Book Title: Sirisiriwal Kaha Part 01
Author(s): Ratnashekharsuri, Bhanuchandravijay
Publisher: Yashendu Prakashan

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Page 192
________________ सिरिसिरि // 91 // वालकहा सुरपिच्छणयसरिच्छं तं पिच्छणयं पलोइऊण खणं / चिंतइ एस इमाए लीलाए कोवि रायसुओ // 484 // थकमि नाडए सो पुट्ठो कुमरेण कोऽसि भद्द ! तुमं ? / कत्थ पुरे तुह वासो ? दिदं अच्छेरयं किंपि ? // 485 / / सो जंपइ विणयपरो कुमरं पइ देव ! इत्य दीवमि / / सेलोत्थि रयणसाणु वलयागारेण गुरुसिहरो // 486 // इत्यर्थः, पुनः विनयपरो-नम्रताकरणतत्परः तथा विश्वस्तः-सुस्थचित्तः एवंविधः सन् कुमारपार्श्वे उपविष्टः॥४८३॥ सुरप्रेक्षणकेन-देवनाटकेन सदृशं तत्प्रेक्षणकं-नृत्यं क्षणं यावत् प्रलोक्य-दृष्ट्वा चिन्तयति-विचारयति, अनया, लीलया एष कोऽपि राजसुतोऽस्ति // 484 // अथ नाटके पूर्णीभूते सति स पुरुषः कुमारेण पृष्टः-हे भद्र ! त्वं कोऽसि ? कुत्र पुरे तव वासो-निजवासोऽस्ति, तथा किमपि आश्चर्य दृष्ट चेत्कथयेति भावः॥ 485 // द एवं कुमारेण पृष्टे सति स पुमान् विनयपरः सन् कुमारं प्रति जल्पति-कथयति, हे देव !-हे महाराज ! अत्र अस्मिन् द्वीपे वलयाकारेण-कटकाकृत्या रत्नसानुर्नाम शैल:-पर्वतोऽस्ति, कीदृशः? गुरूणि-महान्ति शिखराणि यस्य स गुरुशिखरः // 486 // ४८४-अत्र तदीयनाटके देवनाटकसादृश्यवर्णनादुपमालङ्कारः / ४८५-४८६-स्पष्टे /

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