Book Title: Sramana 2000 01
Author(s): Shivprasad
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 216
________________ २०७ जिनों की चौबीस पूजाओं के रचयिता के रूप में दिगम्बर जैन परम्परा में विख्यात हैं। उन्हीं द्वारा विरचित प्रस्तुत कृति छन्दशतक एक लघुकाय किन्तु महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसमें छन्दों की निर्माण विधि के साथ-साथ अनेक महत्त्वपूर्ण छन्दों को स्वरचित उदाहरणों के माध्यम से समझाया गया है। यह पुस्तक श्री जमनालाल जैन द्वारा सम्पादित होकर १९४८ ई० में मानखेट जैन संस्थान से प्रकाशित हुई थी। पुस्तक के प्रारम्भ में स्वनामधन्य स्व० डॉ० हीरालाल जैन द्वारा लिखित प्रस्तावना और श्री जमनालाल जी द्वारा लिखित वृन्दावनदास जी का जीवन परिचय अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। प्रस्तुत पुस्तक न केवल भक्तजनों बल्कि इतिहासज्ञों और साहित्यरसिकों के लिये भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होने से प्रत्येक पुस्तकालयों के लिये संग्रहणीय है। ऐसे सुन्दर एवं महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ को अत्यन्त अल्प मूल्य पर उपलब्ध कराने के लिये भी सम्पादक एवं प्रकाशक दोनों ही अभिनन्दनीय हैं। पर्यों की परिक्रमा, आचार्य श्री देवेन्द्रमुनि जी शास्त्री, प्रकाशक- श्री तारक गुरु जैन ग्रन्थालय, गुरु पुष्कर मार्ग, उदयपुर ३१३००१, प्रकाशन वर्ष १९९९ ई०, पृष्ठ ११+२५५, आकार-डिमाई, पक्की बाइंडिंग, मूल्य १०० रुपये। प्रस्तुत पुस्तक श्रमण संघ के तृतीय पट्टधर स्व० आचार्य देवेन्द्रमुनि जी शास्त्री द्वारा विभिन्न पर्वो के अवसर पर दिये गये २१ प्रवचनों का संकलन है। ये प्रवचन बहुत ही सरल और जीवनस्पर्शी हैं। जीवन की समस्याओं को स्पर्श कर समाज के वातावरण को झकझोरने की इनमें अद्भुत क्षमता है। अपने प्रवचनों में आचार्यश्री प्रतीकात्मक प्रेरणाओं के माध्यम से जनसामान्य को गूढ़तम तथ्य सहज ही प्रस्तुत करते रहे हैं। इस पुस्तक में वैचारिक सामग्री अधिक और कथाप्रसंग अपेक्षाकृत कम हैं। पर्यों की प्रेरणा पर इसमें बहुत बल दिया गया है। आज पर्वो को जीवन में आमोद-प्रमोद का माध्यम मान लिया गया है जबकि इनके मूल में जीवन परिष्कार व जीवन संस्कार की प्रेरणा निहित है। इसी दृष्टि से यह पुस्तक संकलित की गयी है। इसके दो भाग हैं। प्रथम भाग में आध्यात्मिक पर्वो– पर्युषण, संवत्सरी, ज्ञानपञ्चमी, अक्षयतृतीया आदि पर कुल १० निबन्ध हैं। द्वितीय भाग में रक्षाबन्धन, श्राद्ध, विजयादशमी, दीपावली, वसन्तपञ्चमी, होली आदि की चर्चा में २१ निबन्ध दिये गये हैं। पुस्तक की साज-सज्जा अत्यन्त आकर्षक तथा मुद्रण सुस्पष्ट और त्रुटिरहित है। यह पुस्तक शोधार्थिर्यों एवं जनसामान्य दोनों के लिये समान रूप से उपयोगी है। आचार्य श्री द्वारा विभिन्न पर्यों पर दिये गये प्रवचनों को पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित कर प्रकाशक संस्था ने जनसामान्य का उपकार किया है। इस पुस्तक का महत्त्व इसलिये भी है कि यह सम्भवत: आचार्यश्री की अन्तिम पुस्तक है। प्रतिष्ठारलाकर प्रणेता- पं० गुलाबचन्द्र ‘पुष्प', सम्पा०-५० दरबारी लाल कोठिया एवं ब्रह्मचारी जय 'निशांत', प्रकाशक-प्रीत विहार जैन समाज (रजि.), Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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