम्पादके 'अमदावादनो इतिहास' पुस्तकमांथी नीचेनी नोंध लीधी छ :
"आ ५२ जिनालय, शिखरबंध देहरुं सरसपुर नामना पुराथी पश्चिमे आशरे खेतरवा एकने छेटे छे. अने कहेवामां आवे छे के नगरसेठ शान्तिदासे रू. ५/७ लाख खर्चीने (देहरूं) कर्यु हतुं. ओ देहरानो तमाम घाट हठीसिंगना देहरा जेवो छ पण फेर एटलो ज छे के हठीसिंगर्नु देहेरं पश्चिमाभिमुखनु छे अने आ दहेरुं उत्तराभिमुख छे. xxx
त्यारबाद सं. १७०१ मां औरंगझेबे आ जिनप्रासादने तोडावी एमां फेरफार करी तेने मस्जीद बनावी दीधी. आम थवाथी गुजरातमां मोटुं बंड थयु. शान्तिदास शेठे सूबाना तोफाननी शाहजहांने अरजी मोकली. अमदावादना मुल्ला हकीमे पण पत्र लखी जणाव्यु के - 'आ घटना सूबाना हाथे थयेल हीचकारी घटना छे तेथी बादशाह शाहजहांए राज्यना खर्चे सं. १६८२ना जिनालय जेवू नवु जिनालय बनावी शेठने आपवानुं फरमान लखी मोकल्यु. देरासर पहेलाना जेवू तैयार थई जता सं. १७०५-१७०६मा पुनः प्रतिष्ठा करावी." ते प्रतिष्ठा कोना हाथे थई तेनी नोंध मळती नथी. 'राजनगरनां जिनालयो' पुस्तकमां पृ. ४ उपर - 'सं. १७०५मां जिनालय तैयार करवामां आव्युं परंतु मन्दिरमा गायनो वध थयेलो होवाथी फरी देरासर तरीके तेने स्वीकारवामां आव्युं नहीं' -आवी नोंध छे.
त्यार बाद थोडा वर्षे मुसलमानोनी आफत आवी. आ वखते शेठना पुत्र लक्ष्मीचंदना पुत्र खुशालचंद्रे गाडा मारफत प्रतिमाजीओने झवेरीवाडमां लाववानी व्यवस्था करी, तेमांथी ३ मोटा प्रतिमाजीने शेठ शान्तिदासनी स्मृतिमां बनावेल आदीश्वर जिनालयना भोयरामां पधरावी' अने मूळनायक श्रीचिन्तामणि १. प्रतिमाजीने झवेरीवाडानी नीशापोळमां जगवल्लभना भोयरामां पधराव्या.
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पार्श्वनाथने झवेरीवाडना शेठ सूरजमलना बनावेला जिनालयमा पधराव्या. आ देरासर आजे वाघणपोळमां चिन्तामणिपार्श्वनाथना नामे प्रसिद्ध छे. आ सिवायनी अन्य प्रतिमाजीना स्थळान्तरनी नोंध अने उपरनी घणी - बधी बाबतो जैन परं नो इतिहास भा. ४ पृ. १३२ थी १३७, १४६ तथा २५४ - २६० मां नोंधायेल छे. आ वातोनी खास नोंध शान्तिदास श्रेष्ठीना रासमां पण नथी.
शेठ आणंदजी कल्याणजी पेढी द्वारा प्रकाशित थयेल 'राजनगरनां जिनालयो' पुस्तकमां प्रस्तुत इतिहास तो छे. विशेष सं. १६९४ मां मेन्डेलस्लो नामना प्रवासीओ भारतनी मुलाकात दरम्यान आ देरासरनी मुलाकात लोधी हती तेनी नोंधनो केटलोक अंश अहीं टांक्यो छे
"आ देरासर नि:शंकपणे अमदावाद शहेरना जोवालायक उत्तम स्थापत्यमांनुं एक हतुं. ते समये आ देरासर नवुं ज हतुं कारण के तेना स्थापक शान्तिदास नामे धनिक वाणिया मारा समयमां जीवता हतां. ऊंची पथ्थरनी दीवालथी बंधायेला विशाळ चोगाननी मध्यमां आ देरासर आवेल हतुं. x x xx प्रवेशद्वारमां बे काळा आरसना सम्पूर्ण कदना हाथीओ हता. तेमांना एक उपर स्थापकनी (शान्तिदासनी ) मूर्ति हती. " x x × ×
नगरशेठनो वंश - वंशावली
(१) ओसवालज्ञाति-वृद्धशाखा- कुंकुमलोलगोत्र - सीसोदीया वंश
↓
(२) पद्म (पद्माशाह ) - पद्मा
↓
(?)
.- जीवणी
९
↓
सहलुआ-पाटी
↓ हरपति पुनाई
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(३`वाछा, वच्छा (वत्सा) - गोरदे ( गुरुदे ) (४
(५) सहस्रकिरण (सहिसकिरण, सहेसकरण), (१) (६) मानकुंअरि (कुंअरि)
↓
(८) वर्द्धमान - वीरमदेवी
↓
वस्तुपाल रायसिंह चन्द्रभाण
(९) शान्तिदास (१) विशदा
(२) (७) सोभागदे (सौभाग्यदे)
↓
विजय सुन्दर कल्याणमल्ल
(२) कपूरा (३) फूला (४) वाछी ↓
पनजी - देवकी रतनजी
कपूरचन्द्र लक्ष्मीचन्द्र
(१) ज्ञाति - शाखा - गोत्र वंशनी नोंध 'अनुसन्धान १८ ' मां प्रकाशित थयेलसिद्धाचलतीर्थ चैत्यपरिपाटी (पृ. १२४) मां छे.
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(२) जैन परं इति. भा. ४ पृ. १२१ मां तेमनुं नाम 'हरपति' जणावे छे. जेने कर्ताओ तेमना प्रपौत्र जणाव्या छे.
(३) जैन परं इति भा. ४ पृ. १२५ पर तेमनुं बीजुं नाम 'वाछा' जणावे छे. तेमनुं कुटुम्ब विजयसेनसूरिजी म. नुं उपासक हतुं. प्रशस्तिसंग्रह पृ. ८ प्रशस्ति नं. २४मां 'वडा' नाम लख्युं छे. परं. ना इतिहासमां पद्मा शाह पछी वत्सा शाहनी नोंध छे. वच्चेनी नोंध नथी.
(४) प्रशस्तिसंग्रहमां (अमृतलाल मगनलाल शाह द्वारा सम्पादित ) पृ. ८, २४ लेख नं. २४, १०७ मां 'गुरुदे' नाम लख्युं छे.
(५) प्रशस्तिसंग्रहमा 'सहिसकिरण' अने सिद्धाचलतीर्थचैत्यपरिपाटीमां 'सहसकरण' नाम छे. तेओ विद्याप्रेमी अने धर्मप्रेमी हता. तेमणे
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अमदावादमां पोतार्नु स्वतन्त्र देरासर अने ज्ञानभण्डार बनाव्या हता. प्रशस्तिकारे पण 'चित्कोशं प्रतिमागृहं च तुलया मुक्तं मुदा योऽव्यधात्' [श्लो. २६] पदथी तेमना आ गुण तरफ अंगुलिनिर्देश कर्यो छे. (1) तेमना द्वारा लखावायेल ग्रन्थोमांथी केटलाक ग्रन्थो प्राप्त छे. आ ग्रन्थनी लेखन प्रशस्तिमा प्रायः घणे स्थाने तेमना बन्ने पुत्रना नाम छे, ते परथी कही शकाय के तेमणे आ कार्य (ग्रन्थभण्डार) बन्ने पुत्रोनां जन्म पछी ज कर्यां हशे.' (II) आ ग्रन्थो हाल सूरत-आगरा-लींबडीपूना-अमदावादनां ज्ञानभण्डार पुस्तकालयमा छे जेथी कही शकाय छे तेमना वंशजोए जुदा जुदा प्रसंगोए उपरना भण्डार वगेरेने ग्रन्थो आप्या हशे. बाकीनो संग्रह तेमना ज नामथी हाल ‘लालभाई दलपतभाई विद्यामन्दिर (L.D.) मां सुरक्षित छे.' - आ बन्ने नोंध जैन परं.
इति. भा.४, पृ. १२३/१२४ पर छे... (६) जैन परं. इति. भा.४ पृ. १२४ उपर तेमनुं बीजुं नाम 'कुंअर' कर्तुं छे. (७) जैन परं. इति. भा.४ पृ. १२४ उपर तेमनुं बीजुं नाम 'सौभाग्यदे'
कां छे. (८) वर्द्धमानना जीवननो विशेष कोई परिचय प्राप्त थतो नथी. परंतु उदार
मनोवृत्तिवाळा ते पांच तिथिना पौषध करवा, सच्चित्तआहारनो त्याग, ब्रह्मचर्य- पालन, वगेरे नियमनुं पालन करवावाळा हता. अने तेमणे सम्यक्त्व सहित श्रावकना १२ व्रत पण ग्रहण कर्या हता. [श्लो. ३३, ३४] जैन परं. इति. भा.४ पृ. १२४ उपर विशेष नोंध-शेठ शान्तिदासे ज्यारे चिन्तामणि पार्श्वनाथ भगवाननुं नवं जिनालय बनाव्युं त्यारे तेना दरेक काम तेमना भाई वर्द्धमाननी देखरेख नीचे थया हता. शेठ शान्तिदासना जीवन-सत्कार्योनी नोंध आपता ग्रन्थो-आधारस्थळो सारा प्रमाणमां मळे छे. जेवा के शान्तिदास शेठनो रास, जैन परं.नो इतिहास भा.३-४, गुजरात, पाटनगर (ले. रत्नमणिराव जोटे), अमदावादनो इतिहास (ले. मगनलाल वखतचंद जोशी), प्रतापी पूर्वजो
(२
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अनुसन्धान ४५ (डुंगरशी धरमशी संपट), राजनगरनां रत्नो (वल्लभजी सुंदरजी) गुजरात वर्नाक्युलर सोसायटीनो इतिहास (गुज. वर्ना. सोसायटी) वगेरे.
अहीं तेथी ज शेठ शान्तिदासना जीवननी कशी पण वात जणावी नथी मात्र केटलीक विशेष नोंध अने एमनां करेल कार्योनी नोंध मूकी छे. श्लो. ३९ सं. १६६८ - कनडदेशमां (कर्णाटकमां?) श्रीहीरविजयसूरिना
पादुका सहित स्तूपनी प्रतिष्ठा श्लो. ४० सं. १६६९ - शत्रुजयतीर्थ उपर महोत्सवपूर्वक आदेश्वरभगवानना
परिकरनी प्रतिष्ठा श्लो. ४१ १६७५ - शत्रुजयतीर्थनी संघपति बनी विधिपूर्वकनी यात्रा श्लो. ४५ १६७८ - प्रासादनिर्माण (प्रारंभ?) श्लो. ६० १६८२ - महोत्सवपूर्वक वाचक मुक्तिसागरगणिना हाथे
श्रेयांसनाथ प्रमुख शताधिक बिम्बोनी प्रतिष्ठा श्लो. ६३ १६८६ - महो. मुक्तिसागर गणिने गणाधिपपदे बिराजमान
करवा. (सागरगच्छ स्थापना ?) श्लो. ६५ १६८७ - महादुष्काळमां गरीब लोकोने अन्नादिनुं दान श्लो. ६६ १६९० - शत्रुजयतीर्थनी संघपति बनीने यात्रा. श्लो. ६७ १६९३ - पादविहार-विहार प्रमुख छ'री- पालन करवा
पूर्वकनी शत्रुजय यात्रा. आ सिवाय अनु. १८ मां प्रगट थयेल सिद्धाचलतीर्थचैत्यपरिपाटीना मुद्दा नं. ९मां तेमणे तीर्थाधिराज तरफ जवाना रस्ता पर बनावेल 'वाव'नी नोध छे.
तेओ जे मोगल बादशाहना सम्पर्कमां आव्या तेमांना शाहजहां, जहांगीर, मुरादबक्ष, औरंगझेब पासेथी शत्रुजय-गिरनार-आबु-तारंगा-केसरियाजी-अने श्रीचिन्तामणिजी जेवा तीर्थनी रक्षाने लगतां फरमानो मेळव्या हता. [जैन परं. इति.]
सं. १६८६ मा मुक्तिसागरगणिनी आचार्यपदवी थई. सागरगच्छ स्थपायो त्यार बाद सागरगच्छनी वृद्धि माटे शेठे ११ लाख रू. खरच्या. सागरगच्छना
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उपाश्रयो पण सुरत, राधनपुर, अमदावाद, पाटण वगेरे स्थळोओ बनाव्या. क्षेमवर्द्धन गणीना शब्दोमा
'जोहो वेलिया विही प्रभावना लाल, अग्यार लाख द्रव्य थाय जीहो सागरगच्छमां आपीया लाल, गुणीजन कीरत गाय.
(ढा. ४, कडी १४) वळी रामविजय-शान्तिजिनरासमां
संवत सोल ल्यासीया(छ्यासीया) वर्षे, आचारज पद थापीया रे, श्रीराजसागरसूरि नाम जयंकर, सागरगच्छ दीपाया रे... ३३ साह शिरोमणि सहसकिरणसुत, शान्तिदास सुजाण रे, जस उपदेशे बहु धन खरच्युं, लख ईग्यार प्रमाण रे... ३४ (प्रशस्ति)
आ रीते आ बाबतनो उल्लेख करे छे.
सागरगच्छनी स्थापना अने मुक्तिसागरगणिनी पदवीमां पण शेठनो खूब मोटो फाळो हतो. शान्तिदास शेठनो रास अने जैन परं. इतिहास - चिन्तामणिमन्वनी साधना, बादशाहनी मुलाकात, राज्यमान, उपाध्याय पद, आचार्यपदप्रदान, जिनालय प्रतिष्ठा, सागरगच्छ स्थापना वगेरे बाबतोमा मतान्तर दर्शावे छे जेनो निर्णय विद्वानो ज करी शके.
शेठना स्वजन सम्बन्धी विगत आपतां प्रशस्तिकार ४ पत्नी-विशदा, कपूरा, फूला, वाछीना अनुक्रमे ४ पुत्रो पनजी-रतनजी-कपूरचन्द्र-लक्ष्मीचन्द्र नाम आपे छे. जैन परं. इति. भा.४ - पृ. १३९ पर तेमना पुत्रना नाम जणावतां नीचेनी विगत नोंधी छे : (१) प्रशस्तिकार (?शेनी प्रशस्ति हशे ? के प्रस्तुत प्रशस्ति ज?) ४ पुत्र जणावे छे ते मनजी, रतनजी, कपूरचंद, लक्ष्मीचंद. (२) शीलविजयजी रासमां-रतनजी, लक्ष्मीचंद, माणेकचंद, हेमचंद एम ४ पुत्रो. (३) क्षेमवर्द्धनगणी रासमां मनजी, रतनजी, लक्ष्मीचंद, माणेकचंद, हेमचंद एम ५ पुत्रो. (४) कृष्णसागर गणी रतनजी, लक्ष्मीचंद, माणेकचंद, हेमचंद अम ४ पुत्रो. (a) नगरशेठना घरमा रहेल हस्तप्रतनी पुष्पिकामां धनजी-रतनजीलक्ष्मीचंद-माणेकचंद-हेमजी एम ५ पुत्रोना नाम जणावे छे. (६) ज्यारे 'गुजरातनुं पाटनगर' पुस्तकमां पनजी, रतनजी, कपूरचंद, लक्ष्मीचंद, माणेकचंद, हेमचंद अम ६ पुत्रोनां नाम लख्यां छे.
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अनुसन्धान ४५ शेठना जन्मनी के शेष जीवननी नोंध रासमां नथी. मालतीबहेन शाह शेठनो जन्म सं. १६४१-४६नी आसपास होवानुं अनुमान करे छे, तेमनो स्वर्गवास सं. १७१६मां थयो होवानुं माने छे. ज्यारे राजसागरसूरिनिर्वाण रासना उल्लेख मुजब तेमनो स्वर्गवास सं. १७१५ मां थयो हतो. आ नोंघ राजनगरना' जिनालयो - पृ. १९३ उपर छे.
आचार्य राजसागरसूरिजी
आनन्दविमलसूरिजी
विजयदानसूरिजी
हीरविजयसूरिजी
विजयसेनसूरिजी
राजसागरसूरिजी प्रशस्तिकारे [श्लो. ७४ थी ८०मां] राजसागरसूरिजीनी गुरुपरम्परा उपर मुजब जणावी छे. जैन परं. नो इति. भा.४ प्रकरण ५५मां तेमनी गुरुपरम्परा जुदी जणावी छे. सं. १६७४ मां रचायेल 'नेमिसागरनिर्वाणरास' मां कर्ता कृपासागरे पण लगभग परं. ना इतिहास जेवी परम्परा जणावी छे अमां 'जीवर्षि गणि'नुं नाम नथी. वळी,
लक्ष्मीसागरसूरिजी (तपा.)
उपा. विद्यासागरजी
जीवर्षिगणी
उपा. धर्मसागरजी (१)
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उपा. लब्धिसागरजी
(२)उपा. नेमीसागरजी राजसागरसूरिजी (३) (१) उपा. धर्मसागरजी-जीवर्षिगणिना शिष्य हता एवं महो. भावविजये
'षट्त्रिंशज्जल्प' ग्रन्थमां लख्युं छे. (जैन. परं.नो इति. भा.३, पृ. ६९७) परंतु महो. धर्मसागरजी पोते रचेल कल्पकिरणावली, प्रवचन परीक्षामां 'हीरविजयसूरिजी म. ने गुरु तरीके जणाव्या छे.. उपा. नेमिसागरजी अने आ. राजसागरसूरिजी सिरपुर (सिंहपुर)नगरना शेठ देवीदास अने तेनी पत्नी कोडमदेना पुत्र हता. तेमनुं गृहस्थ अवस्थानुं नाम 'नानजी' अने आचार्यश्रीनु 'मेघजी' हतुं. नेमिसागर गुरु निर्वाण रास ढाळ ९ कडी १२२ मां मुक्तिसागर गणिने (राजसागरसूरिजीने) तेमना मोटा भाई अने मानसागरमुनिने तेमना नाना भाई कह्या छे. जैन. परं.ना इति. पृ. ७५० उपर - "उपा. धर्मसागरजीओ कोडिमदे अने तेना बन्ने पुत्रोने दीक्षा आपी उपा. लब्धिसागरना शिष्य बनाव्या. शाहजहांओ एमने 'वादिजीवक'- बिरुद आप्यु हतुं, तेमनो स्वर्गवास १६७४मां थयो.
ते वखते तेमना माता हयात हता. तेवी नोंध छे. (३) 'बाळपणथी तेजस्वी-बुद्धिशाळी हता, तेमने पद्मावती देवीनी सहाय
हती' तेवी नोंध जैन परं.नो इति. भा.३ पृ. ७५१ उपर छे. बाळपणशिष्यपरम्परा-जीवन-काळधर्म वगेरे विशेष विगतो माटे तपा. सागरशाखाना हेमसौभाग्ये बनावेल 'राजसागरसूरिनिर्वाणरास' अने तिलकसागरे सं. १७२१ मां बनावेल 'राजसागरसूरिनिर्वाणरास' जोवा जोई. तेमना द्वारा रचायेल 'केवली स्वरूप स्तवन' कडी. ६८ मळे छे. अमदावाद - पं. प्र.वि.सं.मां रहेली 'हितोपदेश'नी प्रतमा 'मुक्तिसागरजी'ने तपगच्छमाथी काढी नाखवामां आव्या तेनी नोध छे. [प्रशस्ति संग्रह पृ. १९०]
आचार्य राजसागरसूरिजीनी शिष्य परम्परा जैन गुर्जर कविओ भा. ११०मां तेमना शिष्यादि द्वारा थयेल रचनाओने जोतां नीचे मुजब जोवा मळे छे.
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अनुसन्धान ४५
राजसागरसूरिजी
वृद्धिसागरसूरि
(गुणसागर पं. शान्तिसागर
कृपासागर
गणि दयालसागर (२)तिलकसागर
(३)माणिक्यसौभाग्य
लक्ष्मीसागरसूरि
विनयसागर
चतुरसौभाग्य
मानविजय
कल्याणसागरसूरि
दीपसौभाग्य
(४)पुण्यसागरसूरि
सत्यसौभाग्य
उदयसागरसूरि
(५)इन्द्रसौभाग्य
आनन्दसागरसूरि
पं.विवेकसागर वीरसौभाग्य
(६)हेमसौभाग्य
(७)शान्तिसागरसूरि
न्यायसागर
प्रेमसौभाग्य
(८'शान्तसौभाग्य (१) तेमनी सं. १६८३ मां रचायेल 'बारव्रतनी सज्झाय' प्राप्त थाय छे. (२) सं. १७२१ मां 'राजसागरसूरि निर्वाणरास' बनाव्यो. (३) वृद्धिसागरसूरिजीना सन्तानीय छे. तेमणे सं. १७७९ मां रचेल 'चित्रसेन
पद्मावती रास' अने सं. १६४७ मां रचेल ‘वृद्धिसागरसूरि निर्वाणरास' छपायेल छे.
तेमणे 'महावीरविज्ञप्तिषट्त्रिंशिका' संस्कृतमां रचेल छे. (६) सं. १७२१ मां 'राजसागरसूरि निर्वाणरास' बनाव्यो.
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अनुसन्धान ४५
॥ श्री बीबीपुरमण्डनश्रीचिन्तामणि पार्थनाथचैत्यप्रशस्तिः॥
सं. मुनिसुयशचन्द्र-सुजसचन्द्रविजयौ आई०॥ महोपाध्याय श्री६ सत्यसौभाग्यगणिगुरुभ्यो नमः ।। निःप्रत्यूहमुपासतां कृतधियः श्रीपार्श्वचिन्तामणे
रुत्फुल्लोत्पलभासि वासितजगत्पादद्वयं सद्गुणैः । साम्राज्यं विदधात्यसद्विषदलं प्रास्ताखिलोपप्लवं,
यो द्वैराज्यकथामपि त्रिभुवने निर्मूलमुन्मूलयत् ॥१॥ [शार्दूल०] उद्धर्त्ता जगतीत्रयीमिति विदन् जिहाय भोगीश्वर
श्छेत्ता ध्वान्तचमूमहर्निशमिति स्पष्टं च घस्त्रेश्वरः । कल्प्याकल्प्यपदार्थसार्थमसकृद् दातेति देवद्रुमो,
यस्मिन् जातवति क्षितौ स भगवान् श्रीआश्वसेनिः श्रिये ॥२॥ [शार्दूल०] मातङ्गाश्वर्तुचन्द्र(१६७८)प्रमितशरदि तौ मानतुङ्गाख्यमेनं,
प्रासादं वर्द्धमानः ससृजतुरतुलं शान्तिदासश्च शुभ्रम् । भास्वद्वीबीपुरे सत्तपगणतरणीपार्श्वचिन्तामणेर्यं,
श्रीमहांगीरराज्ये युवनृपतियुते तस्य कुर्मः प्रशस्तिम् ॥३॥ [स्रग्धरा०] अस्ति स्वस्तियुतः प्रशस्तकमलाचेतोविनोदास्पदं,
देश: पेशलकौशलप्रविलसल्लोकाद्भुतो गुर्जरः । यस्यैकैकगुणं परे जनपदाः स्वीकृत्य तं तं यशः
प्रारभारं जननिर्मितं गुणनिधेरासेदिवांसः स्फुटम् ॥४॥ [शार्दूल०] अस्मिनुद्दामधामद्विजपतिवदनादर्शनक्षुभ्यदन्त
वृत्तिस्वाहाशनौघायाव) गणिततविषऽहिम्मदावादसज्ञः । भाति द्रङ्गः सरङ्गः कथयति जनता चन्द्रबिम्बेऽत्र यस्या
ऽत्युच्चप्रासाददण्डाहतिभवविवराकाशदेशं कलङ्कम् ॥५॥ [स्रग्धरा]
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अस्मिन् बीबीपुराख्यं प्रमुदितजनभृद्रम्यहर्म्यध्वजालीछायाच्छद्मप्रसर्पद्भुजगततिवधूगोपितोद्यन्निधानम् ।
शक्रेण स्वं सुराढ्य (ढ्यं ) पुरममलधिया त्यक्तुकामेन साक्षाद् वस्तुं बद्धस्पृहं सद्विशदतरगुणं भाति शाखापुरं तत् ||६|| [स्रग्धरा ] किञ्च - श्रीमान् बब्बरपार्थिवो गजघटासङ्घदुस्सञ्चरं, प्राज्यं राज्यमपालयज्जनगणत्राणैकबद्धोद्यमः ।
माद्यद्दोर्बलदर्पदर्पितमनः प्रत्यर्थिसीमन्तिनी
वैधव्यव्रतदानकर्मगुरुतां सार्वत्रिकीं यो दधे ॥७॥ [ शार्दूल० ]
तस्मादाविरभूद्यथा दशरथाद् रामः प्रतापांशुमान्,
सन्यायैकमति (हु) मायुनृपतिदुर्वारवीर्योन्नतिः ।
शैलेभ्यः पततां परक्षितिभृतां श्वासानिलैर्बिभ्यतां,
येन द्राग्ददताऽशनं फणभृतां प्राणोपकारः कृतः ॥८॥ [ शार्दूल० ]
सूनुस्तस्य महीभृतः समभवद् भूमण्डलाखण्डलः,
शाहिश्रीमदकब्बर क्षितिपति स्फूर्ज्जत्प्रभाहपतिः ।
दानेनाऽर्थिभिराजिभिः परगणैः शूकेन हिंस्रैः सृजन्
मुक्तं वीरकथामयं जगदिदं वीरस्त्रिधा यो व्यधात् ॥९॥ [ शार्दूल० ]
यस्योद्यद्दानधाराधरपटलसमुद्भूतसौवर्णधारा
सन्दोहप्लाव्यमानः क्वचिदपि लभते नाऽऽश्रयं दौस्थपङ्कः । नश्यद्भिर्द्राग् विपक्षक्षितिपतिभिरतिस्पर्द्धयेवोह्यतेऽसा
वृत्सृज्याऽमुं समन्तात्कशिपुगतभरं सानुमत्काननेषु ||१०|| [ स्रग्धरा ]
तस्य श्रीमदकब्बर क्षितिपतेर्देदीप्यते साम्प्रतं,
सूनुः श्रीइसलामशाहिनृपतिः प्रोत्सर्पिकीर्तिप्रथः । भूभारोद्धरणैकधीरभुजभृत् कुर्वन्ति यस्य द्विषो
१९
द्वन्द्वेऽत्युग्रशरप्रहारविधुरा देवाङ्गनानां मुदम् ॥ ११ ॥ [ शार्दूल० ]
दुग्धाम्भोधिभवत्तरङ्गविलसडिण्डीरलक्ष्मीमुषस्साम्याभावसमुत्थदर्पकलिता यत्कीत्तर्यः स्पर्द्धिनः ।
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अनुसन्धान ४५
चन्द्रस्याऽङ्कमृगस्य केवलमिमाः काङ्क्षन्ति नो कहिचित्
नेदीयःस्थितसिंहिकासुतभवन्नाशं मरुद्वर्त्मनि ॥१२॥ [शार्दूल०] क्षोणीशः प्रसरी सरद्गुणनिधिर्देदीयमानो मनो
भीष्टार्थं प्रणयिव्रजस्य सुख(ष)मां देधीयतेऽसौ चिरम् । यद्भूभङ्ग इह क्षितौ गुरुतुलां धत्ते सदा शिक्षि[तु?] -
मुन्मत्तक्षितिभृत्कुलं विनयितामज्ञातपूर्वां जवात् ॥१३॥ [शार्दूल०] सूनुः शाहिजिहान इत्यभिधया जेजेति यस्य स्फुटै
लॊकैर्भूतलगैर्विनिश्चितभविष्यद्राज्यभारो गुणैः । यस्य द्राक् करवाल एष फणभृत्मुख्यं गुरुं बाल्यतो,
निर्मायेव करे विराजति परप्राणैकवृत्तिं दधत् ॥१४॥ [शार्दूल०] व्योमाधीशमवेक्ष्य बुद्धिनिलयं मूर्तीश्वरत्वं गतं,
दृष्ट्वा चाऽसितसंयुतं गगनगं स्वर्भानुमादेशिभिः । यजन्मन्यभितः प्रमोदकरणे साम्राज्यमेकान्ततः,
सन्दिष्टं विनिशम्य लोकनिचया निश्चिन्वतेऽत्रैव तत् ॥१५॥ [शार्दूल०] यस्योद्यद्भुजवीर्यसंश्रुतिगलद्धैर्यस्य जम्भद्विषो,
भीत्या शून्यहृदोऽयमागत इहाऽथो किं विधेयं जवात् ? । इत्याकर्ण्य वचोनिगूढविषयं पार्वे निषण्णा शची,
भीता श्लिष्यति वेपमानकरणा स्वैरं प्रियं सद्मनि ॥१६॥ [शार्दूल०] यत्राऽभिषेणयति वर्मितवीरवारे,
__ वाहावलीपदखुरोद्धतधूलिवृन्दैः । व्याप्तैर्दिवं खलु दिवाऽपि तमां सृजद्भिः
खद्योततां दिनमणिर्बिभराम्बभूव ॥१७॥ [वसन्त०] आश्लिष्यन्नहितेन्दिरामवसनाः प्रौढारिकान्ता हसन,
दारिद्रं भुवि रोदयन् परगणे रक्षोवपुर्दर्शयन् । निष्कोशं रचयन् कृपाणमनयात्रं(त्र)स्यन् धरां रञ्जयन्,
द्विड्रक्तैर्बुधवाक्सु विस्मयमवन् शान्तीभवन्सेवके ॥१८॥ [शार्दूल०]
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निश्शेषोरुकलानिधिर्नवरसानाखण्डलाभीप्सितान्,
संसारद्रुमसस्यमेकसमयं य: स्फारयत्यञ्जसा । क्रामन् शाहिजिहानपुत्रमणिना तेनाऽसकृद्भूतलं,
जीयात् श्रीइसलामशाहिनृपतिः साहस्रचूडामणिः ।।१९।। [शार्दूल०] तस्याऽमात्यशिरोमणेः शुचिमतिप्रागल्भ्यकाव्यस्य ता,
आसपखान इति प्रसिद्धिमयत: कुर्वीत को न स्तुती: ? दिग्चक्रे विजितेऽपि यस्य सुभटाकीर्णे चतुर्भिः स्फुटो
पायैः सैन्यमिदं पिपति भुवनं शोभाकृते भूभृतः ॥२०॥ [शार्दूल०] किञ्च- श्रीमानूकेशवंशो विशदतररमाजन्मभूर्भासतेऽसौ,
तस्मिन् पद्मावसत्या जगति सुविदितः पद्मनामा बभूव । पद्मादेवीति विष्णोरिव समजनि सद्नेहिनी शुद्धशीला,
भास्वद्विश्वत्रयस्याप्युपकृतिचतुराधारतां बिभ्रतोऽस्य ॥२१॥ [स्रग्धरा] किञ्च- सूनुस्तयोः स(श)मधरो मधुरोचितश्री
श्चन्द्रेण यस्य मधुरो(रा?)ऽधिकमाबभासे । विस्मेरयत्कुवलयं कलितः कलाभि
ब्राह्मीव तस्य दयिता खलु जीवणीति ॥२२॥ [वसन्त०] पुत्रस्तयोः सहलुआ इति नामधेयो,
गेयो बभूव सुजनैः सुगुणैरमेय: । सद्बुद्धिवैभववितर्कितसत्प्रमेयः,
पाटीति तस्य दयिता गिरिजेव शम्भोः ॥२३॥ [वसन्त०] तन्नन्दनो हरपतिस्सुमनोऽभिनन्द्यः,
पूनाइरित्यभिधया विदिता सतीयम् । यं प्राप्य युक्तमसकृद्दयिता व्यराजत्,
सर्वत्र सर्वविबुधव्रजवन्दनीया ॥२४॥ [वसन्त०] तदेहजः समजनिष्ट गरिष्ठलक्ष्मी
र्वच्छाभिधो जगति लब्धशुभप्रतिष्ठः ।
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२२
यहिनी शुभसतीशतमौलिरत्नं ।
सा गोरदेरिति जगद्विदिता बभूव ॥ २५ ॥ [ वसन्त०]
जाग्रद्भाग्यनिधिः कृताखिलविधिः सत्प्रीतिकृत्सन्निधिः, शुभ्राचारविचारचारुकरणप्राप्तप्रतिष्ठास्पदम् ।
स्फूर्जत्कीर्तिगणः सहस्त्रकिरणः सूनुस्तयो: साधुराट्,
चित्कोशं प्रतिमागृहं च तुलया मुक्तं मुदा यो व्यधात् ||२६|| [शार्दूल० ]
तस्यादिमा कुंअरिरित्यभिख्या,
सोभागदेरित्यभिधा द्वितीया ।
पत्न्यावभूतां पुरुषोत्तमस्य,
रूपे इवाम्भोधिसमुद्भवायाः ||२७|| [ इन्द्रवज्रा ]
पूर्वेव पूर्वाऽजनि वर्धमानं,
प्रद्योतनं द्योतितभूमिपीठम् । गुणैर्वपुष्मन्तमिव द्वितीया
सोष्टाऽर्जुनांशुं भुवि शान्तिदासम् ॥२८॥ [ इन्द्रवज्रा ]
S
द्वौ भ्रातरौ तावसमौ समीक्ष्य, भाग्योदयै रञ्जितनागरौघौ ।
अनुसन्धान ४५
वितर्कयन्तीह जनाः पुनः क्षितौ,
मुदाऽवतीर्णौ किमु सीरिशाङ्गिणी ॥ २९ ॥ [ इन्द्रवज्रा ] किञ्च वीरमदेवी नाम्ना धाम्ना देवी च वर्द्धमानस्य । साधोस्तस्य बभूव, प्रिया षडेते च तत्पुत्राः ||३०|| [आर्या०]
पौरस्त्यौ (यो) वस्तुपालो भुवि सदुपकृती रायसिङ्घो द्वितीयः, स्फूर्जलक्ष्मीस्तृतीयः प्रथितगुणगणश्चन्द्रभाणः प्रतीतः । तुर्य: प्राप्तप्रतिष्ठो विजय इति तथा पञ्चमः सुन्दराख्यः,
षष्ठः कल्याणमल्लः कृतसुकृतधियो धर्मिषु प्राप्तरेखाः ||३१|| [स्रग्धरा ]
पौत्रौ च वस्तुपालस्य, पुत्रौ तस्याऽमितौजसा ।
अमीचन्द्र- लालचन्द्रौ, सूर्याचन्द्रमसौ यथा ॥३२॥ [ अनुष्टुप् ]
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क्षेत्रेषु सप्तसु सदा वपतः स्वसारं,
लक्षप्रमं कृपणदीनजनेषु चोच्चैः । यस्योद्भवोऽनुभवति प्रविलासिकीर्त्या,
शुभ्रीकृतत्रिभुवनस्य फलेग्रहित्वम् ॥३३॥ [वसन्त०] आराध्नोति प्रकामं प्रथितगुणगण: पौषधैः पञ्चपर्वी,
कुर्वन् ब्रह्मव्रतेन स्वममलकिरणं सर्वसच्चित्तवर्जी । बिभ्रत्सम्यक्त्वरम्यारुणगणित(१२)लसद्धामगेहिव्रतानि,
प्रोच्चैर्यो वर्द्धमानः स जयतु सततं श्रीनिवासैकभूमिः ॥३४॥ [स्रग्धरा] शान्तिदासगृहिणी रमणीया-नामतोऽपि विशदा भुवि रूपा ।
सूनुरद्भूतगुणोदधिरासी-न्मूर्तभाग्यनिधिवत्पनजीकः ॥३५॥ [स्वागता] तस्य शस्य कुमुदोज्ज्वलकीर्तेः, प्रस्फुरद्विनयमञ्जुलमूर्तेः ।
देवकीति दयिता दलिताघा, सद्विवेककलितान्तरभावा ॥३६॥ [स्वागता] धत्से सखे ! मनसि किं कलिकालचिन्तां,
रे दुःषमे ! किमु दधासि च दु:खितां त्वम् । विघ्ना भयं व्रजथ किं ? ननु किं न वेत्सि ?, ___ जातोऽस्मदुन्नतिहरो भुवि शान्तिदासः ॥३७॥ [वसन्त०] गुणिनि गुणज्ञे गुणवति, दानिनि मानिनि च वैरिणां सदसि ।
कृतकृतयुगचरितेऽस्मिन्, कलिकालः कालवदनोऽभूत् ॥३८॥ [आर्या] प्राप्तः स वणिज्यायै, स्याहपुरेऽचीकरत् कनडदेशे ।
श्रीहीरविजयसूरेः, सपादुकं स्तूपमिभरस [१६६८]मितेऽब्दे ॥३९।। गीतिः श्रीशत्रुञ्जयतीर्थे, मूलार्चा परिकरं महसनाथम् ।
यः प्रत्यतिष्ठिपदति-प्रमदान्नन्दतु [१६६९]गणितेऽब्दे ॥४०॥ गीतिः बाणाश्वराज [१६७५] मितविक्रमवत्सरेऽलं,
यात्रां विशुद्धविधि सिद्धगिरेविधाय । सार्द्धं सुसङ्घनिकरैर्भरतेशवद्यो,
द्रव्यव्ययेन भुवि सङ्घपतिर्बभूव ॥४१॥ [वसन्त०]
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२४
अनुसन्धान ४५
य: सौभाग्यनिधिः क्षितीशसदसि प्राप्तप्रतिष्ठोऽन्वहं,
मत्तानेकप-चञ्चलाश्वविलसद्राजप्रसादोल्वणः । निःशेषाङ्गिसमूहदुःखविलयस्फूर्जत्सुखं(ख)प्रापणो
धुक्तोऽसौ जयताच्चिरादहिमदावादोल्लसद्भूषणम् ॥४२॥ [शार्दूल०] शान्तिदासस्य जयतात्, कोऽपि शौर्यार्णवो नवः ।
मिथ्यात्वौर्वानलबलं, शमयत्यैष यत्कलौ ॥४३॥ [अनुष्टुप्] . किञ्च- सन्निधौ शान्तिदासस्य, सर्वकार्यधुरन्धरौ ।
वाघजी-कल्याणसझौ, जीयास्तां साधुसिन्धुरौ ॥४४॥ [अनुष्टुप्] किञ्च- इभतुरगनृप[१६७८] मितेऽब्दे, प्राप्ताभ्यां भाग्यवत्परमकाष्ठाम् । .
साक्षाच्चतुर्दिगागत-विभवैर्द्ध(ध)नदायमानाभ्याम् ||४५|| [आर्या] सश्रद्धवर्धमान-श्रद्धाकमनीयशान्तिदासाभ्याम् ।
सुकुटुम्बाभ्यां ताभ्यां, गृहद्भ्यां सम्यगुपदेशम् ॥४६।। [आर्या] व्याख्यासुधोदधीनां, पवित्रचारित्रचारुचरितानाम् ।
अवदातबुद्धिबेडा-तीर्णागमतोयराशीनाम् ॥४७॥ [आर्या] छात्रीकृतधिषणानां श्रीश्रीसौभाग्यसद्गुरुवराणाम् ।
मुखकमलात्केसरमिव, सुवर्णरुचिरं मनःप्रीत्या ॥४८॥ [आर्या] श्रुत्वा विहारनिर्मिति-सम्भवफलनिकरसङ्गमोत्कर्षम् ।
बीबीपुरगृह्यायां प्रासादः कारयामासे ॥४९॥ पञ्चभिः कुलकम् [आर्या] यस्मिस्तोरणपुत्रिका अनुकृतस्व:सुन्दरीविभ्रमाः,
के के न स्पृहयन्ति वीक्ष्य जनिताशंसा भुवि?(व?)श्शर्मणे । द्वारे यस्य च पञ्चपत्रमतुलं प्रासादरक्षाविधौ,
___ दक्षं भाति चतुश्चतुष्ककलिते देवद्रुकल्पं कलौ ॥५०॥ [शार्दूल०] उच्चैः सोपानपङ्क्तिः शिवगतिगमनं प्राणिनां व्यञ्जयन्ती,
साक्षात् श्रीपार्श्वभर्तुश्चरणसरसिजद्वन्द्वसेवापराणाम् । यस्य प्रारब्धसङ्गीतकनिकरलसद्वामपाञ्चालिकाली
च्छाच्छनाप्सरोभि शमुपदिशत: स्वर्गसद्वर्णिकां द्राक् ॥५१॥ [स्रग्धरा]
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२५
आद्योऽसौ मेघनादस्तत इह विदितः सिंहनादो द्वितीयः,
सूर्यान्नादस्तृतीयो विशदतररमो रङ्गनामा तुरीयः । खेलाख्यः पञ्चमोऽयं तदनु च गदितो गूढगोत्रेण षष्ठो, यत्रे(त्रै)ते मण्डपाः षट् वसतय इव सद्धर्मभूभृद्गुणानाम् ।।५२।।
[स्रग्धरा] प्रासादो जिनसद्मभिः प्रविलसत्शृङ्गैर्द्विपञ्चाशता,
व्याप्तश्चारुचतुर्मुखार्हतगृहैर्युक्तश्चतुर्भिस्तथा । तावद्भिर्धरणीगृहैर्जिनबृहदिम्बान्वितैश्चोल्बणः,
सामन्तादिभिरावृतो नृप इव स्वैरं स्थितः संसदि ।।५३॥ [शार्दूल०] भातोऽर्हत्प्रतिमाभिः प्रत्येकं यस्य देवकुलिकाभिः ।।
अभ्रंलिहशिखराम्रौ वृतौ विहारौ चतुर्मुखौ शश्वत् ॥५४॥ गीतिः द्विरदारूढौ दानं, ददतौ कस्य न मुदे विहारकृतोः ।
जनकः सहस्रकिरणो वाछानामा पितामहश्चोभौ ॥५५|| गीतिः विन्ध्यो लक्ष्म्याऽतिवन्धोऽनिमिषगिरिरसौ नो गुरुर्न त्रिकूटः,
प्रोच्चैः कूटस्तुषाराचल उपल इव भ्रस्यदाभः सुनाभः । कैलासोऽसद्विलासो भवति नयनसत्प्रीतिदेऽस्मिन् विहारे, मध्याह्नेऽशोस्तुरङ्गा यमिव सपदि नो द्रष्टुकामा व्रजन्ति ? ॥५६।।
[स्रग्धरा] कुर्वाणोऽसुमतां सदाऽनिमिषतां द्रष्टुं समागच्छता(तां),
तन्वानोऽमृतसङ्गमाद्भुतसुखानाराधकानङ्गिनः । शङ्के निर्जरयानतो दलगणं सङ्गृह्य यन्निर्मितः, प्रासादः प्रसरत्प्रभः समभवत् तदाग् [तद् द्राग्] विमानं ततः ॥५७॥
[शार्दूल०] किञ्च- प्रासादनिर्मापणजातभाग्य-प्रकर्षसम्भूतसमृद्धिभाजः । श्रीशान्तिदासस्य महप्रधाना वर्तन्त एते दिवसास्समन्तात् ।।५८||
[इन्द्रवज्रा]
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२६
तथा हि- अप्युत्काऽखिलदोषलेशरहितं प्राणातिपाताङ्कितं, स्वीकृत्याऽभयदं कलङ्कयदिदं मिथ्यात्वमुत्सपि तत् । विश्वेऽसौ तृणवद्धि (द्विवेच्य कृतिनां धुर्यो मुदा वर्द्धयाञ्चक्रेऽह्नाय कुमारपालनृपवत् सद्धर्मसस्यं स्फुरत् ॥५९॥ [ शार्दूल० ]
यः प्रत्यतिष्ठिपदलं शतशोऽथ बिम्बैः, श्रेयांसबिम्बमसमं सममुन्नताङ्गैः । श्रीमन्महैः करकरिक्षितिभृन्मितेऽब्दे (१६८२). श्रीमुक्तिसागरसदाह्वयवाचकेन्द्रैः ||६०॥ [ वसन्त० ]
लोकैर्योऽकाम पूर्वं चिदमलगणकैश्चोपदिष्टः प्रसिद्धं, साम्राज्यायाऽभिलाषं वचनमथ मुदा सत्यतां नेतुमेषाम् । बिभ्रद्राज्यं स वर्षे युगवसुरसभू (१६८४) सम्मिते शाजिहानः, कर्यश्वादिप्रसादं प्रणयति सततं शान्तिदासस्य यस्य ॥ ६१ ॥ [ स्रग्धरा ] अस्य कपूरानाम्ना, प्रासूत च रत्नजीति सुतरत्नम् ।
अपरा पत्नी रसवसुनृपति (१६८६) मितेऽब्दे यसा परमम् ॥६२॥ [ आर्या ] श्रीमुक्तिसागराख्यान्, वाचकमुख्यान् रसेभनृप ( १६८६ ) सङ्ख्ये । अब्दे गणाधिपपदे, महामहैः स्थापयामास ||६३|| [आर्या ] अस्याऽऽज्ञयाऽतिचतुरो, दानी ज्ञानी च वस्तुपालाख्यः ।
श्रीराजसागरा इति विदिताऽभिधयात्मजो भ्रातुः ||६४ || [ आर्या ]
सप्ताशीति(८७)मिताब्दसम्भवबलप्रोज्जृम्भमाणप्रथं,
नानादेशदरिद्रदीनजनतान्नादिप्रदानायुधैः ।
सत्रागाररणाङ्गणे निहतवान् दुर्भिक्षविश्वद्विषं,
श्रीमद्गुर्जरमण्डनं स जयति श्रीशान्तिदासो भटः ||६५ ॥ [ शार्दूल० ]
व्योमाङ्कभूप (१६९०) मितविक्रमवत्सरेऽलं,
यात्रां विधाय सुकृती विमलाचलस्य ।
योऽदीदिपत् पुनरपि द्रविणव्ययेन,
अनुसन्धान ४५
सत्कृत्य सङ्घमुरुसङ्घपतेर्ललाम ||६६ || [ वसन्त०]
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सप्टेम्बर २००८
२७
पादविहारप्रमुखै रामाङ्करसक्षिति(१६९३)प्रमितवर्षे ।
विधिभिरकार्षीद् विधिवित्, सङ्घयुतः सिद्धगिरियात्राम् ॥६७॥ [आर्या विशिखाङ्कनृप(१६९५)मितेऽब्दे, पुत्रं कर्पूरचन्द्रनामानम् ।
अस्य तृतीया पत्नी, फूला नाम्ना प्रसूतवती ||६८॥ [आर्या] अश्वाङ्कनृप(१६९७)मितेऽब्दे, वाछीनाम्ना सधर्मिणी तुर्या ।
अस्य निधानं भूरिव, लक्ष्मीचन्द्राभिधं सुषुवे ||६९।। [आर्या] आश्लिष्टवद्भ्यामन्योन्यं, धर्मं पोपोष्टि यस्सदा ।
द्रव्यभावस्तवाभ्यां स, शान्तिदासो जयत्वयम् ॥७०] [अनुष्टुप्] किञ्च-श्रीवीरशासनसरित्पतिपार्वणेन्दु
य॑स्मेरयत्कुवलयं गणभृत्सुधर्मा । जम्बूप्रभुस्तदनु भानुरिवाऽऽबभासे,
व्याकोशयन् भविकुशेशयकाननानि, ॥७१॥ [वसन्त०] तत्पट्टपुष्करविभासनभानुभासः(सा:),
सूरीश्वरा भुवि बभूवुरुदारवृत्ताः । यैर्लेभिरे गुणगणैः किल कोटिकाद्या,
गच्छस्य चन्द्रविशदस्य चिराय सज्ञा ॥७२।। [वसन्त०] क्रमाज्जगच्चन्द्रगुरूत्तमा बभु
बृहद्गणाकाशसहस्ररश्मयः । येऽब्दे तपोभिः खगजांशु(१२८५)सम्मिते,
तपा इतीयुबिरुदं सुदुःक(क)रैः ।।७३।। [उपजाति] जातेषु बहुषु सूरिषु, बभूवुरानन्दविमलसूरीन्द्राः ।
चक्रे यैः करकरितिथि (१५८२)-मितवर्षे सत्क्रियोद्धारः ।।७४|| [आर्या तेषां पट्टे रेजुः श्रीमन्तो विज[य] दानसूरीशाः ।
प्रतिवज्रमुने यो विद्युतिरे ज्ञानलक्ष्म्या ये ॥७५।। [आर्या] तेषां पट्टप्राग्गिरि-रवयः श्रीहीरविजयसूरिवराः ।
येषां गुणान् निरीक्ष्य श्रद(द)धुर्गौतमगुणांस्तथ्यान् ॥७६।। [आर्या]
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अनुसन्धान ४५
तेऽकब्बरक्षितिपति प्रतिबोध्य जीवा
ऽमारिप्रवर्तनमजस्रमचीकरन् द्राक् । सिद्धाद्रिरैवतकभूधकरोरुमुक्ति,
भूस्पृक्सुखाय जिजिआकरमोचनं च ७७॥ [वसन्त] तेषां पट्टसरोजा-दित्याः श्रीविजयसेनसूरीन्द्राः ।
षट्ती लक्ष्मीरिव, चिक्रीड यदाननसरोजे ॥७८।। [आर्या] परमां रेखां प्राप्ता, यथार्थवादिषु सदा बभुर्गुरवः ।
ये जित्वा नृपसदसि, प्रवादिनः सार्ववाचमदिदीपन् १७१॥ [आर्या] तेषां पट्टे सम्प्रति राजन्ते राजसागराचार्याः ।
ये सर्वेषां सुविहित-साधूनां दधति साम्राज्यम् ॥८०॥ [आर्या] स्फुरच्चक्रप्रख्यं हरय इव सर्वज्ञशतकं,
करे कृत्वाऽजय्यं विबुधगणसेव्यं प्रणयत: । अनादृत्याऽभाग्यात् स्थितमिह हि मिथ्यात्वमहितं,
ममन्थुर्ये तेऽमी सकलसुखदाः सन्तु भुवने ॥८१॥ [शिखरिणी] श्रीराजसागराभिध-सूरीशानां सदा विजयिराज्ये ।
श्रीशान्तिदास-सङ्घ-प्रभुः श्रिया वर्द्धतां सुकृती ॥८२।। [आर्या] किञ्च - अङ्गान्युल्बणवेपथूनि सहसा भ्राम्यन्ति नेत्राणि य
नामाकर्णनजाद्भयात् प्रतिकलं मुह्यन्ति चेतांसि च । जायन्ते द्विषतां स गूर्जरधराधीशत्वमुज्जृम्भयन्,
भूमानाजमखान एष जयतान्यायैकनिष्ठो भुवि ।।८३।। [शार्दूल] किञ्च-चक्रे विहारं वसुधैकसारं, स वीरपालाभिधवर्द्धकोशः । यत्शिल्पमाकर्ण्य सुपर्वतक्षा, वसुन्धरामेति न लज्जयेव ॥८४||
[उपजाति] किञ्च-श्रीसौभाग्याभिधानामकृत कृतधियां सद्विहारप्रशस्ति,
शिष्यो वर्षेऽद्रिनन्दक्षितिप(१६९७)परिमिते सत्यसौभाग्य एताम् ।
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सप्टेम्बर २००८
येषां मन्दोऽपि लब्ध्वा जयति समदहद्वादिवृन्दान् प्रसाद,
ध्वस्ताऽशेषद्युसद्मक्षितिरुहसुमनोरत्नजाग्रत्प्रभावम् ॥८५॥ [स्रग्धरा] जम्बूद्वीपसरोरुहे सुरगिरिः सत्कणिकाभां दधद्,
हंसादीन् भ्रमयत्यभीक्ष्णमभितो यावत् श्रिया लोभयन् । तावत् शिष्टजनैः प्रसन्नहृदयैर्वावाच्यमाना क्रियात्,
श्रीचिन्तामणिपार्श्वनाथभुवनोद्भूता प्रशस्ति: शुभम् ॥८६॥ [शार्दूल०]
॥ इति श्रीवृद्धशाखीय उकेशज्ञातीय सा० (श्रावक) श्रीवर्द्धमान सा०
(श्रावक) श्रीशान्तिदासकारित...... ||
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मुम्बई-३
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________________ सप्टेम्बर 2008 17 (7) तेमणे लखेल 'उपदेशमाळा-बालावबोध'नी प्रत मळे छे. (8) सं. 1787 मां पाटणमां तेमणे 'अगडदत्त ऋषिनी चोपाई' बनावी छे. (4) भायखला-शेठ मोतीशाहे बनावेल आदीश्वर जिनालयना परिसरमा आवेल दादावाडीमां देरी नं.३मां सं. 1840 वर्षे महा सु. 13 बुधवारे प्रतिष्ठित थयेल 'पुण्यसागरसूरिजी'नी पादुका छे. तेनो लेख नीचे मुजब छे : 'सं. 1840 वर्षे माह सुदि 13 शने (तेरसने) वार बुधे महमई बींदरे भट्टारक श्रीपुण्यसागरसू. समस्त प्रतिष्ठितम् / सत्यसौभाग्यकर्ताओ प्रशस्तिमां श्लो. 48 अने श्लो. 85 मां पोताना गुरुर्नु नाम 'श्रीसौभाग्य' जणाव्युं छे. ते कोण हता, कोना शिष्य हता? ते जाणवा मळतुं नथी. वळी जैन गुर्जरकविओ भा. 4-253, 304 उपर कर्तानो परिचय आपता तेमने 'कल्याणसागर'ना शिष्य जणाव्या छे. तेथी कर्ता अने अनी गुरुपरम्पराशिष्यपरम्परा विषे वधु संशोधन करवू पडे ओम लागे छे. 'सं. 1687 मां सर्वज्ञशतक-सटीक प्रमाणिक छे के नहीं ? - आ बाबतमां राजसभामा जाहेर शास्त्रार्थ करवानी वात आवी त्यारे आ. राजसागरसूरिजीओ पोताना पक्ष तरफथी शास्त्रार्थ करवा माटे पं. सत्यसौभाग्यगणिने नियुक्त कर्या हता.' [जैन परं. इति भा.३ पृ. 746] प्रतिपरिचय सूरत-नेमि-विज्ञान-कस्तूरसूरि ज्ञानभण्डारमा झेरोक्ष रूपे सचवायेल संवेगी उपाश्रय (हाज पटेलनी पोळ)नी आ प्रत छे. 8 पाना छे. लेखनप्रशस्ति (पुष्यिका)नुं पार्नु नथी. दरेक पानामां लगभग 11 लीटीओ अने 30-35 अक्षर छे. पडिमात्रामां लखायेल आ प्रतिना अक्षर सुवाच्य छे. लेखके ग्रन्थ प्रारम्भमा नमस्कार वखते पोताना गुरु सत्यसौभाग्यगणिने नमस्कार कर्या छे. तेथी कही शकाय के तेमना शिष्य परिवारमांथी कोई आ प्रत लखी हशे. अथवा प्रतनी पुष्पिका सम्पूर्ण मळे तो तेनो निर्णय थइ शके.