Book Title: Samacharishatakam
Author(s): Samaysundar,
Publisher: Jindattsuri Gyanbhandar
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समीपे मुखपोतिकाप्रत्युपेक्षणपूर्व करेमि भंते ! सामाइयं सावज जोगं पञ्चक्खामि दुविहं तिविहेणं जाव नियमं पजुवासामि'
इत्यादि उच्चार्योपथिकी प्रतिक्रम्य यथारातिकतया सर्वसाधूश्च अभिवन्द्य पृच्छनादि करोति, अत्रोभयोरपि ऋद्धिWप्राप्तानर्द्धिप्राप्तयोः श्राद्धयोश्चतुर्वपि स्थानेषु सामायिकदण्डकोच्चारात पश्चादेवेर्याप्रतिक्रमणं प्रतिपादितम् ॥ ६॥ I एवं नवपदप्रकरणस्य स्वोपज्ञलघुवृत्तौ-सं० १०७३ त्रिसप्तत्यधिकसहमवर्षकृतायां श्रीदेवगुप्तसूरयोऽपि प्राहुः (पत्रं ४२)। तथाहि
सो असावओ दुविहो, इड्डिपत्तो आणितिपत्तोय, जो सो इड्डिपत्तो जो सो गओ साहसमीवे करेइ । जो पुण अशाणिड्डिपत्तो सो घराओ चेव सामाइयं काऊण पंचसमिओ तिगुत्तो जहा साधू तहा अगच्छइ, साहुसमीवे पत्तो पुणोऽवि सामाइअं करेइ इरियावहियाए पडिक्कमइ, जइ चेइयं अस्थि तो पढम चेइयाई वंदइ, पच्छा पढाइ सुणइ वा ॥७॥
पुनरुयशीत्यधिकैकादशशत ११८३ वर्षे चन्द्रगच्छीयश्रीविजयसिंहाचार्यैः कृतायां श्रावकपतिक्रमणचूर्णी (पत्रं २४३) चंदिऊण य गुरुणो छोभावंदणएण संदिसाविय सामायिकदंडकमणुकड्डइ, जहा–'करेमि भंते ! सामाइयं सावज जोग पञ्चक्खामि जाव नियम पन्जुवासामि दुविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं न करेमि न कारवेमि तस्स भंते ! पडिकमामि | निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि' तओ इरियावहियाए पडिकमि आगमणं आलोइए, पच्छा जहाजेटुं साहुणो वंदिऊण पढइ सुणइ वा इति ॥८॥श्रीयशोदेवसूरिभिः कृतायां पञ्चाशकचूर्णी; तथाहि-अणेण विहिणा गंतूण तिविहेण साहुणो नमिऊण सामाइयं करेइ, 'करेमि भंते ! सामाइयं सावजंजोगं पञ्चक्खामि जाव साहुणो पजुषासामि दुविहेर्ण तिविहेणं'
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