Book Title: Siri Bhuvalay
Author(s): Bhuvalay Prakashan Samiti Delhi
Publisher: Bhuvalay Prakashan Samiti

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Page 241
________________ सिरि भूषलय सर्वार्थ सिद्धि संघ, बैंगलौर-दिल्ली विध 'वयवववन्गकोविद' न ।१३७॥ 'सदनद त्यागिगळ्गवनि' ॥१३॥ ल* दद 'रिसि ग्रन्धके तनु ताम् (२०)तन्क्षण । हदिनेन्दुस्मा र इरश्लोक' ॥ स 'द सूतर वयद्यान्कनकमवि 'दि चित्रि । सि' ह हदिनेन्टु साविर' व ॥१३६॥ ए* रिसिजातियउत्ततमहविनिम'सारसगो[२१]रसवनु है' ॥ पारद अहूविनिम् मर्दिसि पुट' । दारय 'विद्ध 'होस रस' र ॥१४॥ स* वरणनु 'घुटि केय कटि' द 'रससिद्धि' । रवि 'यामसिद्धान्त' द क षा । खरसायनहोसकल पसूत्रवयद्यवद् [२२] सुवशगोलि _ सिदश्री' शयति ॥१४॥ आ नुव समनतमद्राचार्यऋषियुपा' । रणवणावायदिन्न स्शी । लण्येन्दु होसेदकाव्यवुचरकादिगाळ'रिणय रियासद्श'तु ॥१४२॥ स्वरण वयद्यागमक(२३)ल्लितायुर्वेद' । सवन'वेल्लवु'सदि प्रोक्ष दु। अबु 'हुट्टितिल लिन्दइळे यवरेल ल'हासविविल लिन दबळे सुतम् ।१४३॥ दवषभाजितानन्तकु ॥१४४।। नव अभिनन्दन एल्ल ॥१४॥ केववर अयोध्या पुरक् ॥१४६॥ तव शम्भव शरावसतियष॥१४७॥ रविनीतापुर सुमतिपय ॥१४८॥ बुद्ध पद्मग्रम पुरसुक ॥१४६।। दव कवशभिय पुररु ।।१५०॥ वव पाश्व सुपाश्व रविता॥१५॥णु वाराणशि एन्देने काशिम्॥१५२।। पवि चन्द्रप्रभ चन्द्र पूरदो।।१५३॥ वय सिरि पुष्पदन्त जिनष।।१५४॥ नष पद काकन्दिपुरम् ॥१५॥ नव शीतल भविळा पुरप्॥१५६॥ व श्रेयाम्स सिम्हपुर ॥१५७॥ उवासुपूज्य चम्पापुरप।।१५८।। केविमल काल्य पुरश् ॥१५६॥ अव धर्म रत्नपुर वय ॥१६०॥ देव शांति कुन्यु अर वरदद।।१६।। . प्राबरु हसृतिनापुर सदभि।१६२॥ ब्य मल्लि नमि मिथिलेयवर्॥१६३॥ रव मुनिसुव्रत कुशाग्र पुरज॥१६॥ ह.वनवे नाम द्वारावति एन ।।१६५॥ अववीर कुण्डलपुर पा ॥१६६॥ मवरेल्ल जन्म भूवलय प्रा॥१६७।। अ बरोळ जीव हिम्सेय सेरिसि तन्दा ख' व 'कर काव्यके धिह का' ना* नव 'स(२४)लेलेयायुर्वेद शब्दव'। सिव भगवन्त सालिनिस्'न।।१६८ म नवप्राणाबाय शोलवेन्दर जीव' । वनु 'रक्षेयेन्दोरेदिरे' दुॐ मा। नवनद पालिस बेडवे दयेने (२५)। नवम 'कलित जीवर'१६॥ मे* लेन्दु 'कायब कलियदवर कोल्व । बलवन्त चरकन' वयद् य मतम्। सोले 'अमगेलुतलहिम्सायुर्वेदव'। साएम रक्षिय बलभद१७०॥ * नद'प्राणावायबदि[२६]यावरजीयार नव'कोलुवुदरिन्दलेतमानि तु 'वु पापय होन्दुवरेम बावीर। जिन 'बारिणय नेनेयवे'तान् ॥१७॥ एॐ रिद 'हिमसेयभावनेगिहृदु धिह । कारने[२७] करुणेय सर्व अ' * ॥ नेरिद 'जोवर मेलिरबेकु दो। बा रेयुवुदागषध ५ इंप्रा१७२॥ उरुहि कर्म 'वमश' दोरेवश ॥१७३॥ दर श्रेष्ट 'प्रोमदेरळमूर' व ॥१७४॥ वर'नाल्कयदार एन्ट प्रोम्बत्॥१७॥ तर 'हत्तु हन् प्रोम् हन्एरळ 'शु ॥१७६।। दर 'हदिमूर हदिनाल्कवरा ॥१७७॥ धारे 'हत् प्रोवत् इप्पत् प्रोम्दन् ।।१७।। नराज वमश इक्ष्वाकु स ॥१७६। सिरि पावर सुपाव उग्रउर ॥१०॥ धर्म शान्तियु कुन्युमरह ॥१८॥ वशिसे 'कुरुवम् शववर' ॥१८२॥ मरळि इप्पत् अन्क वरव ।।१८३॥ विरचित हरिवमश हरुशन्न ॥१४॥ हरु वर्धमान रिश्य च ॥१८॥ अरहन्त नाथ वम्शजय म॥१८६॥ ग्रसुगळलि नेमि हरिव ॥१७॥ लरयदा कूडलयदु वर स् ॥१८॥ भ्रतव राजवम्श ए ॥१८६॥ उरिद धर्म पालिपन ॥१०॥ वर राज जिनवम्श बरस य् ॥१६॥ परउर अवसर्पिण हुन्ड्यो ॥१६२॥ वर वउषभादि वीरांतर् ॥१३॥ कारण कार्य भूवलयर् उ ॥१४॥ ॐ रवरिम् 'इरुवेन्दु सिद्ध समन्त भद्' । रह 'रायन चरि त रण ॥ के रगि 'नमिसिबरहुदि (२८) ख्याति पूजा ला। भ' र 'दायिम् चरका' भ ॥१९॥ इ दिदि नूतन प्रन्य कर्तारर् प्रीतियिम् । विधि 'हिम्सेय पोरे' स* 'यलु'तर रसविद्येयातकेसिद्धियागुवपदव'नम[२६ नतमस्तक'यो। १९६॥ रिश रण'वागि गिडदोनुकुळितिर्द नुतमू। लिणे केगळ हूँवम हतिस' न् विनद 'लहिम्सेय व्रतदोन्दिगे दिव्य । गुरगदक्षिय सिधौषध'।१९७ . मिराज नितरोतागोतमोलकाता Tanasifamw--.---.'.'...

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