Book Title: Sugandhdashmi Katha
Author(s): Hiralal Jain
Publisher: Bharatiya Gyanpith
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९६]
सुगन्धदशमीकथा जाए णं तहारूवे साहू ववरोविए उच्चावयाहिं अक्कोसणाहिं अक्कोसति उद्धंसेंति निभछेति निच्छोडेलि तज्जेंति तालेति सयाओ गिहाओ निच्छुभंति ।।
तारण सा नागसिरी सयाओ गिहाओ निन्दा समाणी चंपाए नयरोए सिंघाडगतिय-चउक्क-चच्चर-चउम्मुह-महापहपहेमु बहुजणेणं हीलिजमाणी खिसिजमाणी निंदिनमाणी गरहिजमाणी तिजिजमाणी पव्व हिजमाणी धिक्कारिन्नमाणी थुक्कारिजमाणी कत्थइ ठाप्यं वा निलयं बा अलभमाणी दंडीखंडनिबसाया खंडमल्लय-खंउघडग इत्थगया '
फुड्डाछ सीसा मच्छियचडगरेणं अन्निज्जमाणमग्गा गिह गिहेणं देहवलियाण बित्ति कायेमाणा विहरइ । तए पं तीसे नागसिरीए तब्भवसि चेव सोलस रोयायंका पाउरभूया। तं जहा-सासे कासे जोणिसूले जरे दाहे कुच्छिमूले भगंदरे अरिसए अजीरए दि हिसूले मुद्भसूले अक्रारिए अच्छिवेयणा कपणवेयणा कण्डुप, कोढे य ।
तए णं सा नागसिरी सोलसहि रोगायंकेहिं अभिभूया समाणी अट्टदुहवसट्टा कालमासे कालं किच्चा छट्ठीण पुढवीए नेरइएसु उववन्ना। तओ अतरं उट्टित्ता मच्छेसु उबवन्ना। तत्थ णं सत्थवज्झा दावकंतीए कालमासे कालं किच्चा अहेसत्तमाप पुढवीए उपवन्ना । तओणंतरं ऊबट्टित्ता होच्च पि मच्छेसु उववज्जइ । दोच्चं पि अहे सत्तमाप पुढवीए तओहितो तच्च पि मच्छेसु दोच्चं पि छहीप पुढ बीए तओ उरगेसु तओ जाई इमाई खयरविहाणाई अदुत्तरं च णं खर-बायर पुढविकाइयत्ताए वेसु अणेगसयसहस्सखुत्तो।
सा गं तओणंतर उठवट्टित्ता इहेव जंबुद्दीवे दीवे भारहे वासे चंपाए नयरीए सागरदत्तस्स सत्यवाहस्स अदाए भारियाए कुच्छिसि दारिअत्ताए पन्चायाया। अम्मापियरो नामघज्ज करेंति सूमालिय त्ति । सा उम्मुक्कबालभावा रूपेण य जोहवणेण य लावणेण य उक्किट्ठा होत्था।
तए णं से जिणदप्से सत्थयाहे अन्नया कयाइ सागरदत्तस्स सस्थवाहस्स अदूरसामंतेणं वीईवयइ सूमालियं वारियं पासइ दारियाए रूवे य जायविम्हए जेणेव सागरदत्तस्स गिद्दे तेणेव उवागए सागरदत्तं एवं बयासी-एवं खलु अहं देवाणुपिया तव धूयं सूमालियं मम पुत्तस्स सागरस्स भारियत्ताए घरेमि । तए णं से सागरदत्ते जिणदत्तं एवं वयासीएवं खलु देवाणुप्पिया सूमालिया दारिया एगजाया इट्ठा । तं नो खलु अहं इच्छामि खणमवि विप्पओगं । तं जइ सागरए दारए मम घरजामाउए भवइ तो णं दलयामि । तए णं जिणदत्ते अन्नया कयाइ सोहसि तिहिकरणे अग्गिहोमं करावेइ सागरं दारयं सूमालियाए दारियाए पाणि गेपहावेइ।
__ तए णं सागरए सूमालियाए सद्धि तलमंसि निवज्जइ एयारूवं अंगफासं पण्डिसंवेदेइ जहानामए असिपत्ते । तए णं से सूमालियं दारियं सुहपसुत्तं जाणित्ता सयणिजाओ उट्टेइ वासघरस्स दारं विहाडे भारामुक्के विष काय जामेय दिसि पाउभूए तामेव दिसिं पड़िगए । सागरदरी दासचेडीए अंतिए एयम सोच्चा निसम्म आसुरुत्ते मिसिमिसेमाणे जिणदत्तस्स गिहे उवागच्छद जिणदत्तं एवं वयासी-किनं देवाणुप्पिया एवं जुत्तं वा पत्तं का कुलाणुरूयं वा ? जिणदत्ते सागरं दारयं एवं क्यासी-दुट तु णं पुत्ता तुमे कयं सागरदत्तस्स गिहाओ इहं हवमागच्छंतेणं । तं गच्छह णे तुम पुत्ता एवमवि गए सागरदत्तस्स गिहे । तए णं से सागरए एवं वयासी-अवियाई अहं ताओ गिरिपडणं वा तरुपडणं वा मरुप्पवायं या जलप्पत्रायं वा जलणप्पवेसं षा विसभक्खणं वा सत्थोबाडणं चा विहाणसं जा गिद्धपद

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