Book Title: Sirisiriwal Kaha Part 01
Author(s): Ratnashekharsuri, Bhanuchandravijay
Publisher: Yashendu Prakashan
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________________ सिरिसिरि वालकहा देवो अ वीयराओ नेवं रूसेइ कहवि किंतु इमं / जिणभवणाहिट्ठायगकयमपसायं मुणसु वच्छे ! // 512 // तत्तो नरेहिं आणाविऊण बलिकुसुमचंदणाईयं / कप्पूरागुरुमयनाहिधूवरूवं च वरभोगं // 513 // राया धूयाइजुओ धृवकडुच्छेहिं कुणइ भोगविहिं / निम्मलचित्तो निचलगत्तो तत्थेव उवविट्ठो // 514 // यामि-चिन्तयामीत्यर्थः॥ 511 // देवश्च वीतराग एवं कथमपि न रुष्यति न रोपं प्राप्नोति, किन्तु हे वत्से ! जिनभवनस्य अधिष्ठायको यो देवस्तेन कृतं अप्रसाद-अप्रसन्नत्वं मुण-जानीहि // 512 // ततः-तदनन्तरं वलये-पूजानिमित्तं कुसुमचन्दनादिकं नरेभ्यः-सेवकलोकेभ्यः आनाय्य च पुनः कर्पूरागुरुमृगनाभीनां-घनसारागरुकस्तूरीणां यो धूपस्तद्रूपं-तत्स्वरूपं वर-प्रधानं भोग--देवयोग्यं द्रव्यं-आनाय्य // 513 ॥राजा पुत्र्या युतः-सहितो धूपकडुच्छर्भोगविधि- धूपदानादिविधिं करोति, कीदृशः सन् ?--निम्मलं ५१२-भगवतस्तीर्थकृतो वीतरागत्वात् तस्य अपराधे न रोषो भक्तो वा सन्तोषः किन्तु जिनभवनाधिष्ठायकस्य देवस्य वीतरागत्वं नास्ति येन सोऽपि कस्याप्यपराधं सोढुं शक्नुयादितिभावः / ५१३-स्पष्टम् / ५१४--अत्र " चित्तो गत्तो" इत्यंशे तो शब्दस्य सकृदावृत्त्या छेकानुप्रासः /

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