Book Title: Sirisiriwal Kaha Part 01
Author(s): Ratnashekharsuri, Bhanuchandravijay
Publisher: Yashendu Prakashan

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Page 229
________________ एवं चेव कहतो संपत्तो मुणिवरो गयणमग्गे। लोओ अ सप्पमोओ जाओ नरनाहपामुक्खो // 582 // तकालं चिअ कुमरस्स तस्स दाऊण मयणमंजूसं / काऊण य सामग्गिं सयलंपि विवाहपव्वस्स // 583 // तस्स भवणस्स पुरओ मिलिए सयलंमि नयरलोमि / . महया महेण रन्ना पाणिग्गहणंपि कारवियं // 584 // एवं कथयन्नेव मुनिवरो गगनमार्गे-आकाशमार्गे सम्प्राप्तः नरनाथप्रमुखो-राजादिको लोकश्च सह प्रमोदेन-हर्षेण वर्तते इति सप्रमोदो-हर्षवान् जातः // 582 // ततो राज्ञा तत्कालमेव तस्मै कुमाराय मदनमञ्जूषां स्वकन्यां दत्त्वा च पुनः विवाहपर्वणो-विवाहोत्सवस्य सकलां समस्तामपि सामग्रीम् कृत्वा // 583 // तस्य जिनभवनस्य पुरतः-अग्रतः सकलेऽपि नगरलोके मिलिते सति महता महेन-उत्सवेन पाणिग्रहणमपि कारितम् / / 584 // ५८२-मुनिवरस्य गगनमार्गप्राप्त्या दिव्यशक्तिः सूचिता / ५८३-अत्र " दाऊण" इति दानार्थकधातुयोगे प्राप्तापि चतुर्थी न भवति, प्राकृते षष्ठयश्चतुर्थी विधानात् / ५८४-अत्र "तस्स भवणस्स" इत्यत्र स्स शब्दस्य सदावृत्त्या च्छेकानुप्रासः / है

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