Book Title: Sirisiriwal Kaha Part 01
Author(s): Ratnashekharsuri, Bhanuchandravijay
Publisher: Yashendu Prakashan
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________________ 2.5 सो वंदिऊण देवे उवविहो जाव ताव तं नमिउं / उवविद्येसु निवाइसु चारणसमणो कहइ धम्मं // 558 // भो भो महाणुभावा ! सम्मं धम्मं करेह जिणकहियं / जइ वंछह कल्लाणं इहलोए तहय परलोए / 159 // धम्मो जिणेहिं कहिओ तत्ततिगाराहणामओ रम्मो / तत्सतिगं पुण भणिअं देवो अ गुरू अ धम्मो अ॥५६०॥ शमार्गेणाजगाम // 557 / / सः-चारणलब्धिमान् साधुर्देवान् वन्दित्वा यावत् उपविष्टस्तावत् तं साधुं नत्वा नृपादिषु उपविष्टेषु सत्सु चारणश्रमणो नृपादीनां पुरस्तात् धर्म कथयति // 558 // महान् अनुभावः--प्रभावो येषां ते म० भो भा महानुभावा ! यूयं जिनः कथितं धर्म सम्यक कुरुत, यदि इह लोके-अस्मिन् भवे तथा च परलोके-परभवे कल्याणं वाञ्छत / / 559 // जिनैस्तत्त्वत्रिकस्य आराधनाय स्वरूपमस्येति तत्वत्रिकाराधनामयो रम्यो-मनोज्ञो धर्मः कथितः, तत्व हा त्रिकं पुनर्भणितं देवश्च गुरुश्च धर्मश्च-देवतत्त्वं 1 गुरुतत्वं 2 धर्मतत्त्वं 3 चेत्यर्थः // 560 // तु पुनः एकैकस्य ___558-559- स्पष्टे / 560- अत्र धर्मस्य तत्तत्रिकाराधनमयत्वे रम्यत्वकथनात् , देवगुरुधर्माख्यानि त्रीणि तत्त्वानि सर्वत आराधनीयानीति प्रतीयते /

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