Book Title: Shrutsagar 2018 12 Volume 05 Issue 07
Author(s): Hiren K Doshi
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
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SHRUTSAGAR
December-2018 छल्लामांथी य ऊडी गयो होय।
भूमिविक्रयपत्रम् (ले. प. पा. ६९ गा. ओ. सी) सं. १५८३
सो. लहूइ, लाडणइ, शंधइ, काशीइ उत्पन्नकार्यवशतु आपणी भूमि साह सामलना पाडा मध्ये हूती ते भूमि राज्यटका ८०४ आंक आठसई चिरोत्तर माटइ वेचाती परी० आसा रवा जादव लाखा सारणनई आपी सही। ++++ ए भूमिनई कीधई को दावु करई तेहनई लहूआ लाडण शंघा काशी प्रीछवई।। _स्वरयुग्म अइ=अई अइ; इ थयानो दाखलो नथी। अउ उ अऊ ओनो दाखलो नथी। तु (तउ मांथी); माटइ (=जूनो प्रत्यय निमित्तइ) कीधइ (=ने माटे) आ त्रण अनुषंगीओमांथी तउ एकलो जुनो छे अने बीजा अनुषंगी शब्दो अत्यार तरफनी भाषाना घडतर तरफ गमन बतावे छे।। __ऊपरना लेखनी साथे सं. १५८३नो बीजो लेख ऊमेरवाथी हुँ जे लेखन प्रकारनी वैकल्पिकता पर भार मूकवा मागु छु ते वधारे बळ पकडशे। गू. व. सोसायटीनी हाथप्रत भगवद्गीता-गुजराती भाषांतर साथे संवत् १५८३ वर्षे अषाढ वदि ८ गुरे लखितं वृद्धनागर ज्ञातीय मेघजीसुत आसघर तथा मांडणजी स्वयं पठनार्थे शुभं भवतु (हा. प्र. पत्र. १८०)
हाथप्रत. पत्र. १९ अंतवंत इमे देहा नित्यस्योक्ता शरीरिणः । अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद् युद्ध्यस्व भारत ॥
जन्ममरणशून्य ये आत्मा अप्रमेय किहितां कोणि कल्यु न जाइ। एहवु सत्यस्वरूप सदाए नित्य । आनंदवंत आत्मा तु तेहना ये देह ते सदाए कुडा। सदाए नाशरूप । सदा अंतवंत लोकमाहि देहनु नाश द्विविध छि। एक तां बाली राष कीधु । पुठि नाश पाम्यु कहीए। लोक कहि । जीवनि मृत्यु छि। बि प्रकारनु नाशि। वली... अर्जुनना मननुं बिनु संदेह टालि छि। कीहुसंदेह । अर्जुन एम जांणे छिये भिष्मादिक मि मारवा छि। हुं एहनुं हंता वधनु कर्ता । अर्जुन एतां ताहारी बुद्धि कुडी ते शा मटि।
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी, निवासः शरणं सुहृत् । प्रलयः प्रभवः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥
गति कहेतां कर्मनां फल ये स्वर्गादिक ते अहं । भर्ता पोषणनो कर्ता ते अहं । प्रभुः स्वामी ते अहं । लोक शुभाशुभ कर्म करे तेहनी साक्षी ते अहं। समस्तप्राणीमात्रने नीवास ते अहं । शरणागतना दुःखनो हर्ता ते अहं । सुहृद कहेतां जीव मंदभाग्यनो उपगार वांछू नही। अनि उपगारनी कोडि करुं। विश्वने उत्पत्ति ते अहं । सरवने प्रलय करूं ते अहं । माहारा उदरने विषे संवरी सर्वने राषु । पछे आपापणा कर्मबीज
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