Book Title: Pratima Shatak Granth
Author(s): Pratapvijay,
Publisher: Muktikamal Jain Mohan Mala
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स्वोपज्ञ
प्रतिमा | जावज्जीवाए, सबाओ पयणपयावणाओ अपडिविरया जावज्जीवाए, सबाओ कुट्टणपिट्टणतज्जणतालणवहबंधपरिकिलेसाओ | शतकम् अप्पडिविरया जावज्जीवाए, जे आवन्ने तहप्पगारा सावज्जा अबोहिआ कम्मंता परपाणपरिआवणकरा जे अणारिएहिं | |वृत्तिः ॥२७५
कति तओ अप्पडिविरया जावज्जीवार, से जहाणामए केइ पुरिसे कलमममूर जाव० एवमेव ते इत्थिकामेहि मुच्छिया गिद्धा गढिया अज्झोववन्ना जाव वासाई चउपंचमाईवा छद्दसमाई वा अप्पतरो वा भुज्जतरो वा कालं मुंजित्तु भोग भोगाई पविसुइत्ता वेरायतणाई संचिणित्ता बहूइं पावाई कम्माइंउस्सण्णाई संभारकडेण कम्मणा से जहाणामए अयगोलेइवा सेलगोलेइ वा उदगंसि पक्खित्ते समाणे उदगतलमइवइत्ता अहे धरणितलपइहाणे भवति, एवमेव तहप्पगारे पुरिसजाएवज्जबहुले धृतबहुले पंकबहुले वेरबहुले अप्पत्तियबहुले दंभबहुले णियडिबहुले साइबहुले अयसबहुले उसण्णतसपाणघाती कालमासे कालं किच्चा धरणितलमइवइत्ता अहे णरगतलमपइट्टाणे भवति, तेणं गरगा अंतो वट्टा बाहिं चउरंसा अहेखुरप्पसंठाणसंठया णिचंधगारतमसा ववगयगहचंदमूरनक्खत्तजोइसपहा मेयवसामसरूहिरपूयपडलचिक्खिल्ललित्ताणुलेवणतला असुईवीसापरमदुब्भिगंधा कण्हाअगणिवन्नाभा कक्खफासा दुरहियासा असुभा गरगा, असुभा णरगेसु वेदणाओ, नो चेव नरगेसु नेरइआ णिहाइंति वा पयलाइंति वा रति वा धिर्ति वा मति वा उवलंभते, तेणं तत्थ उज्जलं विउलं पगाढं कडुअं कक्कसं चंडं दुक्खंदुग्गंतित्वं दुरहिआसं णेरइआ वेअणं पच्चणुभवमाणा विहरंति, से जहा णामए रुक्खेसिया पन्चयग्गे जाए मृलेछिन्ने अग्गे गुरुए जओ णिण्णं जतो विसमं जतो दुग्गं ततो पवडति, एवामेव तहप्पगारे पुरिसजाए गम्भाओ गब्भं जम्माओ जम्मं माराओ मारं णरगाओ णरंग दुक्खाओ दुक्खं दाहिणगामिए रइए कण्हपक्खिए, आगमिस्साणे दुल्लहबोहिए | ||२७५॥

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