Book Title: Shatkhandagama Pustak 12
Author(s): Pushpadant, Bhutbali, Hiralal Jain, Fulchandra Jain Shastri, Devkinandan, A N Upadhye
Publisher: Jain Sahityoddharak Fund Karyalay Amravati

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Page 544
________________ ४, २, १६, २१.] वेयणअप्पाबहुगाणियोगद्दारं __ [५११ (णामस्स कम्मस्स पयडीयो असंखेज्जगुणाओ' ॥ १६॥ को गुणगारो ? असंखेजा लोगा। (दसणावरणीयस्स कम्मस्स पयडीओ असंखेजगुणाओ॥ १७॥ को गुणगारो ? असंखेजा लोगा। णाणावरणीयस्स कम्मस्स पयडीओ विसेसाहियाओ ॥ १८॥ केत्तियमेत्तो विसेसो ? असंखेजा कप्पा । एवं समयपबद्धट्टदा त्ति समत्ता। खेत्तपञ्चासए त्ति सव्वत्थोवा अंतराइयस्स कम्मस्स पयडीयो॥१६॥ कुदो ? पंचगुणतीससागरोवमकोडाकोडिगुणिदमहामच्छुक्कस्सखेत्तपमाणत्तादो । मोहणीयस्स कम्मस्स पयडीयो संखेजगुणाओ॥ २०॥ कुदो ? णवसयपंचाणउदिसागरोत्रमकोडाकोडीहि गुणिदमहामच्छुक्कस्सखेत्तमेत्तपयडित्तादो । को गुणगारो ? सादिरेयरूवाणि । - आउअस्स कम्मस्स पयडीओ असंखेजगुणाओ॥ २१॥ कुदो ? अंतोमुहुत्तगुणिदघणलोगपमाणत्तादो। को गुणगारो ? जगपदरस्स असंखेजदिमागो। नामकर्मकी प्रकृतियां उनसे असंख्योतगुणी हैं ॥१६॥ गुणकार क्या है ? गुणकार असंख्यात लोक है। दर्शनावरणीय कर्मकी प्रकृतियाँ उनसे असंख्यातगुणी हैं ॥१७॥ गुणकार क्या है ? गुणकार असंख्यात लोक है। ज्ञानावरणीय कर्मकी प्रकृतियाँ उनसे विशेष अधिक हैं ॥१८॥ विशेष कितना है ? वह असंख्यात कल्पों प्रमाण है । इस प्रकार समयप्रबद्धार्थता समाप्त हुई। क्षेत्रप्रत्यासकी अपेक्षा अन्तराय कर्मकी प्रकृतियाँ सबसे स्तोक हैं ॥१९॥ क्योंकि, वे पाँचगुणे तीस (३०४५) कोड़ाकोड़ी सागरोपमोंसे गुणित महामत्स्यके उत्कृष्ट क्षेत्रके बराबर है। मोहनीय कमकी प्रकृतियाँ उनसे संख्यातगुणी हैं ॥ २० ॥ कारण कि वे प्रकृतियाँ नौ सौ पंचानवे कोड़ाकोड़ी सागरोपमोंसे गुणित महामत्स्यके उत्कृष्ट क्षेत्रके बराबर हैं । गुणकार क्या है ? गुणकार साधिक [छह ] अंक हैं। आयुकमकी प्रकृतियाँ उनसे असंख्यातगुणी हैं ॥ २१ ॥ क्योंकि, वे अन्तर्मुहूर्तसे गुणित घनलोक प्रमाण हैं। गुणकार क्या है ? वह जगप्रतरका असंख्यातवाँ भाग है। १ श्र-श्रा-काप्रतिषु 'संखेज', ताप्रतौ (अ) संखेज' इति पाठः। . .... . Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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